भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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प्रगट होनेकी-साखी ।

प्रगट हंस उबारने, मनमें कियो विचार ।
जेठ मास बरसातमें, पगधारे चँदबार ॥
चहुँ दिशि दमके दामिनी, श्वेत भँवर गुञ्जार ।
तहवौ आप विराजिहैं, जल पर सेज सँवार ॥
बालक कोठिन ठाठके, निकट सरोवर तीर ।
सुर नर मुनि जन हरषिया, साहब धन्यो शरीर ॥
चंदन साहुकी स्त्री, स्नान करन को जाय ।
सुन्दर बालक देखिके, कर गहि लियो उठाय ॥
प्रेम प्रीति करले चली, हँसत खेलत घर आय ।
चन्दन देखि रिसावई, तुम बालक कहाँ पाय ॥
बालक मोहि कर्ता दियो, सुनो साहु सतभाउ ।
यह बालक प्रतिपालिहैं, चलै तुम्हारो नाँउ ॥
डार डार यह बालक, मानो बचन हमार ।
सजन कुटुम्ब हाँसी करें, हँसि मारे परिवार ॥
यह बेश्याका बालका, सो तू लाई नार ।
लोग कुटुम्ब सब देखी हैं, तुमको देही बडार ॥
दासी हाथ बालक दियो, जलमें दीन्हों डार ।
देह धरे दुख पायो मैं, चेतो मूढ गँवार ॥
नीरू नाम जुलाहा, गमन किये घर आय ।
तासु नारि बड भागिनी, जलमें बालक पाय ॥
नीरू देखि रिसावही, बालक दे तू डार ।
सजन कुटुम्ब हाँसी करे, हँसि मारे परिवार ॥
जब साहब होँकारिया, ले चल अपने धाम ।
मुक्ति संदेश सुनाइहौं, मैं आयों यहि काम ॥
पूर्व जन्म तुम ब्रह्म ना, सुरति बिसारी मोहि ।
पिछिली प्रीति के कारने, दर्शन दीनों तोहि ॥
कर गहि वेग उठाइयाँ, लीन्हो कण्ठ लगाय ।
नारि पुरुष दोउ दरशिया, रङ्ग महाधन पाय ॥
भाव भक्ति करि ले चले, काशी नगर मझार ।
धन्य, भाग्य उस देशका, सद्गुरु जहाँ पगधार ॥