कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बीजककी रमैनी
भृगुमुनिने कहा कि, मुझे उस ब्राह्मणके पास गंगातटपर ले चलो। फिर दोनों योग्यबलसे शीघ्रही तपस्वी ब्राह्मणके पास पहुँच गये। वहाँसे उसको साथ लेकर भृगुजीके आश्रम पर पहुँचे। कालपुरुषने शुक्रका पूर्व शरीर, दिखलाकर अनुरोध किया कि, अब तुम इसमें प्रवेश करो। पर उसने स्वीकार नहीं किया, कालपुरुषने बहुत समझाया कि, इसी शरीरसे तुम्हें दैत्योंकी गुरुआई करनी है। उधर भृगुजीने जल डालकर तपोबलसे मृतक शरीरको हूट पृष्ठ बनाया ब्राह्मणने उसमें प्रवेश किया उसी शरीरसे शुक्र दैत्योंके गुरु बने।
इस कथाके लिखनेका आशय यह है कि, प्रारब्ध कितना प्रबल है देखो ! कितने जन्म धारण करने पर भी भावीको भोगनेके लिये उसी पूर्वशरीरमें आना पड़ा।
६६ प्रश्न—गुरु और अधिकारी, आजकल अच्छे गुरु तो मिलतेही नहीं जिससे मोक्षमार्गकी प्राप्ति हो ?
उत्तर—ऐसा, कहना ठीक नहीं, क्योंकि, गुरुका अभाव नहीं है। सब प्रकारके मार्ग बतानेवालेगुरु सदा वर्तमान हैं। अधिकारीके अभावसे गुरुका अभाव जान पड़ता है।
कालपुरुष और सत्य पुरुष।
प्रश्न—आपने कहा था कि, काल पुरुषने सबकी बुद्धिपर आवरण डाल दिया है जिससे कोई पुरुषकी भक्तिमें नहीं लगता इससे प्रमाणित होता है कि, काल पुरुषसे भी प्रबल है।
उत्तर—कालपुरुष सत्यपुरुषसे प्रबल नहीं है पर सत्यपुरुषने काल-पुरुषको तीन लोकका राज्य दिया है दी हुई वस्तुका ले लेना उचित नहीं है। वह समय आवेगा जब कि, कालपुरुष अपना नियत समय व्यतीतकर स्वयम् अलग हो जावेगा।
कबीर साहिब और सत्य पुरुषकी एकता।
६८ प्रश्न—आपने कहा था कि, कबीर साहब सत्यपुरुषकी आज्ञा लेकर पृथ्वीपर आये। इससे स्पष्ट है कि, कबीर साहब और सत्यपुरुष दो हैं। कबीर साहब केवल अहंदी हैं।
उत्तर—कबीरसाहब और सत्यपुरुष दो नहीं, केवल जीवोंके अज्ञानसे दो दीखते हैं। जिनको ज्ञान है उनकी द्वैतदृष्टि नहीं होती। संसारका व्यवहार द्वैत बिना नहीं चलता इस कारण कबीरसाहब और सत्यपुरुष दो कहे जाते हैं।
ब्राह्मणका कत्त
नहीं तो यथार्थमें एकही हैं, क्योंकि, सत्पुरुषके बिना दूसरा कौन है जो काल-पुरुषके ऊपर जय पासके ।
तुलना ।
६९ प्रश्न--कितने साधु सन्त ऐसे होगये हैं जो कि, मारने काटनेसे भी न कटे न मरे तो क्या उन्हें भी कबीरसाहबके सम्मान समझना चाहिये ।
उत्तर--इसमें कुछ सन्देह नहीं कि, प्रह्लाद आदिक जैसे भक्त जन अपनी भक्ति और प्रेमके प्रताप तथा विष्णुभगवान्की सहायतासे किसी २ बातमें पूरे देखे जाते हैं पर कबीरसाहबकी तुल्यता नहीं हो सकती वह अपने सम्मान आपही हैं उसकी सम्मानता दूसरा कोई नहीं कर सकता ।
निर्वासन मुक्त है ।
७० प्रश्न--जिसको वासना नहीं है वह पुरुष मुक्त है कि, नहीं ?
उत्तर--जो सत्यही वासना रहित हो जावे वह पुरुष भुक्त हो जाता है पर वासना ऐसी सूक्ष्म है कि पूर्ण विवृत हुई मालूम होने परभी समय पाकर प्रकट हो जाती है ।
७१ प्रश्न--जिनको कबीर साहबका पूरा पता मिल गया वे कैसे होते हैं ?
