भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 598

“ऐ सुलतान इब्रामहीम अद्वम ! मैं भी किरमान देशका बादशाह था । बहुत आखेट किया करता था । अब तू देख कि, मैं कुत्ता हो गया हूँ । जिन २ जीवोंको मैंने मारा और उनका माँस खाया वे सब जीव मेरा माँस खाते हैं, कीड़े होकर मेरे शरीरसे लगके अपना प्रतिशोध ले रहे हैं । इनसे अब मेरा छुटकारा नहीं हो सकता, अब मैं क्या करूँ । तू आखेट करता है तो तेरी भी यही दशा होगी” इतना कहकर, वह कुत्ता भाग गया । बादशाहके मनमें जीववध करने (आखेट करने) के कारण बड़ी बुरी चिन्ता उत्पन्न हुई, परन्तु थोड़े दिनोंके बाद, फिर भी भूल गया । ‘एक दिन शाहजु चलै शिकारा’ यहाँसे लेकर ‘नहीं वह कुत्ता नहीं दवैशा’ यहाँतक का यह हिन्दी अनुवाद है कि, एक दिवस बादशाह शिकार खेलनेको निकला, शिकारके पीछे अपना घोड़ा डाल दिया । जब अपनी सैन्यसे दूर निकल गया तब उसको बड़ी कड़ी प्यास लगी । उसके सब सेवक बहुत दूर हो गये थे । कहीं जलका चिन्ह न मिला, इस कारण बादशाहने विवश होकर अपना घोड़ा आगे बढ़ाया तो एक वटवृक्ष दिखाई दिया । बादशाह अपना घोड़ा दौड़ाकर इस वृक्षकी छाँहकी ओर चला । जब उस वृक्षकी छाया में पहुँचा, तो क्या देखता है कि, इस वृक्षके नीचे एक विरक्त बैठे है उसके दोनों ओर जलसे भरे दो कोरघडे रखे हैं, उनपर कोरें प्याले रखे हैं । उस महात्माने बादशाहको जल पिलाया । जब वह जल पीकर ठण्ढा हुआ तो क्या देखता है कि, उस महात्माके दोनों ओर दो कुत्ते बँधे हैं और एक भेख (खूँढा) खाली है । उस विरक्तने घी, मैदा, भाँति भाँतिके मेवे तथा मिश्री आदि निकालकर उन दोनों कुत्तोंके सामने मलीदा बनाकर रखवा, परन्तु उन कुत्तोंने वह मलीदा न खाया । वह महात्मा सोटेसे उन कुत्तोंको धमकाने लगा कि, मलीदा खाओ, नहीं तो मैं तुमको दण्ड दूंगा । पर वे कुत्ते मलीदेमें मुंह भी न लगाते थे । बादशाहने कहा कि साई साहब ! ये मलीदा खाना क्या जाने, उनको आप क्यों आँख दिखाते हैं ? फकीरने उत्तर दिया कि, “ऐ बादशाह ! यह बात नहीं; यह दोनों इसलिये यह पदार्थ नहीं खा सकते कि, इन्होंने पूर्वजन्ममें कुछ दान पुण्य नहीं किया है । यदि दान पुण्य करते तो निस्सन्देह खा सकते थे ।” बादशाहने पूछा कि, पूर्वकालमें ये दोनों कौन थे ? सन्तने उत्तर दिया कि ये, दोनों बलख बुखारेके बादशाह थे—(उन दोनोंका नाम भी कहा) तब शाहंशाहने

  • इब्राहीमका पिता कौन था इसके विषयमें पूर्वही लिख चुके हैं कि, सच्चे साधु, अद्वम शाह थे । जिसने सच्चे भक्तोंका दर्शन पाया वो कुत्तेकी योनिमें जावे यह सच्ची श्रद्धाके प्रति-कूल बात है । ऐसी ही बातोंको लेकर बोधसागरके इसी प्रकरण पर भारत पथिक कबीर पन्थी स्वामी युगलानन्दजीने एक टिप्पणी लिखी है कि, “जो शाह इब्राहीम अद्वमके बाप बाबाको-