भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 599

जाना कि, ये दोनों मेरे बाप तथा दादे हैं । नाम सुनकर बादशाह लज्जित हुआ, फिर पूछा तीसरीमेख किस प्रयोजनसे खाली रक्खी है ? फकीरने उत्तर दिया कि, इस समय जो बादशाह बलख बुखारके सिंहासनपर आसीन है जब वह मरकर कुत्ता होगा तब मैं उसे इस तीसरे मेखसे बाँधूंगा । इस बातको सुनकर बादशाहके मनमें बड़ा शोक हुआ । यदि मुझको मरकर कुत्ताही बनना पड़ेगा तो बादशाही तुच्छ है यदि मुझपर यही विपत्ति आती है तो सब सांसारिक वैभव लेकर क्या करूँगा ? इससे संसारसे घृणा उत्पन्न हुई, दुःखका बादल हृदय पर छा गया और अन्तका सोच हुआ कि, मैं कैसे कुत्ता न बनूँ ? साधुके उपाय बताते ही बादशाहने साधुको पहिचान लिया कि, सब अन्तर्धान हो गये ।

एक दिवस ऐसी घटना हुई कि, एक मनुष्य बादशाही दुर्गके भीतर आगया । सिपाही लोग उसको बाहर निकालने लगे परन्तु वह निकलता नहीं था और कहता था कि, ऐ भाई ! मैं पथिक हूँ, यह सराय है संध्या हो गई है, इस सरायमें रात बिताकर प्रातःकाल मैं यहाँसे विदा हो जाऊँगा । सिपाहियोंने समझाया कि, यह सराय नहीं, यह तो बादशाही दुर्ग है । उसने कहा कि, यह तो दुर्ग नहीं सराय है, मैं पथिक हूँ, इस सरायमें रात बिताकर प्रातःकाल यहाँसे चला जाऊँगा । यद्यपि सिपाही बहुत कुछ समझाते थे पर वह फकीर मानता नहीं था । बारम्बार यह कहता था कि, यह दुर्ग नहीं अवश्यही मुसाफिर खाना है । इस बात पर बड़ा हल्ला मचा, इस अवसरमें बादशाह वहाँ आय-हुँचा पूछा कि, यह कौसा हल्ला है ! सुलतानी सेवकोंने निवेदन किया कि, एक मनुष्य दुर्गके भीतर घुस आया है, यद्यपि उसको रोकते हैं पर यह नहीं मानता ।

बलखका बादशाह लिखा है यह बिलकूल निर्मूल है, क्योंकि, इसके पिता तो परम सन्त थे । यहाँ दोनों कुत्तोंको शाह इब्राहीम अदमके बाप दादे बतलाना बहुत ही भूल है । इससे जाना जाता है कि, इस पुस्तकमें उत्तरोत्तर मिलावट होती चली गई है । एवं मिलावट करनेवाले भी साधारण विचारके ही जान पड़ते हैं । ऐसी ऐसी मिलावट और भूलके कारण कबीर पन्थी साहित्यकी निन्दा होती है किन्तु बुद्धिमानोंको विचार वर्कहीन ही उसे ग्रहण करना चाहिये ।" इस प्रकरणको लेकर उक्त संशोधकजीने यह परिस्फुट कह दिया है कि, जो कबीर पन्थी; ग्रन्थोंमें ऐसी असंगत बातें हों उन्हें साधारण बुद्धिके लोगोंकी मिलावटकी समझनी चाहिये । यह विचार यहीके लिये हो यह बात नहीं । किन्तु सब जगहके लिये हैं । इसी सुलतानबोधमें अगाड़ी चलकर लिखा हुआ मिलता है कि, मेरे पास इसकी कितनी ही प्रतियाँ हैं जिनमें कई तो सौ वर्षसे भी अधिक पुरानी हैं । पुरानी प्रतियोंकी अपेक्षा नवीन प्रतियोंमें इतनी बातें मिलाई हैं कि, वे उससे ढयोढी हो गई हैं । इस सबसे तो यही प्रतीत होता है कि, या तो स्वामी परमानन्दजीने इसे अनुसंधानसे रख दिया है, या वे कुत्ते इब्राहीमके नाना पर नाना होंगे । सर्वथा ही निन्दास्तुतिकी सभी बात विचारणीय हुआ करती हैं । वो ऐसी नहीं होती कि बिना विचारे विश्वासके योग्य हों ।