भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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उसको देखकर बड़ाही क्रुद्ध हुआ क्रोधमें आकर आज्ञा दी कि, इस लौड़ीको कोड़े मारो । जब कोड़े उसपर पड़ते थे तब वह हँसती थी । बादशाहने पूछा कि, ए बाँदी ! इसका क्या कारण है कि हँसती है ? यह तो रोनेकी जगह है हँसनेकी नहीं । उस लौड़ीने उत्तर दिया कि, मैं इस कारण हँसती हूँ कि, मैं तो केवल एक दो घड़ी इस पलङ्ग पर लेटी होऊँगी, उसके बदले तो मुझपर इतने कोड़े पड़ते हैं पर जो प्रतिदिन इसपर लेटते हैं उसकी क्या दशा होगी ! यह बात सुनकर बादशाहके कान खुल गये उसे ज्ञान हो गया । बादशाहने कहा न तो तू बाँदी है, न स्त्रीही है, तुम तो वही श्रेष्ठ महापुरुष है जिसने कि अनेक बार मुझे शिक्षा दी है । यदि आप वही महापुरुष हों तो आप अपना स्वरूप प्रगट कर दर्शन दीजिये । बादशाहके ऐसे कहते ही कबीर साहबने अपना महातेजो-मय स्वरूप दिखाकर उग्र प्रकाश प्रगट किया । उस समय बादशाहने चरणोंपर गिरके निवेदन किया कि, अब आपकी क्या आज्ञा है ? मैं वही करूँगा । कबीर साहबने कहा कि, मैं अमरलोकसे आया हूँ, जो कोई मेरा कहना मानेगा उसका मैं उद्धार करूँगा कालपुरुषके हाथसे छुड़ाऊँगा । मेरा यही आशय है कि, हे बादशाह ! तू सत्य पुरुषकी भक्तिमें लग जा ।

सत्य कबीर वचन ।

चौ० – तबही शाह भये आधीना । चरण धोय चरणोदक लीना ॥
भाव तुम्हार हम गुरु चीन्हा । मम कारण बहु फेरा कीन्हा ॥
अब साहब कीजे मम काजा । जाते मोहिँ छाड़ैं यमराजा ॥
कहैं कबीर सुनो चितलाई । सुरति निरति करि लेहु समार्ई ॥
सत्यगुरु ध्यान करो सब भाई । गुरु प्रताप अमर घर जाई ॥
यह सुनि शाहतखत तब छाड़ा । प्रगटा ज्ञान हृदय गुण बाढ़ा ॥

साखी – सोला सहस सहेली, तुरी अठारह लकख ॥

साईं तेरे कारने, छोड़ा शहर वलकख ॥

शब्द – सुलताना बलख बुखारेका ।

सब तजके जिन लिया फ़िक्री अल्लः नाम पियारे का ॥

खाते जा मुख लुकमा' उम्दा मिसरी कन्द छुहारेका ।

सो अब खाते रूखा सूखा टुकड़ा शाम सकारेका ॥

जिन तन पहने खासः मलमल तीनटंक नौतारेका ।

सो अब भार उठावन लागे गुदूर सेर दश भारेका ॥

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