कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
निरंजनकी तपस्या और मान सरोवर तथा सुन्नकी प्राप्ति
तब सुत सोच कीन्ह मनमाहीं । पिताका भेद बतावत नाहीं ॥
आपु आपु कह सुत सब रुठे । माता वचन कहै सब झूठे ॥
तब माता कहै वचन रिसाई । पिताको दरश करहु तुम जाई ॥
माता कहै फूल लै धावहु । पिताको शीश परसिके आवहु ॥
पुहुप समाधि वासले धाओ । पिताके शीश परसिके आओ ॥
चले पुत्र पिताकी आसा । पिता रहे पुत्रनके पास ॥
खोजत बहुतदिवस चलि गयऊ । पिताको दरस कतहुँ नहि भयऊ ॥
तीनों सुत सो दरशन भयऊ । पिता निकट सुत दूर सिधयऊ ॥
पिता निकट सुत दूर सिधाये । खोजत कतहुँ अन्त नहि पाये ॥
खोजि थाक माता पहुँ आये । कोहु साँच कोहु झूठ सुनाये ॥
ब्रह्महि भाषा झूठ संदेसा । सकुचि वचन नहि कहो महेसा ॥
भाषा विस्नु सत्यकी रेखा । खोजी थाकि पिता नहि देखा ॥
माता बिहँसि कही तब बानी । ब्रह्मा झूँठ झूँठ तौ खानी ॥
शिव लजाय शिर नीचे राखा । सांच झूँठ एको नहि भाखा ॥
ताते करहु योग तप जाई । जटा बढ़ाय विभूति रमाई ॥
तुम सुत करो योग तप जाई । शीस जटा तन भसम चढाई ॥
लेहुआ मंडल भेषसो कीन्हौ । शिवको थापि भवानी दीन्हौ ॥
साखी—जप तप योग समै दूढ, आगे ध्यान पसार ।
माता कह्यो क्रोध करि, चतुर मुख अन्ध अहार ॥
मातहिँ कीन्ह विस्नु पर दाय । मुखहिँचूमिके कंठ लगाया ॥
सत्य वचन सुत बोलेउ बानी । तीनहुँ लोक करहु रजधानी ॥
शिव ब्रह्मा करिहँ तोर सेवा । गण गंधर्व रिषि मुनिदेवा ॥
ब्रह्मा मोसों झूँठ लगावा । तेहि कारण बिधि झूँठ कहावा ॥
ब्रह्मा वेद पढे बहु भांती । कुकरम करदिवस औ राती ॥
झूठी बात वेद निरमाई । चार वरनमें बडी बढाई ॥
पहिले चारों वरन पुजावै । दछिणा कारण गरा कटावै ॥
गरा कटाए करावै पूजा । गाय भँसमें ब्रह्म न दूजा ॥
लिये मूँड पडिवो रमाई । ब्राह्मण भये सो काल कसाई ॥
खाये अखज चले अरडाई । जस मड वाको श्वान अघाई ॥
ब्राह्मणहूको झूठी आसा । हरि नहि भजे न हरिके दासा ॥
कह कवीर ब्रह्मा कहँ रोए । उत्तम जन्म पाए जड खोए ॥
निरंजनको सृष्टि रचनाका साज मिलना
झूठी बात वेद निरमाई । चार बरन आश्रमहिं दिढाई ॥
रिषि अठासी सहस्र बखानी । ते ब्रह्माके सुत उत्पानी ॥
जेते रिषि तेते मतधारी । अस्तुति करिहैं सब तुम्हारी ॥
ब्रह्मादिय मुनि देव गण भारी । अस्तुति करिहैं विस्नु तुम्हारी ॥
निसिदिन ध्यान पिताको धरिहो । किंचित ध्यान जोत अनुसरिहो ॥
साखी-विचलि गयउ निजनामको, गहे कुमारग जानि ।
तीनलोक गुन विस्तरेऊ, निरंजन आदि भवानि ॥
कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । दोऊ मिलि यह यहमत परकासा ॥
यह सब खेल कामिनी कीन्हा । निरंजन बास शून्यभौ लीन्हा ॥
जोति निरंजन ध्यान लखाई । शिव ब्रह्माको भेद सुनाई ॥
सेवहु विस्नु निरंजन ध्याना । हेसुत वचन निश्चय मम जाना ॥
जाते ज्ञान अगम फैलैहो । जाते तामस सिद्ध कहैहो ॥
सिद्धनका मत होइहै भारी । ज्ञान अगमगुण होहि भिखारी ॥
अंश दहन तन तामस भारी । असुर भाव पशु अवतारी ॥
मत पाखंड ठगोरी टोना । षट् दरशन पाखंड सिखलोना ॥
यंत्र मंत्र विषया अधिकारी । अन्तरध्यान भगत तुव धारी ॥
तब गुण सहस्र नाम ऊचरिहैं । एक अंश चौसठ योगिन होइहैं ॥
कर खपर लें मंगल गैहैं । यहि उपदेश महादेव दैहैं ॥
शंकर चिह्न इहै सौ पैहैं । सिवको भगत तेहि लोके जैहैं ॥
रज रुचि सतगुन दया समानी । असुर हतन भक्तन रजधानी ॥
आगम कहो संघ सुनि लीन्हैउ । जहाँ जसभाव तहाँ तस कीन्हैउ ॥
चारि खानि ब्रह्मै निरमाई । चार वेद मत चार चलाई ॥
शिवको वरन भेद नहिं होई । क्रोधरूप धरि भेष विगोई ॥
माता विस्नुपर दया कीन्हौ । पिता दिखाय निकटहि दीन्हौ ॥
अनुभव दया विस्नु जब पावा । पिता दास भया सुखपावा ॥
पिताको दरस विस्नु जब पावा । तब माता कह शीश नवावा ॥
माता पिता एक ह्वै गयऊ । विस्नु देखि चित हर्षित भयऊ ॥
जोतिहि जोत एक होय गयऊ । आप भान विस्नु भुलयऊ ॥
माता पिता सुत एक भयऊ । विस्नु समाज जोतिमहँ गयऊ ॥
तेहि पाछे जग सिरजे लऊ । ताको वरन सविस्तर कहऊ ॥
प्रथमें चारि खानि निरमाई । लछ चौरासी जोनि बनाई ॥
सहजका धर्मरायके पास जाकर पुरुषकी आज्ञा सुनाना
चारि खानिकी चारिउ बानी । उपजी तीन लोक सहिदानी ॥
चारि खानि रचि कियो पसारा । चारि वरन पाषण्ड सँवारा ॥
चौदह भुवन करयो विस्तारा । चौदह जमको राज पसारा ॥
लछ चौरासी जोनी कीन्हा । चारि खानि महाँ एकहि चीन्हा ॥
लछ चौरासी बचन बखाना । चारि खानि जिव एकैसाना ॥
रचना रची स्त्रिस्ट बहु रंगा । सुर नर मुनि गये कामतरंगा ॥
कामदेवकी कला अनंगा । पशु पंछी सुर नर मुनि सँगा ॥
कामकला सबही भरमावै । शिव सकती रंग काम लगावै ॥
उत्पति प्रलय रची अविनाशी । कामिनि काम कालकी फाँसी ॥
कनक कामिनि फन्द बतावा । तेहि फंदे सबही अरुझावा ॥
कनक कामिनी फन्दा कीन्हा । चार खानिमें एकै चीन्हा ॥
नर वानर कीट पतंगा । सबके की रखवारी कर संगा ॥
नर नारि जत खान सँवारी । सब घट काम करै रखवारी ॥
पशु पंछी जत कीट पतंगा । रच्छक भच्छक सबके सँगा ॥
स्वासा सार होय गुँजारी । पांचों तत्त्व सँग विस्तारी ॥
पांचों तत्त्व तुरै बल जोरा । तापर चढे साहु औ चोरा ॥
चारिउ खानि हाय गुंजारा । स्वासा चलै अखंडित धारा ॥
