कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 603, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंबागवानी करता है । उन्होंने उत्तर दिया कि एक वर्ष हुये । तब अमीर आश्चर्यित हुआ कि यह कौन मनुष्य है कि, जो बरस भरसे बागवानी करता है, परन्तु बागका कोई फल नहीं खाया ऐसा ईमानदार यह कौन है । जब भली-प्रकार जाँच किया लोगोंने पहचाना तो कहा कि यह तो सुलतान इबराहीम अद्वम है । वह अमीर नितान्तही लज्जित हुआ हाथ बाँधकर अपना अपराध क्षमा कराने लगा, पर वे तो हँसकर कहोंके कहों चल दिये ।
एकबार इबराहीम अद्वमका बेटा जो सिंहासनरुद्ध था, रातके समय नदीके किनारे आनन्द विलास कर रहा था, नावें नदीमें चलाई जाती थीं खूब प्रकाश होरहा था, नाच तमाशा तथा ठट्ठा मसखरीमें लोग लगे हुये थे उस समय फकीरीकी अवस्थामें बादशाह इबराहीम अद्वम चले जाते थे । लोगोंने पागल समझकर उनको पकड़ लिया । रातभर ठट्ठा मसखरी करते रहे । जैसे होलीके भड़डवे होते हैं वैसाही ठट्ठा उनके साथ होता रहा, उन्होंने किसी प्रकारका अवरोध नहीं किया । जब प्रातःकाल हुआ सब लोगोंने पहचाना कि, यह तो हजरत हैं । तब बादशाहका जो पुत्र था वह देखकर बड़ा दुःखी होकर कहने लगा कि, पिताजी ! आपने अपनी कैसी बुरी दशा बनाली है, आप पागलोंके समान फिरते हैं । मैं इतना बड़ा बादशाह हूँ कि, जो चाहूँ सो करूँ, समस्त देश मेरे वशमें हैं, आप जो कहें सो मैं करूँ मेरे वशमें सब हैं । इबराहीम अद्वमने अपनी गुदडी सीनेवाली जो सूरई थी नदीमें फँकदी और अपने पुत्रसे कहा कि तू कहता है कि, मैं बड़ा बादशाह हूँ तो मेरी सूरई मँगवादे । शाहजादेने कहा कि, मैं सहस्रों सूरईयाँ मँगवाये देता हूँ । बादशाहने कहा कि, मैं तो अपनीही सूरई लूंगा तब शाहजादेने जाल डलवाए और बहुत ढुँढवाया पर वह सूरई नहीं मिली । तब इबराहीम अद्वमने कहा कि, हे नदी ! तू मेरी सूरई दे । उस समय नदीसे एक मछली वह सूरई मुंहमें लिये उनके पास आई, उनने अपनी सूरई लेली । शाहजादेसे कहा कि, देख, तेरी आज्ञा बढ़कर है, अथवा मेरी, तेरी आज्ञा तेरे देशमात्रमें है । मेरी आज्ञा नदी, पर्वत आदि जड़ चेतन स्थावर जंगम सभी मानते हैं ।
शेख मन्शूर और शिवली ।
जहाँ प्रेम और उसकी दृढ़तापर मर मिटनेवाले इस्लामी सम्भ्यताके सुयोग्य पुरुषोंका प्रसंग आता है तो उनमें शेख मन्शूरका सादर स्मरण हो आता है । अनल हक—‘अहं ब्रह्मास्मि’ का यह दृढ़ विश्वासी था, यद्यपि उस समयके इस्लामी कानूनोंके पंडितोंने ‘मैं खुदा हूँ’ यह कहनेके कारण उन्हें मारने योग्य