उत्तर--जैसे लोमश ऋषि, आदि क्रोड़ों हंस संसारमें प्रगट रहते हैं उनको कभी जन्ममरणका दुःख नहीं भोगना पड़ता, ज्ञान सदा एक सम्मान रहता है वे सदा वासना विहीन रहते हैं ।
७२ प्रश्न--हंस कबीरके अतिरिक्त दूसरा कोई निर्वासना है कि, नहीं ?
उत्तर--कबीर साहबके बिना वासना निवृत्त होना कठिन है ।
७३ प्रश्न--यथार्थ ज्ञानका मूल, स्वसम्बेद कैसे है, इसका प्रमाण क्या है ?
उत्तर--कोई शास्त्र और वेद किताब उस प्रकार सत्य और स्पष्ट वर्णन नहीं करते, जिस प्रकार कि, स्वसम्बेद कहता है ।
यथार्थसे मुक्ति ।
७४ प्रश्न--चारों युगमें सब ऋषि, मुनि तथा सर्व वर्णाश्रमी गायत्रीके जापसे मुक्ति मानते आये हैं । वो क्या बात है ?
उत्तर--यदि गायत्रीसे मुक्ति होती तो ब्रह्मा विष्णु आदि पहले ही मुक्त हो जाते । पर वो हुआ नहीं ।
“गायत्री युग चारि पढाई । पूछहु जाय मुक्ति किन पाई ॥”
पर वे यदि गायत्रीका भी सत्य पुरुषपरक अर्थ समझे तो मुक्त हो जायेंगे ।
गुरुपदके योग्य, ईश्वरार्पण दान
७५ प्रश्न—अज्ञान किसको लगा ?
उत्तर—अज्ञान, अहंकार और देहाभिमानको लगा है ।
रक्षकका अवतार ।
७६ प्रश्न—जब संसारमें पापकी वृद्धि होती है भक्तों तथा पुण्यात्माओं पर कष्ट पड़ता है तब विष्णुका अवतार होता है कबीरसाहबका अवतार क्यों नहीं होता ?
उत्तर—जब संसारमें अत्याचार और अन्याय होता है, उस समय संसारके रक्षकको आनेकी आवश्यकता है । ऋषि, मुनि, पीर पैगम्बरोंकी आवश्यकता नहीं ।
जीवन मुक्ति और विदेह मुक्ति ।
७७ प्रश्न—वशिष्ठ ऋषिने वेदानुसार जीवनमुक्ति और विदेह मुक्ति रामचन्द्रजीको कही है उसका आशय क्या है ?
उत्तर—जितने ऋषि, मुनि, सिद्ध साधु, पीर पैगम्बर और नानाभक्तोंके आचार्य हुए हैं वे सब बालकके समान खेलमें लगे हुए हैं, जिनको जो अच्छा लगा उसीको उसने ग्रहण कर लिया । दूसरोंको भी वही बतलाया । जिसकी जिसने मानिन्दी करली वह उसीमें आनन्द मान रहा है । जब सब े लने खेलाने-बालेको ज्ञान प्राप्त होगा तब वे कबीर साहबके शरण जाकर सत्य पदको पावेंगे ।
७८ प्रश्न—वशिष्ठजी तो रघुवंशकी गुरुआईके लिये शरीर धारण करते हैं, क्योंकि, अधिकारी लोगोंको बारम्बार शरीर धारण करना आवश्यक हैं ।
उत्तर—वे प्रारब्धके अनुसार रघुवंशकी गुरुआईके लिये देह धर कर रहे हैं, शिष्योंके लिये पक्षी भी बनना है, पड़ा प्रारब्धको भोग कर फिर फिर अमर पदपर स्थिर हो जायेंगे यही अन्योंकी भी बातें हैं ।
७९ प्रश्न—ऐसे २ माहात्मा पुरुषोंको पशु पक्षियोंकी योनि क्यों धरनी पड़ती है ?
उत्तर—उस समय यही प्रारब्धमें होगा उसको भोगकरही नष्ट होना था पर ज्ञान उनका उस देहमें भी पूरा था ।
शब्द—बहुरि नहीं आवना यह देश ॥
जो जो गये बहुरि नहिं आये, को घर कहें संदेश ॥
सुर न मुनि और पीर औलिया, देवी गौरि गणेश ॥
धरि अवतार सबी मुनि प्रगटे, ब्रह्मा विष्णु महेश ॥
मनुष्य और पशुका विवेक
पण्डित चण्डित मुण्डित मोहे, राजा रंक नरेश ॥
षट् दर्शन पाखण्ड छ्यानवे, सबी बनाये भेश ॥
कहैं कबीर सो तीर न लागे, विनु सत गुरु उपदेश ॥
८० प्रश्न—देहवानसे विदेह किस प्रकार मिल सकता है ?