देहदसा जस पुरुष सँवारा । तँसी देह रची करतारा ॥
पांच तत्त्व तीनों गुण साजा । आठ काठ पिंजरा उपराजा ॥
अष्टंगी तहाँ आप विराजे । अष्ट धातु मिलि रूप विराजे ॥
पिंजरामें सुगना एक रहई । बाकी गति मंजारी लहई ॥
सुवा सुख पिंजरा महाँ माने । तके मंजरी सो नहि जाने ॥
सुगना पढै दिवस औ राती । रछक पिंजरा ऊपर सँघाती ॥
रछक भच्छक संग रहावै । सदा पढावै घात लगावै ॥
बैठे दोऊ अपने दावा । एक घातक यक सुआ पढावा ॥
जस सुआ पिंजरा महाँ गहई । ऐसो देह प्राण दुख सहई ॥
नख शिख रचा काल फूलवारी । फूली बास कुबास सवारी ॥
कनक कामिनि काल बनाई । चारि खानि महाँ रहा समाई ॥
कामिनि काम सँवारे जानी । चारिउ खानि रहा विकशानी ॥
चारि खानि महाँ स्वास अमाना । काल कुटिल तेहि माहिँ समाना ॥
काल करमकी खानि बनाई । शिव शकती महाँ रहा समाई ॥
निरंजनका कूर्मके पास साज लेनेको जाना वहुरि पुरुषका सहजको निरंजनके निकट भेजना
दया छमाकी खान बनाई । नर नारि महँ रहा समाई ॥
सुर नर मुनि सबही कह डहकै । चारि खानि सबके घट महकै ॥
चारि खानिकी सब उत्पानी । जेतिक तीन लोक सहिदानी ॥
तीन लोक स्वासा विस्तारा । स्वासाते भा सकल पसारा ॥
स्वासा संग काल अवतारा । बिष अमृत दोनों संचारा ॥
स्वासा संगम काल औ काली । स्वासा संग भये वनमाली ॥
प्रकृत पचीस संग जंगाली । पंच पांच दश माल तमाली ॥
चन्द्र सूर स्वासा संग पूरा । इंगला पिंगला सुषमनि जोरा ॥
साखी-स्वासा सँग स्वासा, तेहिंते उपजा बरियार ।
चन्द्र सूर्य हैं स्वासामध्ये, सकल विधि विस्तार ॥
सिवसकती सुखधाम है, जो चित ज्ञानसमाय ।
सुखसागर अभिराम है, काल दगा मिट जाय ॥
इति प्रमाण श्वासगुंसजारका ।
प्रमाण अम्बूसागरका ।
देखो प्रकरण ४६ पृष्ठ. ६१
धर्मदास बचन—चौपाई ।
धर्मदास टेके गुरु चरण । अगम कथा भाषेउ प्रभु वरणा ॥
बहुतक ग्रन्थ सुनायउ काना । अम्बूसागर ग्रन्थ बखाना ॥
मुनि हितबचन मोहिं प्रियलागा । चातक स्वाति पायजिमि पागा ॥
जुग अनुमान कहो मोहिं भाषी । और शब्द कहँ चित अभिलाषी ॥
सतगुरु बचन—चौपाई ।
धरदास मैं भाषि सुनाऊँ । आदि अरु अंत प्रसंग बताऊँ ॥
जा दिन पुरुष बोल अनुसार । एक सबद ते कीन्ह पसारा ॥
वानीते माया उत्पानी । तीन पुत्र तिन कीन्ह ठानी ॥
ब्रह्मा विस्तु महेशर कीन्हा । तीन लोक तिहु पुत्रन्ह दीन्हा ॥
ब्रह्मा हाथ चार दिय वेदा । तीन लोक महँ करत निखेदा ॥
नेम धरम अरु सकल पुराना । यह ब्रह्मा सब कीन्ह बखाना ॥
विस्तु देव मृत्यु लोकहि आये । तुलसी माला पंथ चलाये ॥
माला गले संखिनी डारा । तीन लोक महँ है बड भारा ॥
राजा प्रजा सेव सब करई । बिस्तु इष्ट सुमिरण मन धरई ॥
सेवत आये भये अनुरागी । करत सँहार कहत हम त्यागी ॥
सहजका निरंजनके निकट पहुँचना
जार वारि तन कष्ट कराई । जोग पन्थ यहि भौति चलाई ॥
जोगी जती तपी संन्यासी । आपन मुख कह हम अविनासी ॥
सिव महिमा भाषत संसारा । दछिन दिसि महिमा अधिकारा ॥
तीन पुत्र तिहुँ लोक सपूता । माता सों इन कीन्ही धूता ॥
माया कहँ माने नहि कोई । आपहि आप कहावे सोई ॥
अर्घा लीला ।
तब अद्या मन कीन्ह विचारा । तीन पुत्र ये सिरजनहारा ॥
माया मन झंखे बहु वारा । तीनों पुत्र भये बरियारा ॥
नाम हमार दीन्ह छियाई । तीन लोकमहँ अदल चलाई ॥
तब अद्याघट सुमिरन लायी । आपन माहि आप निरमायी ॥
देवी आपनो मथ्यो सरीरू । शकती तीन उपजी बल वीरू ॥
तिनका नाम कहँ समझाई । रम्भा सुचिल रेणुका आई ॥
इन हिलिल मिलि गन गंध्रव मोहा । राग रागिनी बहुविधि सोहा ॥
कर आभूषण गंध्रव लीन्हे । सकल साज तिन हाथन दीन्हे ॥
तिनका नाम कहँ समझाई । वीन रखाव तमूरा लाई ॥
सितार कमायच अरु मुहचंगा । ताल मृदंग नफीरी संगा ॥
जलतरंग मुरली किकिन । मौहर उपंग मंडल स्वर तितिन ॥
बाजे और छतीसों कहिया । गन्ध्रव हाथ साथ सब लहिया ॥
मास महीना फागुन सोई । ऋतु बसन्त गावें नर लोई ॥
टेसू वनस्पती सब फूले । अम्बा मौर डार सब झूले ॥
चात्रिक धारहि बचन सुहावन । हंस कोकिला कोयल पावन ॥
पिउ पिउ चात्रिक प्रिय कहहीं । विरहिनि लाग मदन दुख जरहीं ॥
अंग अबीर गुलाल चढ़ाये । नाना भांतिन अतर लगाये ॥
कामिनि हेतु काम लव लाये । अंग अनंग बहुत विधि छाये ॥
या चरित्र माया उपराजा । तीनहुँ लोक राग बल गाजा ॥
जो सुन राग विषय मन धरहीं । बार बारते जम घर परहीं ॥
अविगत मोह राग रे भाई । राग सुनत जिव गै डहकाई ॥
माया धुनि रागनको बांधा । जासे तीन लोक घर सांधा ॥
प्रथमहि राग षष्ठ विधि गावा । तिन रागन का नाम सुनावा ॥
रागोंके नाम ।
भैरों और हिंडोल अति, माल कोस पुनि जान ।
दीपक मेघ मलार भल, कीन्ह देव पहिचान ॥
आद्याकी उत्पत्ति सत्यपुरुषका आद्याको मूल बीज देना पुनि पुरुषका निरंजनके ढिग जाना
चौपाई ।
कीन्ह उचार राग तेहि वारा । ऋषिमुनि मोह देव सब झारा ॥
माया डारी सब पर फांसी । योगी जती तपी संन्यासी ॥
ततछन देवि रची धमारा । इकसठ रागिनी तहां उचारा ॥
तेहि रागिनिके नाम सुनाऊँ । भिन्न भिन्न कर प्रगट बताऊँ ॥
इकसठ रागिनियोंके नाम ।
१ धनाश्री २ जंतश्री ३ मालश्री ४ श्री ५ गुजरी ६ विरावरी ७ आशावरी
८ जंतसारी ९ गन्धारी १० वरारी ११ सिन्धूरी १२ पञ्चश्री १३ गौरी १४
जौनपुरी १५ विहागरा १६ कान्हरा १७ केदारा १८ मारू १९ मलार २०
