भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 600, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 600

कहता है कि, यह दुर्ग नहीं, सराय है, मैं इसमें रातभर रहूँगा दुर्गके बाहर नहीं निकलता । यह बात सुनकर बादशाहने प्रश्न किया कि, ऐ पथिक ! इस दुर्गको तू सराय कैसे कहता है ! पथिकने बादशाहसे पूछा कि, इस दुर्गको किसने निर्मित किया था ? बादशाहने अपने नाना अथवा परनानेका नाम बताया । पथिकने पूछा कि, बनानेवालेके उपरान्त फिर कौन रहा ! बादशाहने उत्तर दिया कि, मेरा नाना रहा । मुसाफिरने कहा, फिर कौन रहा ? बादशाहने उत्तर दिया कि, अब मैं हूँ । फिर कहा, तुम्हारे उपरान्त कौन रहेगा ? तब बादशाहने कहा कि मेरा पुत्र रहेगा । तब उस पथिकने कहा कि, बाबा जहाँ ? इतने पथिक आये और चले गये किसीको स्थिरता नहीं हुई वह दुर्ग कैसे ठहरा ? यह तो अवश्यही सराय है । यदि इस सरायमें एक दिवस मैं भी रह जाऊँगा तो आपति क्या है ! यह बात सुनकर बादशाह तथा सब मनुष्योंको चेत हो गया । क्योंकि वास्तवमें यह संसार सराय है और पूर्णतया अस्थिर तथा नाशमान है ।

इस बादशाहका वृत्तान्त अनेक पुस्तकोंमें लिखा है अंग्रेजी पुस्तकोंमें भी मने देखा है । एक पुस्तक अंग्रेजीमें एडिसनके नामकी है उसको मने देखा । उसके नोटमें इसी प्रकार लिखा था कि, जिस प्रकार कबीर साहब पथिक बनकर सरायमें रहे । दुर्गको सराय कहा और बूलूच होकर छत पर फिरे थे । जिस प्रकार लिखा अंग्रेजी पुस्तकोंमें है इसी प्रकार और देशके लोग इस बादशाहका वृत्तान्त लिखते हैं । पर फारस तथा अरबके लोग बहुत कुछ लिखते हैं । फारसी पुस्तकोंमें इनके अनेक किस्से हैं । इनकी फकीरी तथा बादशाहीका सब वृत्तान्त लिखा है, पर वह बात किसीको नहीं मालूम कि, इस बादशाहके गुरु पीर कबीर साहब हैं, कोई नहीं जानता कि, बादशाहका क्या धर्म था । प्रत्यक्षमें लोगोंको यही मालूम है कि, बादशाह मुहम्मदी फकीरोंमें थे, पर थे वो हंस कबीर, कबीर साहबकी दया उत पर हुई । इबराहीम अद्वमका वृत्तान्त अन्यान्य ग्रंथोंमें भी है । जहाँ कहीं जिसने जो बात पढ़ी वह उसकी बात बता सकता है । इस बादशाहके मनमें विश्वास तो भली भाँति जम गया था पर अबतक उसने बादशाही नहीं छोड़ी थी ।

सुलतान इबराहीम अद्वमने कबीर साहबके अनेक कौतुक देखे । अभी-तक उसको संसारसे पूर्णतया घृणा नहीं हुई । एक दिवस कबीर साहब बादशाही दासीका रूप बनकर उसके पलंग पर लेट रहे । वह पलंग फूलोंसे भली-प्रकार सुसज्जित था, उसपर लेटतेही नौंद आगई वह बाँदी अचेत होकर सो गई । जब बादशाह लेटनेको आया तब देखा कि, बाँदी पलंग पर लेटी हुई है ।