उत्तर—जिस शरीरधारीने अपनी देह मिथ्या जान अपनी वासना उठाली वह अवश्य विदेहको प्राप्त होगा ।
८१ प्रश्न—आश्चर्य है कि, विश्वामित्र जैसे ऐश्वर्यमान् महात्मा नवीन सृष्टिके कर्ता हुये वे मुक्त न हों ?
उत्तर—विश्वामित्र आदिकी कथा पढ़नेसे ज्ञात होगा कि, वे अपने २ कर्मोंका फल पाकर और उसे भोगकर फिर अधिकाराखुद हो गये, न तो किसीको वह प्रकाशही मिला न किसीकी स्थितिही हुई जिससे कि, मुक्ति होती है पर वो जो चाहते थे वो उन्हें अवश्य मिला ।
हस्त क्षेत्र ।
८२ प्रश्न—जब सतपुरुषने निरंजनको तीन लोकका राज्य दे दिया तो फिर कबीर साहबका उसके (निरञ्ज) राज्यमें हस्तक्षेप करनेका क्या स्वत्व है ?
उत्तर—वह सर्व शक्तिमान् है जो चाहे सो करे । निरञ्जन को इसलिये राज्य नहीं दिया है कि, जीवोंपर अत्याचार करे । निरञ्जनने सत पुरुषका नाम छिपाकर अपना प्रगट किया तपके बलसे बड़ा प्रबल हो महा अहंकारी बन गया आद्याको निगल गया । कूर्मजीके तीन शिर काट लिये । अक्षरके साथ युद्धकर उसे भगा दिया । योग जीतके साथ युद्ध करने उन्हें मारनेको सन्मुख आया । तीन लोकमें अन्यायद्वारा सब जीवोंको छल और कपटसे बन्धनमें डाल लिया । सत् लोक जानेका मार्ग रोक लिया । ऐसी युक्ति बनाई कि कोई मनुष्य भी किसी प्रकार सत् लोकका मार्ग नहीं पासका । किताबोंके फन्दोंमें सबको फँसाकर सबका सत्य ज्ञान हर लिया । जब सत्य पुरुषने निरंजनका ऐसा अत्याचार देखा तो स्वयम् सत्यलोकसे चलकर जानी, सतमुक्त सत् कबीर आदि नामोंसे प्रगट हो काल पुरुषसे कहा कि, यदि तू अब अवज्ञा करेगा तो तुझे नाश कर दूंगा । कालपुरुष अधीन होकर सतगुरुके चरणोंमें पड़ा अपने अपराधकी क्षमा माँगी ।
धर्मके इष्ट देव,
साधुका द्रव्यग्रहण ।
८३ प्रश्न—साधुको द्रव्य ग्रहण करना चाहिये वा नहीं ?
उत्तर—विरक्तको द्रव्यका संग्रह उचित नहीं पर किसी शुभ पुण्यमय आवश्यक कार्य्यवश ग्रहण करनेमें कुछ दोष भी नहीं जैसे जो मठ धारी साधु है अथवा महंत सच्चे हृदयसे अभ्यागतोंकी सेवा करते हों उन्हें द्रव्यादि ग्रहण करलेना चाहिये ।
त्यागी—सच्चे भावसे अन्तःकरणमें वासना रहित होनेका नाम त्यागी है । जो ऊपरसे विरक्तोंका स्वोंग बनाके फिरता है भीतर नाना प्रकारकी वासना रखता है, नानाप्रकारकी झूठी और रोजक बातोंसे अथवा किसी युक्तिसे सेवक सती अथवा अन्य संसारियोंसे द्रव्य लेनेकी इच्छा रखता है वा लेता है, वह चोर और ठगसे भी नीच अधम पापी है । ऐसे धुतारे कपटीके लोक परलोक दोनोंही भ्रष्ट हैं ।
जिसने सच्चे भावसे अहंकारको तर्क किया वही सच्चा वैरागी है । रुपिया पैसा अथवा द्रव्य न छूनेका डौल बनानेवाला सच्चा वैरागी नहीं हो सकता ।
तर्क हंकार तर्क दुनिया है । और दूसरा कोई न मुनिया है ।
ग्रहण न करनेका कारण ।
८४ प्रश्न—क्यों स्वसंबेदके मार्गको सब लोग ग्रहण नहीं करते ?