धूरिया मलार २१ गोडमलार २२ गडमलार २३ भूपाली २४ सुरकली २५
श्रीमाल २६ धूरकली २७ रासकली २८ रूपकली २९ गुनकली ३० सुहेली
३१ मोरबी ३२ पूर्वी ३३ कैंरबी ३४ भैंरबी ३५ कान्हरा ३६ तिल्लाना ३७
कल्यान ३८ यमन ३९ कल्यानी ४० सजीवनी ४१ सैधू ४२ मधुगन्ध ४३ सावन्त
४४ ललित ४५ सोरठ ४६ मरहठी ४७ टोडी ४८ नट ४९ गोड ५० विभास
५१ सुदेस ५२ सूहा ५३ परज ५४ काफी ५५ चन्द ५६ सुधराय जैजैवन्ती ५७
चर नायका ५७ सारंग ५९ बंगला ६० नायका ६१ खम्माच ॥
चौपाई ।
मोहे ब्रह्मा विस्तु महेशा । नारद सारद और गनेसा ॥
संकर जग महँ बड अवधूता । काम जाति होय रहे सपूता ॥
कहैवा भूल गये अनुरागी । काम विरह तन उठ उठजागी ॥
मदन अनुप राग है भाई । सत पुरुष सों विछुरन लाई ॥
सुरपति सनकादिक मुनि जेते । काम कला सब नाचे तेते ॥
देखत छबि मोहे सब झारी । सुर समान माया गहि मारी ॥
सकल देव जब गे अकुलाई । काहू कर मन थिर न रहाई ॥
बूझो पंडित सुर मुनि ज्ञानी । जा महिमा तुम करत बखानी ॥
वेद पुरान भागवत गीता । पढ़ि गुनि कहैं काल हम जीता ॥
तीनों गुन ईश्वर ठहरायी । माया फन्दा ताहि बनायी ॥
कैसे ताहि होय निस्तारा । जिन नहि माना सबद हमारा ॥
राघवानन्द नाम युग केरा । माया चरित कीन्ह तेहि बेरा ॥
तेहि दिन राग कीन्ह उचारा । सकल जीव इमि मार पछारा ॥
अब हंसन का भाषू लेखा । धरमदास चित करो विवेखा ॥
निरंजनका मानसरोवरमें आद्याको पाकर मोहवश हो उसे निगलजाना और सत्यपुरुषका शाप पाना पुरुषका शाप निरंजन प्रति
छन्द—ताहि जुग हम आय जीवन दीन्ह अग्नित पान हो ।
सहस सात उबारि जीवन जाय लोक समान हो ॥
पुरुष दर्शन कीन्ह ततछन रूप अविचल पाइआ ।
पुहुप सज्या वास कराइ फल अमृत ताहि चखाइआ ॥
सोरठा—तुम बूझहु धर्मदास, जुग जुग लेखा भाषेऊँ ॥
चीन्हे कोइ इक दास, जेहि सत गुरु दाया करें ॥
इति प्रमाण श्रीअम्बुसागरका ।
इति श्रीकबीर मन्शूर के प्रथमभागके प्रथम अध्यायका परिशिष्ट समाप्त ।
कबीर मन्शूर प्रथमभाग ।
द्वितीय अध्याय प्रारम्भः ।
प्रथम प्रकरण ।
कबीर साहबके प्राकट्यका उपक्रम ।
जैसा पूर्व प्रथम अध्यायमें वर्णन हो चुका है । निरञ्जन, अद्या, ब्रह्मा, विष्णु, शिव पाँचोंने मिलकर ख्रिस्टिका निर्मान कर लिया । फिर अपना राज्य स्थायी बनानेके लिये निरञ्जन भगवान्की इच्छानुसार जो सहस्रों धर्म पृथ्वीपर प्रचलित हुए, होते जाते हैं और भविष्यत्में होवेंगे सो सब अलख निरञ्जनकी ओरसे उन समस्त धर्मोंके निर्माणकर्ता तथा रचयिता विष्णु महाराज हैं, विष्णु, ब्रह्मा और शिव, सनकादिकर्तृषि मुनि मिलकर उनका प्रचार करते हैं, कितनेही थोडे और कितने बहुत कालतक प्रचलित रहते हैं फिर छिप जाते हैं, मनुष्य उसका अनुसरण करते हैं किन्तु उनको कुछ प्राप्त नहीं होता, उनसे हार्दिक कामना कदापि पूर्ण नहीं होती, सब बिफल मनोरथही रह जाते हैं । कालपुरुषने सब जीवोंको अपने जालमें फँसा लिया है, कोई जीव उसके चंगुलसे बाहर जाने नहीं पाता है । असंख्य युग इसी अंधकारमें बीत गये । कालपुरुषने सत्य पुरुषका नाम बिलकुल छुपा दिया । मनुष्योंको तनिकभी सुध नहीं रही कि, कालपुरुष कौन है और सत्य पुरुष कौन है ? इस बातसे वे पूर्णतया अनभिज्ञ
१ परिशिष्ट-इस ग्रन्थके अनुवाद कबीराश्रमाचार्य स्वामी श्रीयुगलानन्द बिहारीने ग्रन्थोसे संग्रहकर यहाँ आयोजित किया है ।
रहे । अद्या निरञ्जन तथा तीनों देवताओंने सबको अंधा कर दिया और काल निरञ्जन सदैव सबको भून भूनकर खाने लगे, कोई पथ तथा कोई युक्ति मनुष्यको भागनेकी नहीं मिलती, मनुष्योंका यह कष्ट और दुःख देखकर और उनकी रोलार्डि सुनकर सत्यपुरुष दयालु हुए और ज्ञानीजीको बुलाकर कहा कि, ज्ञानीजी । मृत्युलोक जाओ, क्यों कि, कालपुरुष समस्त जीवों को नितान्त ही कष्ट पहुँचा रहा है कोई मनुष्य मेरे लोकको आने नहीं पाता है, कालपुरुषने सबको फँसा लिया है । तुम जाकर मनुष्योंको उनकी नींदसे जगाओ और सत्य भक्तिमें लगाकर मेरे लोकमें ले आओ । जो कोई आपकी आज्ञाको स्वीकार करे उसको कालपुरुषके पंजेसे छुड़ाओ । सत्यपुरुषने जब ऐसी आज्ञा दी तब ज्ञानीजी सत्यपुरुषको प्रणाम करके सत्यलोकसे बिदा हुए और मृत्युलोककी ओर जीवोंकी रक्षाके लिये रवाना हुए ।
दूसरा प्रकरण
कबीर साहबका झाँझरी द्वीपमें आनेका वृत्तान्त ।
अद्या और निरञ्जन सत्यपुरुषका नाम छिपाकर तीनों लोकोंका राज्य करने लगे, सत्यपुरुषका पता अपने तीनों पुत्रोंको भी नहीं दिया, निरञ्जनने अपनी राजधानी झाँझरी द्वीपमें स्थिर की, जो सत्यलोकको चलनेपर भवसागरका पहला नाका है । ज्ञानीजी झाँझरी द्वीपमें आये और सत्यनामकी हँक लगायी, तब धर्मराय घमंडके साथ बोला कि, तुम कौन हो और कहाँसे आये और किस कारण आये हो, यहाँ तुम्हारा क्या काम है ? यह बात सुनकर ज्ञानीजीने उत्तर दिया कि, मेरा नाम ज्ञानी है, मैं सत्यपुरुषका अंश योगजीत हूँ और सत्यपुरुषकी आज्ञासे पृथ्वीपर जाकर मनुष्योंको मुबत कराऊँगा, कारण यह कि तुमने समस्त जीवोंको दुःख पहुँचाया और सत्यपुरुषके नामको छिपा दिया है, और मुक्तिमार्गके समस्त द्वार रोककर मनुष्योंको धोखा देकर धूर्ततासे मार लिया है । कोई मनुष्य नहीं जानता कि, मुक्तिमार्ग कौन है ? और किस-प्रकार हमारा बचाव हो ?
