कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 611, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंपीछे धर्मदास साहबने वैराग्य लिया । सद्गुरुके उपदेशको धारण कर परंधामको पहुँचे, उनके वंशको साहबने गुरुवाई प्रदान की, जो बयालीश वंशके नामसे प्रसिद्ध है; ये ही वर्तमान कबीरपंथके प्रवर्तक हैं । कबीरपंथी अपनी अपनी आजकी नूतन कृतियोंको भी प्रायः उन्हींके नामपर बनाते हैं यह उनके नामकी महिमा है ।
कबीर साहिब तथा धर्मदासजीमें सदा धार्मिक संवाद ही हुआ करते थे । सद्गुरु धर्मदाससे खुली बातें करते थे । अणुमात्र भी अपने स्वरूपको नहीं छिपाते थे । यहां उनकी बात चीतोंकी साखी रखता हूं ।
साखी — हम साहब सत्यरुष हैं, यह सब रूप हमार ।
जिन्द कहे धरमदाससे, सत्य शब्द घनसार ॥
सकल सृष्टिमें रमि रहा, हूं सब जात अजात ।
गरीब दास जिन्दा कहे, मेरे दिवस न रात ॥
बोले जिन्द कबीर जी, सुनु वाणी धरमदास ।
हम खालिक हम खलक हैं, सकल हमार प्रकाश ॥
गरुड़बोध बेदी रची, राम कृष्ण हैरान ।
लंकापर धाये जबे, तब का करूँ बखान ॥
दुर्वासा मुनि इन्द्रका, हुआ ज्ञान संवाद ।
दत्त तत्त्वमें मिल गये, जा घर वेद न बाद ॥
गरीब-सिख बन्दी सद्गुरु सही, चकवै ज्ञानअमान ।
शीश कटा मन्सूरका, फेरि दिया जिव दान ॥
धर्मदासजीकी तरह गरीबदासजी भी सद्गुरुके चरणोंके दासही रहे हैं ।
उनकी श्रद्धाको सूचित करनेवाले कुछ पद्य उद्धृत करता हूं —
सर्वांगकी साखी ।
गरीब-नामोंको सद्गुरु मिले, देवल देता फेर ।
पण्डा तो इतही रहा, शब्द कहा हम टेर ॥
गरीब-रबिदास रसायन पीवते, झूले धरे अनन्त ।
चलत बार पाये नहीं, धन्य सद्गुरु भगवन्त ॥
संगतअङ्गकी साखी
गरी-ऐसी सङ्गति जो मिली, भक्ति गही प्रह्लाद ।
नारदसे सद्गुरु मिले, सूझी अगम अगाध ॥
धर्मदास साहबके खास मुख वचन मंगल धेला ।