उत्तर—मिथ्या स्थूलविद्याके अभिमानियोंने मनुष्योंको ऐसा बहकाया है कि, जिस कारणसे भ्रममें पड़े हुये मनुष्य सत्य मार्गपर नहीं आते । विद्वान् दो प्रकारके हैं ।
एक वे हैं जो जीवोंको मुक्तिमार्ग बतलाते हैं । दूसरे वे हैं जो जीवों को भटकाकर कुमार्गमें डालते हैं । वे ऐसे दुराचारी होते हैं कि, इनको कभी सच्चाई अथवा सदाचारकी बातही पसन्द नहीं होती । वे निरे अभिमानी और देहात्मवादी होते हैं । ऐसेही शठ दुराचारियोंने सब धर्मोंमें दुराचारका प्रचार किया है इन्हींके कारण मनुष्य सदाचारमें प्रवृत्त नहीं हो सकते बुद्धिहीन मूर्ख ऐसोंहीके अनुशासनमें ही रहकर अपना सर्वस्व नाश करते हैं ।
हिकायत मनजूम ।
कोहसे एक आरिफ सेहरामें आ । देखा अज्राज्रील वहाँ था खड़ा ॥
दिल अलम बसूसःसे था दुरस्त । दीदः नैरंग जमानः से मुस्त ॥
मूर्खोंकी मूर्खता
उससे किया आरिफने बाज पुरसँ । छोड़ा है क्यों कार गहे खुद मदर्सँ ॥
तबअ थी तेरी क्यों बसबाससे । मोम हुआ जो सख्त इलमाससे ॥
कार तू दर मसजिदो खानकाह । बन्दःको बतलाओ जो तारीक राह ॥
बाज रह खुद बद तीनतसे क्यों । फ़ारिग खोय शौतनियतसे क्यों ॥
रखनः गरे सिल्क जमाअतन क्यों । तफ़रक्कावखश सफे ताअतन क्यों ॥
जादू तेरा उरबदःजोय कहाँ । मक व फरेब बद खोय कहाँ ॥
रहजनै दौरौ दिया यों जबाब । बरकते उलमाने छुड़ाये अजाब ॥
कार मेरा करते फ़कीहाने अहद । मुझको रही बाकी न जहो जेहद ॥
एक तन उसे तायफ़ासे बुलहवस । वासते गुमरीहीके हैं बस ॥
ऐसे दुराचारियोंने अनन्त जीवोंको कुमार्ग में लगा दिया और लगाते जाते हैं । किसी पुस्तकमें देखा था कि, एक बादशाह ऐसा हो गया जो ऐसे दुराचारियोंकी खबर जहाँ सुनता था वहाँसे पकड़वा कर उसके शरीरकी खाल खिचवालेता था । वह स्पष्ट कहता था उसे पूर्ण विश्वास भी था कि, ऐसेही स्वार्थी, दुराचारी, मूर्खोंने सब धर्मोंमें भ्रष्टता डाल दी है ।
शून्यके हथियार ।
८५ प्रश्न—आपने कहा कि, इस संसारके सर्व व्यवहार शून्य हैं तो मुक्ति आदिक भी शून्यही होवेगा ?
उत्तर—निस्सन्देह इस संसारका सर्व व्यवहार शून्य है पर परमात्माने प्रत्येक मनुष्यको दो ऐसे शस्त्र प्रदान किये हैं जिनसे कि असत्यको काटकर शून्यके पार पहुँच जावे । उन दोनों हथियारोंका नाम विचार और विवेक है जो कोई इन दोनोंसे उचित कार्य करेगा वह अवश्य अपना अभीष्ट सि कर सकेगा ।
अन्य धर्मोंकी आवश्यकता ।
८६ प्रश्न—यदि केवल कबीर पंथसेही मुक्ति मिल सकती है, तो अन्य धर्मोंकी क्या आवश्यकता है क्योंकि, धर्मका मुख्य प्रयोजन मोक्ष है ?