तीसरा प्रकरण ।
निरञ्जन और ज्ञानीजीका वार्तालाप ।
इतना सुनकर धर्मराज अत्यंत क्रुद्ध होकर कहने लगे कि, हे ज्ञानीजी ! सत्यपुरुषने तो मुझको तीनों लोकोंका राज्य प्रदान कर दिया, इसमें तुम्हारे
सत्यपुरुषका योगजीतजीको निरंजनके पास उसे मान सरोबरसे निकाल देनेकी आज्ञा देकर भेजना भवसागरकी रचना
हस्तक्षेप करनेकी क्या आवश्यकता है ? मैंने उसकी सेवा की और उसने मुझको राज्य प्रदान किया । तुम जीवोंको मुक्ति देने क्यों जाते हो ? तुमको क्या पड़ी है कि, मेरे राज्यमें बाधा उपस्थित करो । मैं तुमको मारूँगा, तुम बड़े समय पर आगये हो, देखूँगा अब तुम मुझसे किस प्रकार बचकर जा सकते हो ? यह कहकर धर्मराजने अपने अनन्त रूप बनाये और अत्यंत क्रुद्ध हो झुंझलाकर ज्ञानीजीके सामने आकर लड़नेके निमित्त प्रस्तुत हुआ ।
चौथा प्रकरण ।
ज्ञानी और निरंजनका युद्ध ।
(काल पुरुष और ज्ञानीजीके युद्धका वृत्तान्त)
काल निरञ्जन बड़े मस्त हाथीका स्वरूप धारण करके योगजीतके सामने आया और अपना दाँत मारा, तब आपने उसका सूँड पकड़कर उसपर एक ऐसा झटका दिया कि, वह दूर जाकर गिर पड़ा और अचेत हो गया, इस आघातसे उसे बहुत चोट लगी और उसका मस्तक नीला हो गया । जब अपने प्राणका भय देखकर धर्मराय पातालको भाग चला, तब योगजीतजीने उसका पीछा किया, उधर निरञ्जन भागकर कूर्मजीके पास गया और कहा कि, हे कूर्मजी ! मुझको तो योगजीतजीने मारकर भगा दिया, आप मुझको अपनी शरणमें रखो, मुझको सत्यपुरुषने तीनों लोकों का राज्य प्रदान किया था, सो योगजीतजीने मुझको मारकर निकाल दिया और मनुष्यकी मुक्ति करके सत्य-लोकको लेजाना चाहते हैं ।
नञ्जम ( उर्दू कविता ) ।
जब वह पीलमस्तानः आया वज्रज्ञ । वह खरतूम फटकारता वेदरञ्ज्ज् ॥
जगदीश आली न पहुँचान है । कि बाहरवयां शौकतो शान है ॥
कि आदममलिक जिसकी गातेहै गीत । सोई आप साहबं सोई योगजीत ॥
कयासो गुमां ब्रह्म है पाय लुंग । पड़े गार लाइलम तारीको तंग ॥
सकें कौन पहुँचान बह पाकजात । बयां वेद बानीसे बाहर सिफ़ात ॥
जिसे महकुर कुदशनासी बता । उसीकी करमसे सो पावे पता ॥
चला सामने उसके वह दू बहू । जहाँमें कोई न जिसका अदू ॥
हुवा कैल आमादः पैकारको । न माना न जरना जहाँदार को ॥
लगाया तमाचा पकड़ सुण्डको । परीशां किया पीलके झुण्डको ॥
सिन्धु मंथन और चौदह रत्न उत्पत्ति
पड़ा दूर तब काल बेताब हो । कि जोंनीलफर खुशक बेआब हो ॥
रही ताबो ताकत न कत्तालको । चला भाग तब काल पत्तालको ॥
जवामर्दगें जब न ताकत रही । दिया छोड तब तख्त शाहंशही ॥
रही बाकी जब और कोई न राह । लिया जाके तब कूर्मजीकी पनाह ॥
जब काल पुरुषने भागकर कूर्मजीकी शरण ली, तब कबीरसाहब उसका पीछा करते हुए पाताल लोकको गये आपको देखकर कूर्मजी खड़े हो गये और निवेदन करने लगे कि, आप कौन हो और कहाँसे आये हो ? तब कबीरसाहबने कहा कि, मेरा नाम ज्ञानी है, और मैं सत्यपुरुषकी आज्ञासे मनुष्योंकी मुक्तिके लिये भवसागरमें जाता हूँ । यह बात सुनकर धर्मराजजी बोले कि, 'ज्ञानीजी महाराज ! मेरी बात सुनो और अपने मनमें विचार करो कि, मैंने सत्तर युग-तक एक चरणसे खड़ेहोकर बन्दना की, तब सत्यपुरुषने दयालु होकर मुझको तीन लोकका राज्य प्रदान किया और अब उसके विरुद्ध अज्ञा कब्रों दिया ? सत्यपुरुषकी समस्त सन्तान अपने अपने राज्यमें अधिकार भोग रही है । मेरेही ऊपर आप क्यों रुष्ट हुए ? आपकी जैसी आज्ञा हो मैं उसको करूँ ।
इस बातपर कुर्मजीभी हाथ बांधकर कहने लगे कि, हे ज्ञानीजी महाराज ! मैं आपसे निवेदन करता हूँ यदि आप स्वीकार करें और हे निरञ्जन महाराज ! जो आप भी स्वीकार करें तो मैं कहूँ । तब दोनोंने अपनी स्वीकृति प्रकट की तब कूर्मजीने कहा कि, "जो कोई ज्ञानिजीका, पान पावे और उनका आज्ञाकारी हो उसको निरञ्जन किसी प्रकारका बाधा न देवे, इसके अतिरिक्त जितने जीव हैं वे सब कालपुरुषके फंदमें पड़ेंगे" इस बातपर ज्ञानी तथा कैल दोनों सहमत हुए, फिर निरञ्जनजी अपनी राजधानी झांझरी द्वीपको गये और कबीर साहब भी उनके साथ आये ।
पाँचवाँ प्रकरण ।
ज्ञानीजी (कबीर साहब) और धर्मराजका वार्तालाप ।
धर्मराजने कबीर साहबसे निवेदन किया कि, सत्यपुरुषने तो मुझको तीनों लोकोंका राज्य प्रदान किया है आपभी कृपाकर मुझको यह प्रदान करोगे तो बड़ी दया होगी और मेरा कार्य पूर्ण होगा, तब कबीर साहबने कहा कि, ऐ धर्मराज ! मैं सत्यपुरुषकी आज्ञासे आया हूँ और मनुष्योंकी मुक्ति करूँगा, यदि तुम इस बेर मेरी आज्ञा न मानोगे तो मैं तुमको मारकर निकाल दूँगा । तब निरञ्जनजी अत्यंत नम्रतापूर्वक निवेदन करने लगे कि, मैं आपका सेवक हूँ
द्वितीय तृतीय बार सिन्धुमंथन
