भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पीछे धर्मदास साहबने वैराग्य लिया । सद्गुरुके उपदेशको धारण कर परंधामको पहुँचे, उनके वंशको साहबने गुरुवाई प्रदान की, जो बयालीश वंशके नामसे प्रसिद्ध है; ये ही वर्तमान कबीरपंथके प्रवर्तक हैं । कबीरपंथी अपनी अपनी आजकी नूतन कृतियोंको भी प्रायः उन्हींके नामपर बनाते हैं यह उनके नामकी महिमा है ।

कबीर साहिब तथा धर्मदासजीमें सदा धार्मिक संवाद ही हुआ करते थे । सद्गुरु धर्मदाससे खुली बातें करते थे । अणुमात्र भी अपने स्वरूपको नहीं छिपाते थे । यहां उनकी बात चीतोंकी साखी रखता हूं ।

साखी — हम साहब सत्यरुष हैं, यह सब रूप हमार ।

जिन्द कहे धरमदाससे, सत्य शब्द घनसार ॥

सकल सृष्टिमें रमि रहा, हूं सब जात अजात ।

गरीब दास जिन्दा कहे, मेरे दिवस न रात ॥

बोले जिन्द कबीर जी, सुनु वाणी धरमदास ।

हम खालिक हम खलक हैं, सकल हमार प्रकाश ॥

गरुड़बोध बेदी रची, राम कृष्ण हैरान ।

लंकापर धाये जबे, तब का करूँ बखान ॥

दुर्वासा मुनि इन्द्रका, हुआ ज्ञान संवाद ।

दत्त तत्त्वमें मिल गये, जा घर वेद न बाद ॥

गरीब-सिख बन्दी सद्गुरु सही, चकवै ज्ञानअमान ।

शीश कटा मन्सूरका, फेरि दिया जिव दान ॥

धर्मदासजीकी तरह गरीबदासजी भी सद्गुरुके चरणोंके दासही रहे हैं ।

उनकी श्रद्धाको सूचित करनेवाले कुछ पद्य उद्धृत करता हूं —

सर्वांगकी साखी ।

गरीब-नामोंको सद्गुरु मिले, देवल देता फेर ।

पण्डा तो इतही रहा, शब्द कहा हम टेर ॥

गरीब-रबिदास रसायन पीवते, झूले धरे अनन्त ।

चलत बार पाये नहीं, धन्य सद्गुरु भगवन्त ॥

संगतअङ्गकी साखी

गरी-ऐसी सङ्गति जो मिली, भक्ति गही प्रह्लाद ।

नारदसे सद्गुरु मिले, सूझी अगम अगाध ॥

धर्मदास साहबके खास मुख वचन मंगल धेला ।