उत्तर—भिन्न धर्मोंका होनाभी अत्यन्त आवश्यक है । क्योंकि, वर्णमाला पढ़े बिना कोई पुस्तकोंको नहीं पढ़ सकता । शास्त्र पढ़े बिना कोई विद्वान् नहीं हो सकता, विद्वान् हुये बिना उच्चपद नहीं पासकता । जैसे पाठशालेमें भिन्न २ श्रेणी होती हैं उनमें भिन्न २ ज्ञानके विद्यार्थी शिक्षापाते हैं पर योग्य तभी समझे जाते हैं, प्रशंसा पत्र तभी पासकते हैं जब कि, सर्वोच्च श्रेणीमें परीक्षोत्तीर्ण हो जाते हैं, इसी प्रकार अन्य अन्य धर्मोंके विषयमें जान लेना और कबीर पंथको सर्वोच्च श्रेणी धर्मका समझना चाहिये । जबतक पूर्ण ज्ञान और सत्य धर्मकी
तुलसीदासजी भवतारणका उपाय
प्राप्ति नहीं होती तबतक मनुष्य अन्य २ धर्मोंमें प्रवृत्त रहता है। कबीर पन्थका अधिकारी नहीं होता। जब मनुष्यके अंतःकरणसे भली प्रकार मल विक्षेप आदि दोष दूर हो निर्वासना पदको प्राप्त करे तबही कबीर पन्थका आधिकारी होता है।
८७ प्रश्न—पश्चिमीयोंके घृणितोंके ग्रहणका कारण, पश्चिमीय नबी और पैगम्बर आदि धर्माचारियोंने मद्यमांसादि घृणित पदार्थोंका निषेध क्यों नहीं किया ?
उत्तर—पश्चिमीय धर्मोपदेशक लोग स्वयम् मद्य मांसके ग्रहण करनेवाले थे। इसमाईल और इब्राहीम आदि नबी प्रसिद्ध शिकारी थे। जिकियाका पुत्र योहन टिडियोंको मार मार कर खाता था।
८८ प्रश्न—कबीर साहबके विषयमें तो किसी नबीने भविष्यत् नहीं कहा ?
उत्तर—एक लाख अस्सी सहस्र पैगम्बर भविष्यत वादी हुये वे सब निरञ्जनके पुत्र उसीके लोककी सुधि जानते थे। उन्हें सत्य लोककी क्या खबर थी ? उसके बिना उसका समाचार। कौन कहसक्ता है ? जो हंस कबीर उसकी सुधि जानते हैं वे सर्वदा उसकी स्तुति और प्रार्थना करते रहते हैं।
पृथ्वीका निरूपण।
८९ प्रश्न—पश्चिमीय विद्वानोंका मत है कि, पृथ्वी चलती है और गोल है सो सत्य है कि, नहीं ?
उत्तर—निस्सन्देह पश्चिमीय विद्वानोंका मत है यही बरन कितनेही भारतवासी, जो नबीन शिक्षाके पक्षपाती हैं, वैसाही विचार रखते हैं। जिस प्रकार भारतके विद्वानोंके इस विषयमें भिन्न भिन्न मत हैं वैसेही योरोपिय विद्वानोंके भी मत हैं। क्योंकि, कितने विद्वान् लोग पृथ्वीको स्थिर मानते हैं। योरोपियन लोगोका यह कहना है कि, हम सच्चे और भारतवासी झूठे हैं, महान तुच्छ और असत्य है।
तौरत और इञ्जील आदिकमें तो इस विषयमें कुछ तो लिखा ही नहीं है पर पश्चिमीय विद्वानोंने केवल अपने अनुमान और कल्पनासे कुछ कुछ लिखा है।
(१) वे (योरोपियन्स) कहते हैं कि, पृथ्वी गोल है। इसमें कोई विवाद नहीं क्योंकि, भारतीय विद्वान्, भी पृथ्वीको गोलही कह गये हैं।
(२) योरोपियन्स कहते हैं कि, पृथ्वी चलती है। पृथ्वीकी गतिको प्रमाणित करनेके लिये कुछ क्षुद्र युक्तियाँ भी प्रकाशित करते हैं। जैसे—नदीमें
चलती हुई नावपर बैठे हुये मनुष्योंको किनारेके वृक्ष आदि चलते हुये देख पड़ते हैं पर वे चलते नहीं यथार्थमें नौकाही चलती है ।
वे लोग यह भी कहते हैं कि, चन्द्रमा स्वयम् प्रकाशित नहीं है पर सूर्य के प्रकाशसे प्रकाशित है ।
पश्चिमी लोगोंका उपरोक्त कथन मुझे ठीक नहीं जान पड़ता वे लोग भारतीय विद्वानोंकी बातोंको प्रमाण न करनेमें पुराणके कुछ वचनोंकी विरोधताका प्रमाण देते हैं जैसा पृथ्वीके विषयमें भिन्न भिन्न पुराणोंमें लिखा है ?