आप किसी अन्य ध्यानको मनमें आने न दीजिये और ऐसा न कीजिये कि, जिसमें मेरा काम बिगड़े; आप यह भी सुन लीजिये कि, यदि आप पृथ्वीपर जावेंगे तो कोई मनुष्य आपका कहना न मानेंगे, बरन् आपको तुच्छ बनानेका उद्योग करेंगे और मेरी ओर होकर आपसे वादविवाद तथा बँर करेंगे।
छठी प्रकरण ।
निरञ्जनके जालका वर्णन ।
मैंने समस्त मनुष्योंकी बुद्धि पर परदा डाल दिया है और सबको अचेत कर, दिया है, मैंने सब मनुष्योंके फँसानेके लिये ऐसे ऐसे जाल रच रखे हैं कि, 'इन्होंने' समस्त मनुष्य फँसे हुए हैं। वेद, शास्त्र, तीर्थ, व्रत मूर्तिपूजा, यंत्र, मंत्र हवन यज्ञ, आचार, बलिदान, मांसभक्षण, मदिरापान, परस्त्रीगमन आदि सहस्रों प्रकारके फँदे मैंने बनाये हैं, इनसे बचकर कोई मनुष्य निकल नहीं सकता है। और मेरे तीनों पुत्र भी बड़े शूरवीर हैं, वे तीनों लोकोंके सरदार हैं। यदि आप पृथ्वीपर जाओगे तो आपकी बातको कोई नहीं मानेगा, मैंने समस्त मनुष्य की बुद्धिको अंधेरे कुएँमें डालदी है, प्रत्येकके हृदयमें मेरा स्थान है, सदाकाल सब स्थानोंमें मैं उपस्थित रहता हूँ, किसीकी सामर्थ्य नहीं है कि मेरी सेवासे बाहर जासके, जब जैसा मैं चाहता हूँ तब तैसा मनुष्यकी बुद्धिको फेर देता हूँ, समस्त जीवोंकी बुद्धि मेरे अधीन है।
निरञ्जनकी बात सुनकर कबीर साहबने उत्तर दिया कि, हे काल बटमार। जिस जीवको मैं अपना शब्द सुनाऊँगा उसके ऊपर तुम्हारा कुछ बश नहीं चलेगा, मैं तुम्हारे समस्त फंदोंसे उसको स्वतंत्र कर दूँगा तुम्हारा बल तथा मंत्र उसपर व्यर्थ हो जायगा। फिर निरञ्जनने कहा कि, पृथ्वीपर आप एक पंथ प्रचलित करोगे तो मैं अनेक पंथ चलाऊँगा और वह समस्त धर्म आपके धर्मकी नकल करेंगे, कितने धर्म ऐसे होंगे कि, जो प्रत्यक्षमें तो आपके धर्म कहलावेंगे और यथार्थमें उस धर्मके माननेवाले सब मेरे दास होंगे।
यह बात सुनकर ज्ञानीजीने कहा कि, जो कोई मेरा नाम लेगा और मेरी भक्ति करेगा मैं उसको अपने निजके हँसोंके साथ अपने लोक को पहुँचाऊँगा, तेरी तदबीर और तेरी धूर्तता काम न देगी ॥
आद्याका तीनों पुत्रोंको सृष्टि रचनेकी आज्ञा और पांच खानकी उत्पत्ति
सातवाँ प्रकरण ।
निरञ्जनका कबीर साहबसे वरदान माँगना ।
जब काल निरञ्जन जान लिया कि, ज्ञानीजीसे पार पाना टेढ़ी खीर है, तब वह बड़ी दीनतासे विनय करने लगा कि, एकवचन आप मुझको दीजिये, । तब ज्ञानीजीने कहा कि, माँगो ? तब निरंजनने कहा कि, तीन युग अर्थात् सत्य-युग, त्रेता और द्वापरमें थोड़े जीव मुक्ति पावें, पर कलियुगमें विशेष जीव मुक्ति पावें । यह वचन आप मुझको दीजिये, तब पृथ्वीपर पधारिये । यह बात सुनकर कबीर साहबने कहा कि ऐ काल ठग ! तू मुझको ठगा चाहता है कि, तीनों युगोंमें थोड़े जीव मुक्ति पावें, अस्तु ! जो कुछ तूने माँगा मैंने तुझको प्रदान कर दिया, पर जब चौथा कलियुग आवेगा, तब पृथ्वीपर मैं अपने अंगोंको भेजूंगा कि, वे बड़ी धूम धामसे मेरा पंथ प्रचलित करेंगे और इस तरह अरबों खरबों जीवोंको अपने लोकको पहुँचाऊँगा वे सब तेरे कपटजालसे छुटकारा पावेंगे । फिर निरंजनने निवेदन किया कि, जब कलियुगमें मेरा अवतार होगा और मेरा नाम जगन्नाथ होगा, उस समय समुद्र मेरा मन्दिर तोड़ दिया करेगा, तब आप कृपा करके मेरे मन्दिरकी स्थापना करा देवें और समुद्रको स्थिर कर देवें । ज्ञानीजीने यह बात भी उसकी मानली । फिर निरंजनने निवेदन किया, आप अपना शरीर भी मुझको प्रदान कीजिये, फिर ज्ञानीजीने धर्मराजको शिरवाली देह भी दिया । इसी कारण यह कालपुरुष जब चाहे तब शिरवाली और जब इच्छा हो बेशिरकी देह प्रगट कर सकता है नहीं तो यथार्थ में कालपुरुषका शरीर बिना मस्तकका है और कबीरसाहबका शरीर शिर सहित है ।
आठवाँ प्रकरण ।
छाया (विराट्) पुरुषका वृत्तांत ।
इस विषयको साध लोग भली भाँति जानते हैं, जो विराट् पुरुषकी साधना किया करते हैं, वे स्पष्ट रूपसे विराट् पुरुषको आकाशमें देखते हैं । जो सदैव इस बातपर दृष्टि रखते हैं, उन्हें सदैव वह विराट् पुरुष आकाशमें दिखलाई देता है, जब छः मास उनकी मृत्युके रह जाते हैं उस समय विराट् पुरुष उनको बिना मस्तकके दिखाई देता है । तब साधु जान लेते हैं कि, उनकी मृत्युमें छः मास शेष बचे हैं । कारण यह कि, कालपुरुषने अपनी प्राकृतिक शरीरको अब दिखलाया है । उस समयसे साधु चैतन्य और चौकस हो जाते हैं और जब मृत्युका दिवस तथा समय ठीक आन पहुँचता है, तब प्राणायाम करके समाधि
लगा जाते हैं और अपने प्राणको खींचकर वशवें द्वार पर पहुँचा देते हैं, वहाँ पर कालकी पहुँच नहीं होती। वे जाने रहते हैं कि, कितने समय पर्यन्त मृत्युका आक्रमण है, उतनी देरतक प्राणको नीचे नहीं उतारते और जब मृत्युका समय जाता रहता है और काल निराश होकर पलट जाता है, तब फिर अपने प्राणको नीचे उतारते और फिर प्रसन्नतापूर्वक निर्भय होकर जीवन व्यतीत करते हैं। इसी प्रकार साधु लोग मृत्युसे बचते हैं और काया कल्प करके बुढ़ापे तथा निर्वलताको दूर करते हैं।
