भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 194

जार वारि तन कष्ट कराई । जोग पन्थ यहि भौति चलाई ॥
जोगी जती तपी संन्यासी । आपन मुख कह हम अविनासी ॥
सिव महिमा भाषत संसारा । दछिन दिसि महिमा अधिकारा ॥
तीन पुत्र तिहुँ लोक सपूता । माता सों इन कीन्ही धूता ॥
माया कहँ माने नहि कोई । आपहि आप कहावे सोई ॥

अर्घा लीला ।

तब अद्या मन कीन्ह विचारा । तीन पुत्र ये सिरजनहारा ॥
माया मन झंखे बहु वारा । तीनों पुत्र भये बरियारा ॥
नाम हमार दीन्ह छियाई । तीन लोकमहँ अदल चलाई ॥
तब अद्याघट सुमिरन लायी । आपन माहि आप निरमायी ॥
देवी आपनो मथ्यो सरीरू । शकती तीन उपजी बल वीरू ॥
तिनका नाम कहँ समझाई । रम्भा सुचिल रेणुका आई ॥
इन हिलिल मिलि गन गंध्रव मोहा । राग रागिनी बहुविधि सोहा ॥
कर आभूषण गंध्रव लीन्हे । सकल साज तिन हाथन दीन्हे ॥
तिनका नाम कहँ समझाई । वीन रखाव तमूरा लाई ॥
सितार कमायच अरु मुहचंगा । ताल मृदंग नफीरी संगा ॥
जलतरंग मुरली किकिन । मौहर उपंग मंडल स्वर तितिन ॥
बाजे और छतीसों कहिया । गन्ध्रव हाथ साथ सब लहिया ॥
मास महीना फागुन सोई । ऋतु बसन्त गावें नर लोई ॥
टेसू वनस्पती सब फूले । अम्बा मौर डार सब झूले ॥
चात्रिक धारहि बचन सुहावन । हंस कोकिला कोयल पावन ॥
पिउ पिउ चात्रिक प्रिय कहहीं । विरहिनि लाग मदन दुख जरहीं ॥
अंग अबीर गुलाल चढ़ाये । नाना भांतिन अतर लगाये ॥
कामिनि हेतु काम लव लाये । अंग अनंग बहुत विधि छाये ॥
या चरित्र माया उपराजा । तीनहुँ लोक राग बल गाजा ॥
जो सुन राग विषय मन धरहीं । बार बारते जम घर परहीं ॥
अविगत मोह राग रे भाई । राग सुनत जिव गै डहकाई ॥
माया धुनि रागनको बांधा । जासे तीन लोक घर सांधा ॥
प्रथमहि राग षष्ठ विधि गावा । तिन रागन का नाम सुनावा ॥

रागोंके नाम ।

भैरों और हिंडोल अति, माल कोस पुनि जान ।
दीपक मेघ मलार भल, कीन्ह देव पहिचान ॥