भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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सातवाँ प्रकरण ।

निरञ्जनका कबीर साहबसे वरदान माँगना ।

जब काल निरञ्जन जान लिया कि, ज्ञानीजीसे पार पाना टेढ़ी खीर है, तब वह बड़ी दीनतासे विनय करने लगा कि, एकवचन आप मुझको दीजिये, । तब ज्ञानीजीने कहा कि, माँगो ? तब निरंजनने कहा कि, तीन युग अर्थात् सत्य-युग, त्रेता और द्वापरमें थोड़े जीव मुक्ति पावें, पर कलियुगमें विशेष जीव मुक्ति पावें । यह वचन आप मुझको दीजिये, तब पृथ्वीपर पधारिये । यह बात सुनकर कबीर साहबने कहा कि ऐ काल ठग ! तू मुझको ठगा चाहता है कि, तीनों युगोंमें थोड़े जीव मुक्ति पावें, अस्तु ! जो कुछ तूने माँगा मैंने तुझको प्रदान कर दिया, पर जब चौथा कलियुग आवेगा, तब पृथ्वीपर मैं अपने अंगोंको भेजूंगा कि, वे बड़ी धूम धामसे मेरा पंथ प्रचलित करेंगे और इस तरह अरबों खरबों जीवोंको अपने लोकको पहुँचाऊँगा वे सब तेरे कपटजालसे छुटकारा पावेंगे । फिर निरंजनने निवेदन किया कि, जब कलियुगमें मेरा अवतार होगा और मेरा नाम जगन्नाथ होगा, उस समय समुद्र मेरा मन्दिर तोड़ दिया करेगा, तब आप कृपा करके मेरे मन्दिरकी स्थापना करा देवें और समुद्रको स्थिर कर देवें । ज्ञानीजीने यह बात भी उसकी मानली । फिर निरंजनने निवेदन किया, आप अपना शरीर भी मुझको प्रदान कीजिये, फिर ज्ञानीजीने धर्मराजको शिरवाली देह भी दिया । इसी कारण यह कालपुरुष जब चाहे तब शिरवाली और जब इच्छा हो बेशिरकी देह प्रगट कर सकता है नहीं तो यथार्थ में कालपुरुषका शरीर बिना मस्तकका है और कबीरसाहबका शरीर शिर सहित है ।

आठवाँ प्रकरण ।

छाया (विराट्) पुरुषका वृत्तांत ।

इस विषयको साध लोग भली भाँति जानते हैं, जो विराट् पुरुषकी साधना किया करते हैं, वे स्पष्ट रूपसे विराट् पुरुषको आकाशमें देखते हैं । जो सदैव इस बातपर दृष्टि रखते हैं, उन्हें सदैव वह विराट् पुरुष आकाशमें दिखलाई देता है, जब छः मास उनकी मृत्युके रह जाते हैं उस समय विराट् पुरुष उनको बिना मस्तकके दिखाई देता है । तब साधु जान लेते हैं कि, उनकी मृत्युमें छः मास शेष बचे हैं । कारण यह कि, कालपुरुषने अपनी प्राकृतिक शरीरको अब दिखलाया है । उस समयसे साधु चैतन्य और चौकस हो जाते हैं और जब मृत्युका दिवस तथा समय ठीक आन पहुँचता है, तब प्राणायाम करके समाधि