नवों प्रकरण ।
निरञ्जनका ज्ञानीजीकी अधीनता स्वीकार करना ।
इसी प्रकार निरञ्जनने बहुत कुछ माँगा और कबीरसाहबने उसको दिया तब धर्मराजने उठकर कबीरसाहबको दंडवत् प्रणाम करके कहा कि, जो जो मनुष्य आपका आज्ञाकारी होगा और आपकी भक्ति और स्तुति करेगा तथा आपका पान पावेगा उसके समीप मैं कदापि नहीं जाऊँगा, शेष लोक तथा वेदके सब जीव मेरे अधीन रहेंगे, इसके अतिरिक्त कितनी बातें हुईं सो यहाँ थोड़ासा लिखा है। धर्मराजने अपने लोकमें रहे और कबीर साहब पृथ्वीको चले, जब आप पहले पृथ्वीपर आये उस समय सत्ययुगका समय था।
यहाँ पाठकोंकी आसानीके लिये निरञ्जनगोष्ठी दे दिया जाता है—
निरंजन गोष्ठी ।
अर्थात् सत्य लोकसे जीवोंको बचानेके लिये ज्ञानीजी (कबीर साहब) का पृथ्वीपर आते समय निरंजनसे बातलाप ।
ज्ञानी वचन ।
काल निरंजन निरगुनराई । तीन लोक जिहि फिरी दुहार्ई ॥
सात दीप पृथ्वी नौ खण्डा । सप्त पताल इक्कीस ब्रह्मण्डा ॥
सहज सुन्नमें कीन्ह ठिकाना । काल निरंजन सबहीने माना ॥
ब्रह्मा विस्तु और सिव देवा । सब मिल करें कालकी सेवा ॥
चित्रगुप्त धरम बरियारा । लिखनी लिखें सकल संसारा ॥
चौरासी लाख अरु चारों खानी । लिखनी लिखे सकल सब जानी ॥
पसु पंछी जल थल विस्तारा । वन परवत जल जीव विचारा ॥
काल निरंजन सबपर छाया । पुरुष नामको चिह्न मिटाया ॥
सत्तर युग ऐसेही चल गयेऊ । पुरुष शब्द एक चितमें ठयेऊ ॥
ब्रह्माका पिताकी खोजको जाना
पुरुष वचन ।
तबहीं पुरुष ज्ञानीसों कहेऊ । धर्मराय अतिप्रबल जो भयेऊ ॥
यह तो अंश भया बरियांरा । तीनलोक जिव कीन्ह अहारा ॥
ताहि मारकै देव उठाई । जग जीवनको लेव छुड़ाई ॥
ज्ञानी वचन ।
साखी—करि परनाम ज्ञानी चले, करन हंसके काज ।
जोपै काल न मानि है, तुम्ही पुरुषका लाज ॥
मान सरोवर ज्ञानी आये । काल कठिन तब छेका धाये ॥
काल कठिन गरजे बहु बारा । मस्तक साठ सँड बरियांरा ॥
सत्तर योजन गजके दंता । परलय कीन्हो काट अनंता ॥
काग एक आँखे चौरासी । औसुख आठ हाथ लिये फांसी ॥
छत्तीस नाम ताहि पुनि जानी । बोले वचन बहुत इतरानी ॥
तीन दंत पाछेको फेरी । यहि विधि तीनलोक किये जेरी ॥
एक दंत पाताल चलावा । तहां जाय वासुकको खावा ॥
दूजो दंत पृथ्वी चलि आये । देव रिषि जग दैत्यन खाये ॥
तीजो दन्त गयो आकासा । चंद्र सूर खायो कैलासा ॥
ब्रह्मा वेद पढत तहां आये । शंकर ध्यान करत तब खाये ॥
लीन्हें खाय विस्तुको धाई । सकल खाय पुनि धूर उड़ाई ॥
गरजे दन्त अग्नि सम भाई । तीन लोक खाई दुनियाई ॥
ज्ञानीवचन ।
ज्ञानी देखे द्विस्टि पसारा । यातें नाहिं बचे संसारा ॥
ज्ञानी बोले शब्द बरियाई । तूँही काल खाइ दुनियाई ॥
निरञ्जनवचन ।
सा०—जाहु ज्ञानी घर आपने, मानों वचन हमार ।
तीन लीक पुरुषहिं दिये, स्वर्ग पताल संसार ॥
ज्ञानीवचन ।
मुहि जो पठयो पुरुषको, करन हंसके काज ।
कालहि मार संहारि हों, दीन्ह सकल मोहे साज ॥
बोले ज्ञानी सब्द अपारा । मोकहैं दीन्ह पुरुष टकनसारा ॥
मारों काल शब्दका झारा । टूटे दन्त न करै पसारा ॥
विष्णुका पिताकी खोजका वृत्तान्त आद्यासे कहना पिताके खोजमें गये हुए ब्रह्माकी कथा
निरञ्जनवचन ।
तबै निरंजन बोले बानी । कैसे हंस छुडावो ज्ञानी ॥
जगके माहँ कीन्ह हम बासा । पसु पंछी जल थलमें आसा ॥
तिनसौ साठ पैठ हम लाये । तामें सकल जीव उरझाये ॥
जे दिनते हम पैठ लगाहीं । दिन दिन उरझे सुरक्षत नाहीं ॥
तापर काम क्रोध हम डारी । तृष्णा सकल जीवकहँ मारी ॥
इनमें जीव बन्धे सब झारी । कैसे हंसहि लेव उबारी ॥
तापर कीन्हो एक हम काजा । पाप पुन्य थापे हम राजा ॥
सुभ अरु असुभ दोई दल साजा । ऐसे अलख निरंजन राजा ॥
ज्ञानीवचन ।
सत् शब्द हम बोले बामी । वचन हमारे छूटे प्रानी ॥
गहै शब्द जब मन चितलाई । भजिहै काल जिव लेव छुडाई ॥
काल-निरंजन वचन
तबै काल अस बोले बानी । सकल जीव बस हमरे ज्ञानी ॥
तिनसौ साठ पैठ उरझेरा । कैंसै हंसन लेव उबेरा ॥
गंगा जमुना सरसती ज्ञानी । पुष्कर गोदावरी कुतका मानो ॥
बद्री केदार हमका ठाऊँ । जहाँ तहाँ हम तीरथ लगाऊँ ॥
मथुरा नगर उत्तम जो जानी । जगन्नाथ जस बैठे ध्यानी ॥
सेतबन्ध पुन कीन्ह ठिकाना । पुष्कर क्षेत्र आय हम थाना ॥
हिंगलाज जिव जैहै सोई । कालका नगरकोट मह होई ॥
गढ गिरनार दत्तको थाना । ताहि घेर हम बैठ निहाना ॥
कमरू माह कमच्छा देवी । नीमखार मिसरख जम लेवी ॥
नगर अजुध्या रामहिं राजा । खैहैं दइत बांध सब साजा ॥
याही पैठ जग जीव भुलाई । किहि विधि हंस लेव मुक्तार्ई ॥
