कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 199, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंपड़ा दूर तब काल बेताब हो । कि जोंनीलफर खुशक बेआब हो ॥
रही ताबो ताकत न कत्तालको । चला भाग तब काल पत्तालको ॥
जवामर्दगें जब न ताकत रही । दिया छोड तब तख्त शाहंशही ॥
रही बाकी जब और कोई न राह । लिया जाके तब कूर्मजीकी पनाह ॥
जब काल पुरुषने भागकर कूर्मजीकी शरण ली, तब कबीरसाहब उसका पीछा करते हुए पाताल लोकको गये आपको देखकर कूर्मजी खड़े हो गये और निवेदन करने लगे कि, आप कौन हो और कहाँसे आये हो ? तब कबीरसाहबने कहा कि, मेरा नाम ज्ञानी है, और मैं सत्यपुरुषकी आज्ञासे मनुष्योंकी मुक्तिके लिये भवसागरमें जाता हूँ । यह बात सुनकर धर्मराजजी बोले कि, 'ज्ञानीजी महाराज ! मेरी बात सुनो और अपने मनमें विचार करो कि, मैंने सत्तर युग-तक एक चरणसे खड़ेहोकर बन्दना की, तब सत्यपुरुषने दयालु होकर मुझको तीन लोकका राज्य प्रदान किया और अब उसके विरुद्ध अज्ञा कब्रों दिया ? सत्यपुरुषकी समस्त सन्तान अपने अपने राज्यमें अधिकार भोग रही है । मेरेही ऊपर आप क्यों रुष्ट हुए ? आपकी जैसी आज्ञा हो मैं उसको करूँ ।
इस बातपर कुर्मजीभी हाथ बांधकर कहने लगे कि, हे ज्ञानीजी महाराज ! मैं आपसे निवेदन करता हूँ यदि आप स्वीकार करें और हे निरञ्जन महाराज ! जो आप भी स्वीकार करें तो मैं कहूँ । तब दोनोंने अपनी स्वीकृति प्रकट की तब कूर्मजीने कहा कि, "जो कोई ज्ञानिजीका, पान पावे और उनका आज्ञाकारी हो उसको निरञ्जन किसी प्रकारका बाधा न देवे, इसके अतिरिक्त जितने जीव हैं वे सब कालपुरुषके फंदमें पड़ेंगे" इस बातपर ज्ञानी तथा कैल दोनों सहमत हुए, फिर निरञ्जनजी अपनी राजधानी झांझरी द्वीपको गये और कबीर साहब भी उनके साथ आये ।
पाँचवाँ प्रकरण ।
ज्ञानीजी (कबीर साहब) और धर्मराजका वार्तालाप ।
धर्मराजने कबीर साहबसे निवेदन किया कि, सत्यपुरुषने तो मुझको तीनों लोकोंका राज्य प्रदान किया है आपभी कृपाकर मुझको यह प्रदान करोगे तो बड़ी दया होगी और मेरा कार्य पूर्ण होगा, तब कबीर साहबने कहा कि, ऐ धर्मराज ! मैं सत्यपुरुषकी आज्ञासे आया हूँ और मनुष्योंकी मुक्ति करूँगा, यदि तुम इस बेर मेरी आज्ञा न मानोगे तो मैं तुमको मारकर निकाल दूँगा । तब निरञ्जनजी अत्यंत नम्रतापूर्वक निवेदन करने लगे कि, मैं आपका सेवक हूँ