(१) पृथ्वी अण्डाकार है ।
(२) पृथ्वी कमलाकार है ।
(३) पृथ्वी कमल पत्रके आकारकी है ।
(४) पृथ्वी चौकोर है ।
(५) पृथ्वी चिपटी है ।
इसी प्रकारके परस्पर विरोधी वचनोंको देखकर योरोपियन्स भारतीय विद्वानोंकी सम्पत्तिको सत्य नहीं मानते । इस कारण भारतीय विद्वानोंके मतको पुष्ट करनेवाली युक्ति और अनेक प्रमाण लिखता हूँ ।
(१) पृथ्वीके गोल होनेमें तो सब एक मत हैं ।
(२) पृथ्वी कमलाकार है यह बात भी सत्य है क्योंकि, कमल बहुत तरहका होता है कोई गोल, कोई लम्बा ।
पृथ्वीको गोल कहनेमें जो बुद्धिकी सूक्ष्मता है उसको योरोपीय विद्वानोंने नहीं समझा वास्तविक बात यह है कि, जल गोल है पृथ्वी नहीं है क्योंकि, पृथ्वीसे पूर्व जल था, जलका आकार गोल है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि, समुद्रका पानी भंवरमें ऊंचा उठा हुआ जान पड़ता है, उसका कारण केवल यही है कि, जलका आकार गोल है । जैसा समुद्रवैसाही बुन्द, दोनोंका रूप एक समानही गोल होगा । कोई बड़ा कोई छोटा भलेही हो पर आकारमें कुछ भेद नहीं होगा जैसे पिण्ड और ब्रह्माण्डदोनोंका रूप एकही है ग्रन्थोंमें कबीर साहबने कहा है कि, पृथ्वीसे पहिले जल था, जिस प्रकार दूध यर मलाई जमती है उसी प्रकार जलपर पृथ्वीकी सृष्टि हुई । यही बात सबमें है कि, पहले पानी था, उस गोल पानीके ऊपर पृथ्वी जमाई गई इसी कारण पृथ्वी गोल दिखाई देती है । पानीकी गोलाईके कारण पृथ्वी गोल जान पड़ती है । जैसे घड़ेके ऊपर कुछ गाढ़ा तरल पदार्थ जमादेनेसे घड़ेकी गुलाईके कारण वह भी गोल दीख पड़ता है पर यथार्थमें गोल नहीं होगा । इसी प्रकार पृथ्वी जलके फेनके समान जमकर
कालकी फांसीसे त्राण २४ अध्याय प्रश्नोत्तर
कठिन बन गई है, गोल पानीपर जमकर गोल दीख पड़ती है। यदि पृथ्वीको पानीसे अलग किया जावे तो गोल न दीखेगी। हाँ पानीके साथ तो गोल होनेमें कुछ सन्देहही नहीं।
(३) हिन्दू कहते हैं कि, पृथ्वी कमलके पत्तेके आकार है वो बात भी ठीक है क्योंकि, पृथ्वी जलके ऊपर जमाई गई तो गोल जमाई गई जो कुछ गोल पदार्थ पानीपर जमाया जाता है उसके नीचे गावडुमी स्थान शून्य रहता है इसी कारणसे पृथ्वीको कमलके पत्तेके आकारका कहा है।
(४) पृथ्वी चौकोर है यह भी कहना ठीक है क्योंकि, स्वरौदय आदिमें पृथ्वीतत्त्वको चतुर्कोणही बताया है, जो तत्त्वदर्शी होते हैं, स्वरोंको साधकर तत्त्वोंके आकारोंको देखते हैं चारों तत्त्वोंके रङ्ग, ढङ्ग, चाल और उसके सबगुण दोषोंको जानते हैं वे पृथ्वीको चतुर्कोणही देखते हैं। स्वोंसके साथ चारों तत्त्व का रूप प्रत्यक्ष देख पड़ता है। आकाश तत्त्व स्वरके अन्तरमें रहता है बाहर दिखाई नहीं देता। इससे भी पृथ्वीको चौकोर कहा गया है।
पृथ्वी चौकोर, जल गोल, अग्नि त्रिकोन, वायु और आकाश भी गोल है।
(५) पृथ्वीको चिपटी कहनेकाभी वही पानीपर जमाया जाना कारण है क्योंकि, कोई गाढ़ा तरल पदार्थ गोल पदार्थपर जमाया जाय तो वह चिपटे आकारमेंही जमेगा। भारतीय विद्वानों तथा पुराणोंका कथन बहुत ठीक और सत्य है पर उसके समझनेके लिये बुद्धिकी आवश्यकता है। भारतीय विद्वानों और महात्माओंके कथनमें असत्यका गन्ध भी नहीं हो सकता क्योंकि, वे प्रकाशित हृदय और पूर्ण ज्ञानवान तथा त्रिकालदर्शी अंतर्धर्मी हुये हैं।