ज्ञानीवचन ।
तब ज्ञानी अस बोले बानी । जमतें जीव छुडावहूँ आनी ॥
पुरुष नामको कहूँ समझार्ई । जम राजा तब छोड परार्ई ॥
घाट बाट बैठे उरझेरा । हमरे शब्दतें होय निबेरा ॥
सुनु रे काल दुष्ट अनयार्ई । शब्द संग हंसा घर जार्ई ॥
निरंजन वचन ।
का ज्ञानी देहो अधिकारा । हमरो नहि छूटे जम जारा ॥
ब्रह्माके लिये आद्याकी चिन्ता, गायत्रीकी उत्पत्ति ब्रह्माका गायत्रीकी खोजमें जाना ब्रह्माको जगानेके लिये आद्याका गायत्रीको युक्ति बताना
पांच पच्चीस तीन गुन आही । यह लै सकल शरीर बनाई ॥
तामैं पाप पुन्यका वासा । मन बैठे ले हमरी फांसा ॥
जहां तहां सब जग रमावै । ज्ञान संधि कछु रहन न पावै ॥
एक शब्दकी केतक आसा । हमरे है चौरासी फांसा ॥
ज्ञानी वचन
बोले ज्ञानी शब्द बिचारी । छूटे चौरासी की धारी ॥
छूटै पांच पच्चीस गुन तीनो । ऐसो शब्द पुरुष मुहि दीन्हो ॥
निरञ्जन वचन ।
हे ज्ञानी का करों बड़ाई । हमते नाहि छूट जिव जाई ॥
इतने जुग भये का तुम देखा । ज्ञानी हंस न एकै पेखा ॥
का तुम करो का सब्द तुम्हारा । तीन लोक परलय तर डारा ॥
साधु सन्त हम देखी रीती । परलय परे सकल सब जीती ॥
करम रेख बांधै सब साधा । सुर नर मुनि सकलो जग बाँधा ॥
ज्ञानी वचन ।
ज्ञानी कहै काल अन्यायी । सब्द बिना तू खाय चबाई ॥
अब तुम कस खैहो बटसारा । पुरुष सब्द दीन्हो टकसारा ॥
जगके जीवन लेऊँ उभारा । करम लेख तोरो घर न्यारा ।
पांच पच्चीस और गुन तीनो । इतने मोर हंस लेऊँ छीनों ॥
पांच जनेकी मेटौ आसा । पुरुष सब्द भाषौ विस्वासा ॥
सुभ अरु असुभ का करे निबेरा । मेटों काल सकल उरझेरा ॥
निरञ्जन वचन ।
तिरगुन काल तब बोले बानी । उरझे जीव सकल जमखानी ॥
कैसे के तुम शब्द पसारो । कौने विधि तुम जीव उबारो ॥
ऐसे जीव सकल हैं करनी । कैसे पहुँचैं पुरुषके सरनी ॥
जगमें जीव क्रोध विकरारा । कैसे पहुँचैं पुरुषके द्वारा ॥
क्रोधी जीव प्रेत अभिमानी । धरिहैं जन्म नरककी खानी ॥
लोभी होय सरप विकरारा । माटी भखे जीव अा कारा ॥
लोभ जन्म सूकर अवतारा । कैसे पावै मोच्छ को द्वारा ॥
विषई विषै सब विषकी खानी । ए सब कहिये जम सहिदानी ॥
ज्ञानी वचन ।
ज्ञानी कहै कंरहु वरियारा । हमतो कीन्ह सकल निरवारा ॥
ब्रह्माका जागकर गायत्रीपर क्रोध करना ब्रह्माका गायत्रीको झूठी साक्षी देनेको कहना और गायत्रीका ब्रह्मासे रति करनेकी बात कहना सावित्री उत्पत्तिकी कथा
जोई ज्ञानी होय हमारा । काम क्रोध तें होय निनारा ॥
तूस्ना लोभहि देइ बहाई । विषै जन्म सब दूर पराई ॥
उनको ध्वान शब्द अधिकारी । काम क्रोध सब होय नियारी ॥
नाम ध्यान हंसा घर जाई । कहा देत अस करों बडाई ॥
उनपे जम का परै न छाहीं । तास हंसा लोकहि जाई ॥
निरञ्जन वचन ।
कहैं निरंजन सुन हो ज्ञानी । कथि हा जान तुम्हारी बानी ॥
जुरत महात्म सबै बताऊँ । नाम तुम्हारे पन्थ चलाऊँ ॥
तुम तौ एक पन्थ परकासा । हम बारह पन्थ काल जग फांसा ॥
जग के जीव सबै भरमाऊँ । ज्ञानवंत को करम दिढाऊँ ॥
मार जीव को करे अहारा । कथै ज्ञान तुम्हरी टकसारा ॥
करे काम बिस सब भाई । चार वरन ले एक मिलाई ॥
कुलको त्याग होय सो न्यारा । चार वरनको एक विचारा ॥
ज्ञान हमार रहै तन छाई । ते सब जीव काल ले खाई ॥
वे तो तुमरी करिहैं हांसी । ते जीवनपर हमारी फांसी ॥
फिर फिर आवै जमकी खानी । वे सब सरन हमारी ज्ञानी ॥
कैसे पहुँचै पुरुषकी सरनी । ज्ञान संधि हमहू दे बरनी ॥
ज्ञानी वचन
कहे ज्ञानी सुन कैल विचारा । हंस हमार होय नहिं न्यारा ॥
निसवासर रहै लौ लीना । शब्द विचार होय नहिं भीना ॥
हंस हमार सब्द अधिकारा । पुरुष परताप को करे सम्हारा ॥
नाम जपै अरु सुर्त लगाई । मिले कर्म लागे नहिं काई ॥
शब्द मानि होय सब्द सख्या । निश्चे हंसा होय अनूपा ॥
उनको नाम भक्ति की आसा । ताते निरख चलैं विस्वासा ॥
निरञ्जन वचन ।
ज्ञानी मोर अपरबल ज्ञाना । वेद किताब भरम हम माना ॥
इनको माने सब संसारा । कलि में गंगा मुकती द्वारा ॥
देहीं दान जो उतरे पारा । ऐसे सुमृति कहैं विचारा ॥
यहि विधि जग जीव भुलाहीं । जरा मरन सब बंध बंधाहीं ।
सूतक पातक वेद विचारा । पूछ वेदसे करहि सँहारा ॥
एकादशी मुक्तिकी भाई । जोग जग्य करवे अधिकाई ॥
ज्ञानी बचन ।
सुनहु काल ज्ञानकी संधी । छोरों जीव सकलकी फंदी ॥
जब निज बीरा हंसा पावै । जोग बरत तप सबै नसावै ॥
वेद किताबका छोड आसा । हंसा करे सब्द विस्वासा ॥
ताके निकट काल नहि आवे । निज बीरा जो सुरत लगावें ॥
बीरा पाय होय जमपारा । शब्द सन्धि परखै टकसारा ॥
जोग बरत तपहू है छारा । अद्भुत नाम सदा रखबारा ॥
जेत हंस सरन हम आई । भक्ति करे तो मिटै धुआई ॥
निरंजन बचन ।
अब तुम ज्ञानी भली सुनाई । मेरो उरझो सुरझौ नहि जाई ॥
