भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 203

पुरुष वचन ।

तबहीं पुरुष ज्ञानीसों कहेऊ । धर्मराय अतिप्रबल जो भयेऊ ॥
यह तो अंश भया बरियांरा । तीनलोक जिव कीन्ह अहारा ॥
ताहि मारकै देव उठाई । जग जीवनको लेव छुड़ाई ॥

ज्ञानी वचन ।

साखी—करि परनाम ज्ञानी चले, करन हंसके काज ।

जोपै काल न मानि है, तुम्ही पुरुषका लाज ॥

मान सरोवर ज्ञानी आये । काल कठिन तब छेका धाये ॥
काल कठिन गरजे बहु बारा । मस्तक साठ सँड बरियांरा ॥
सत्तर योजन गजके दंता । परलय कीन्हो काट अनंता ॥
काग एक आँखे चौरासी । औसुख आठ हाथ लिये फांसी ॥
छत्तीस नाम ताहि पुनि जानी । बोले वचन बहुत इतरानी ॥
तीन दंत पाछेको फेरी । यहि विधि तीनलोक किये जेरी ॥
एक दंत पाताल चलावा । तहां जाय वासुकको खावा ॥
दूजो दंत पृथ्वी चलि आये । देव रिषि जग दैत्यन खाये ॥
तीजो दन्त गयो आकासा । चंद्र सूर खायो कैलासा ॥
ब्रह्मा वेद पढत तहां आये । शंकर ध्यान करत तब खाये ॥
लीन्हें खाय विस्तुको धाई । सकल खाय पुनि धूर उड़ाई ॥
गरजे दन्त अग्नि सम भाई । तीन लोक खाई दुनियाई ॥

ज्ञानीवचन ।

ज्ञानी देखे द्विस्टि पसारा । यातें नाहिं बचे संसारा ॥

ज्ञानी बोले शब्द बरियाई । तूँही काल खाइ दुनियाई ॥

निरञ्जनवचन ।

सा०—जाहु ज्ञानी घर आपने, मानों वचन हमार ।

तीन लीक पुरुषहिं दिये, स्वर्ग पताल संसार ॥

ज्ञानीवचन ।

मुहि जो पठयो पुरुषको, करन हंसके काज ।

कालहि मार संहारि हों, दीन्ह सकल मोहे साज ॥

बोले ज्ञानी सब्द अपारा । मोकहैं दीन्ह पुरुष टकनसारा ॥

मारों काल शब्दका झारा । टूटे दन्त न करै पसारा ॥