हिन्दू लोग कहते हैं कि, पृथ्वी अचल है चल नहीं इसका कारण यह है कि, पृथ्वीको कोशोंमें, धरा, स्थिरा, अचला और धरणी आदि नामसे लिखा है, जिनसे स्पष्ट सिद्ध होता है कि, पृथ्वी अचल है। यदि पृथ्वी गतिवाली होती तो उसे धरणी आदि नामसे क्यों कहते? बरन् अचलाके स्थानमें चला कहते।
इसीपर मुसलमानी धर्मके विद्वान्— 'पृथ्वीको स्थितही बतलाते हैं जैसा हजरत शेख सादी सिराजी लिखते हैं कि—
जमीं अज तप लरजः आमद सतोह ।
फरोकोपत बर दामनश मेख कोह ॥
इसका भावार्थ यह है कि, सृष्टिके आदिमें परमात्माने पृथ्वीको बनाया उस समय यह कांपती हुई डगमगाती थी, पीछे पहाड़ोंका खूँटा ठोककर स्थिर कर दिया गया है।
ब्रह्म और माया दर्शन हुआ या नहीं
जो योरोपियन्स पृथ्वीको चलती बतलाते हैं उसके लिये प्रमाण और युक्ति लाते हैं वे ऐसे तुच्छ और तर्कखण्डित हैं कि, उनसे किसीके भी मनका समाधान नहीं हो सकता ।
यदि पृथ्वी चलती होती तो नावपर चढ़ेहुँके समान किनारेके सब पदार्थ दृष्टिसे छिपते हुयेके मान अन्तर्धान होते जाते पर ऐसा नहीं होता ध्रुव आदि तारागण नित्य एकही स्थानपर जैसेके तैसे जान पड़ते हैं यह कदापि सम्भव नहीं हो सकता कि, पृथ्वी तो चले और सदा सब समय ध्रुव आदि एक समान नहीं दिखाई दें ।
सर आइज़क न्यूटनने पृथ्वीकी दो गति बतलई है । १ वार्षिक २ दैनिक ।
वार्षिक गतिसे ऋतुओंका हेर फेर होता है और दैनिकसे दिन रात होता है । सो यदि ये दोनों चाल सत्य होती तो दोनों चालोंसे तारे और ग्रह दृष्टिसे अंतर हो जाते अथवा छोटे बड़े दीख पड़ते पर ऐसा न होकर उलटा ग्रह और तारे गण ज्योंके त्यों एक समान दीख पड़ते हैं पृथ्वी इससे भी अचलही सिद्ध होती है ।
ध्रुव तारेकी ओर दृष्टि डालनेसे भी पृथ्वी स्थिरही प्रमाणित होती है । क्योंकि, जब दक्षिणायन अथवा उत्तरायण होता है उस समय पृथ्वी बहुत दूरी पर चली जाती । ध्रुव बहुत छोटा दिखाई देता पर यह किसीने नहीं देखा बरन् सबको ध्रुव सदा एक समानही देख पड़ता है । इससे पृथ्वीकी दोनों गति अप्रमाणित नहीं होती ।
फिर न्यूटन साहबने चन्द्रमाको प्रकाश रहित बतलाया है । इसका कोई भी प्रबल प्रमाण उनके पास नहीं है । उन लोगोंका कथन है कि, सब ग्रहोंके साथ २ अनेक २ चन्द्रमा हैं वे सब प्रकाशित हैं पर यह हम लोगोंका चांद प्रकाशित नहीं, वाह इस हमारे चांदने क्या अपराध किया कि, ईश्वरने और चन्द्रमाओंको तो प्रकाशित बनाया इसको अन्धकार मय ।
देखो तौरीतमें पैदायशके प्रथम बाबके १३ से १९ आयत तक लिखा है कि ईश्वरने दो प्रकाश बनाये एक छोटा दूसरा बड़ा । बड़ेको सूर्य कहा, छोटा रात शासन करनेके लिये बनाया गया । जब कि, उनके ईश्वर कृत पुस्तकमें ऐसा लिखा है तो उनको चन्द्रमाको अन्धकारमय कहना ठीक नहीं है ।