जो जीवनको भगति दिठैही । शब्द भेद तुमताहि लखैहो ॥
पावै शब्द होय अभिमानी । कैसे लोकै जैहै प्रानी ॥
सब्द पाय नहि करै विचारा । कैसे पहुँचे लोक तुम्हारा ॥
सब्द पाय कर करम जगावै । कैसे ज्ञानी निज घर पावै ॥
सब्द पाय कर चले न राहा । ज्ञानी कहाँ मुक्तिकी थाहा ॥
ज्ञानी बचन ।
तब ज्ञानी बाल मुख बानी । सुनियो काल निरंजन आनी ॥
हंसा भगति जो करे हमारी । राखो सदा सब्द निज धारी ॥
काम क्रोध अहंकार बिकारा । इनका तजिहैं हंस हमारा ॥
सब्द हमारा छोडे फंदा । पहुँचे लोक मिटै जमदन्दा ॥
बीरा नाम पुरुष का सारा । निरमल हंस होय उजियारा ॥
आवागवन बहुरि नहि होई । काल फांस तज न्यारा सोई ॥
पहुँचे हंस पुरुष दरबारा । अरें काल तोको तज डारा ॥
निरंजन बचत ।
निरंजन बोले गरब सो भाई । मोरे फंद तोर को जाई ॥
करम जंजीर बधा संसारा । जोई हम जग जाल पसारा ॥
तीन लोक जोइन औतारा । आवागवनमें फिर फिर पारा ॥
उपजै विनसै रहै भुलाई । देव रिषी मुनि सकलो खाई ॥
सिद्ध साधु अरु बडे जु ज्ञानी । बाँध बाँध कर तोपि समानी ॥
करम रेख ते कोई न न्यारा । तीन देव सुर असुर पमारा ॥
ब्रह्माका सावित्री और गायत्रीके साथ माताके पास पहुँचना और सबका शापपाना आद्याका ब्रह्माको शाप देना
ज्ञानी बचन ।
कहै ज्ञानी सुन काल लबारा । करिहँ टूक जंजीर तुम्हारा ॥
हंसन लैहँ तुरत उवारी । पुरुष शब्द दीन्हों मोहि भारी ॥
ताहि हुकमसों मारों तोही । सब संसार तु खाया द्रोही ॥
खंड खंड कर तोरों बाना । मारों काल करों पिसमाना ॥
हंसनकी मैं करों मुकताई । बहुरिन जन्महिं भौजल आई ॥
पुरुष अंस नोतम है अंशा । ते जग परगट बचन है वंशा ॥
तिनको सरन हंस जो आवें । कोट करम सब देई बहावें ॥
हंस संधि लाखि होवें न्यारा । चलते पावे नहिं बटपारा ॥
निरंजन बचन ।
मानों ज्ञानी बचन तुम्हारा । हंस ले जाऊ पुरुष दर्बारा ॥
चौदह काल जगत हमारे । घाट बाट बैठे रखवारे ॥
सुर नर मुनि आवें वहि घाटा । दशहिं और वह रोकें बाटा ॥
दुर्ग जगाती बडा सरदारा । बिना जगात कोई उतर नपारा ॥
भौजल नदी घाट नहिं थाहूँ । उतरन काज कहैं सब काहूँ ॥
ज्ञानी बचन ।
कहैं ज्ञानी सुन काल सुभाऊ । हमरे हंस की बात सुनाऊ ॥
बखतर ज्ञान शब्द हथियारा । मार दूत को चले अगारा ॥
कोट सिद्ध तेज होय हंसा । जब परवाना आवै वंसा ॥
वंश छाप जब पार्वहिं प्रानी । ताहि न रोकै दुर्ग दानी ॥
कहा काल तुम करो बिचारा । हंस हमार उत्तरिहै पारा ॥
सार शब्द है हंस बहोरी । ता चढ़िजाय काल मुख तोरी ॥
संधि न पावे ते बटपारा । हंसा पहुँचे लोक दुआरा ॥
तुमको काल निरंजन राई । हे ज्ञानी का करो बडाई ॥
पाँव पताल सीस अकाशा । सोरह जोजन अग्नि प्रकासा ॥
गरजे काल महा बिकरारा । सत्रह लाख लो पाँव पसारा ॥
लपकै जीभ जिमि टूटे तारा । जिमि बिजली चमकै अँधियारा ॥
सुंड बढाय दंत अति बाढा । मध्य घेर ज्ञानी कहैं ठाढा ॥
हमरे पौरुष हम बरियारा । तुम ज्ञानी का करो हमारा ॥
ज्ञानीबचन ।
ज्ञानी पुरुष शब्द कियो जोरा । पकड़ सुंड दांत गहि मोरा ॥
आद्याका गायत्री सावित्रीको शाप देना शाप देने पर आद्याका निरंजनके डरसे डरकर पछिताना
मारेउ शब्द पांव कर पेली । तोर सूँढ समुद्र गहि मेली ॥
पुरुषरूप तबहीं पुन धारा । जौन सरूप काल औतारा ॥
निरंजन बचन ।
भया अधीन दोई कर जोरी । तुम सतपुरुष सरन हम तोरी ॥
तुमसों बाल बुद्धि हम धारा । अब तुम करहु मोर उद्धार ॥
बालक कोट भाँति गरियावत । मात पिता मन एक नहि आवत ॥
तुमहीं पुरुष दीन्ह मोहि राजू । औ पुन दीन्ह सकल मोहि साजू ॥
तिहि पर हमने गाऊँ बसावा । लीन्ह सुन्न ठिकान बनावा ॥
तहँ हम साहब जाय रहाई । बिन आज्ञा कछु नाहि कराई ॥
अबलग साहेब मैं नहि चीन्हा । सत्तपुरुष तुम दरसन दीन्हा ॥
दोइ कर जोरि चरण चित लावा । धन्य भाग हम दरसन पावा ॥
अब मोहि साहेब भेद बतावो । पाओं चिन्ह हंस पहुँचाओं ॥
ज्ञानी बचन ।
सुन रे काल निरंजन राई । पुरुष नाम है बीरा भाई ॥
जो हंसा चित भगति समोई । ताको खूंट गहै मत कोई ॥
साखी—जो निज बीरा पाइ हँ, आवै लोग हमार ।
ताको खूंट गहो मत, सुनो काल बटमार ॥
निरंजन बचन ।
सुनो गुसाई बिनती मोरी । बीरा पाय करै कछु औरी ॥
ज्ञान कथै अनत चित वासा । आवागवन की राखों आसा ॥
ज्ञानी बचन ।
सुनो निरंजन बचन हमारा । नहीं सत्त वह जीव तुम्हारा ॥
साखी—जा घरते जिव आइया, ताह सुधि गइ खोय ।
पुकारि कहों मैं जीवसों, शब्द पारखी होय ॥
निरंजन बचन ।
कही बात तुम भली विचारी । संत देख हम काँध उतारी ॥
उन निकट दूत नहि आई । साहब हंस देहुँ पहुँचाई ॥
सा०—साहिब सबको एक है, साहिबका कोइ एक ।
लाखन मध्ये को गिने, कोटिन मध्ये देख ॥
ज्ञानी बचन ।
सा०—जाहु काल घर आपने, शब्द कहैं चितलाहु ।
जो फिर सीस उठायहो, बांध रसातल जाहु ॥