कबीर साहब कहते हैं कि, चन्द्र और तारे दोनों विराट् पुरुषकी आंख हैं खूब प्रकाशमान हैं । दक्षिण नेत्र सूर्य और वामनेत्र चन्द्रमा हैं । जब सूर्य चन्द्रमा विराट्के नेत्र हैं तो दोनोंके प्रकाशित होनेमें कोई सन्देहही नहीं है ।
वेद प्रमाण भी ऐसाही है जैसा कि, कबीर साहब कहते हैं।
सर्व ब्रह्म ज्ञानियोंके गुरु कबीर साहब कहते हैं वेद तौरीत उसके ऊपर साक्षी भरते हैं फिर कौन है कि, चन्द्रमाको अंधकारमय बतलाये ? केवल लोगोंको भ्रम हो गया है इस कारण सत्यको छोड़ असत्यको लिये बैठे हैं। उसी पर विश्वास किये बैठे हैं। सत्य झूठका निर्णय नहीं करते।
जब चन्द्रमा बेप्रकाश होगा तो विराट पुरुष भी काना ही होगा इसमें सन्देह नहीं कि, “जो ब्रह्मण्डे सोई पिण्डे” तब तो विराटके काने होनेके कारण सब जीवधारीको काना होना चाहिये।
पर इसके उलटा मनुष्य दो आँखवाले देख पड़ते हैं।
इस संसारमें जितने निश्चय हैं सब बुद्धके ठहराये हुये हैं पर स्वयम् सत्य एवं अनित्य हैं उसके निश्चय नित्य और सत्य कैसे हो सकते हैं।
भिन्न २ भाषाओं और देशोंमें अनेक मतवाले अनेकही विद्वान् हो गये हैं सबके विचारमें कुछ न कुछ भेद है पर भारतीय विद्वानों और महात्माओंका जो कुछ कथन है यह उनके अंतरीय प्रकाशके बलसे है उसमें किसी प्रकार भी असत्यता नहीं हो सकती।
टाम्की, टकोड, बराह, कोप निक्स और सर आजक नियुटन ये चार भूगोल विद्याके जाननेवाले विदेशमें हुए हैं। उन लोगोंके कथनोंमें परस्पर बहुत विरोध है, कोई पृथ्वीको गति वाली तो कोई अचल बतलाता है। जबतक नया कोई वक्ता न उठ खड़ा हुआ तबतक योरोपियन्स पुरानोंकीही बातोंको ईश्वरी लेख समझते हैं पर जब कोई नया युक्ति प्रौढ़ बादसे अथवा और किसी रीतिसे अपना कथन पुष्ट करे तो पिछलेको तृणवत् त्याग देते हैं दो सौ वर्षोंसे पश्चिमी लोगोंने सबके कथनको असार समझकर सर आइजक नियुटनके कथन पर अवलम्ब किया है देखें यह अवलम्ब उनका कबतक ठहरता है। सर आइजकका भी सार माना गया सिद्धान्त कबतक सार रहता है ? कबतक लोग विवेक और विचारके विरुद्ध इस प्रकारके विश्वास करते रहते हैं।
यद्यपि चतुर लोगोंने अपनी चतुराईसे कितने सिद्धान्त बनाये और बनाते जाते हैं पर किसीकी स्थिति नहीं हुई न होगी। प्राकृतिक जन उनकी अनुसरता कर करके पछताये और पछतावेंगे। सन्तोंने अंतरीय प्रकाश और ज्ञानके बलसे जो कुछ कहा है वही सत्य है। उन्हींका वचन माननेसे भाग्यमान् हो सकता है।
दृष्टान्त समीक्षा
परमात्मा सर्व शक्तिमान् है, जिसको चाहे क्षणमें विद्वान् करदे, जिसको चाहे क्षण में मूर्ख । मूसा और खरकईल आदिको क्षणभरमेही ज्ञान प्रदान किया साबल आदिका ज्ञान क्षणमें हरण कर लिया । राजाको रंक और रंकको राजा करना उसका कौतुक मात्र है । उसकी ऐसी प्रबल माया है कि, उसे जाननेको कोई समर्थ नहीं । कोई कौसा भी जानी और विद्वान् क्यों न हो उसके कार्यायमें स्वास भी नहीं हो सकता ।
एक रूप ।
९० प्रश्न—साधु और साहेब मिलकर किस प्रकार एकरूप हो जाते हैं ?
उत्तर—जो साधू लोग परमात्माके सच्चे प्रेमी हैं, वे लोक परलोक सबको तुच्छ समझते हैं । जानमाल आदि सब संसारको अनित्य समझकर उसकी ओर कभी दृष्टि नहीं देते केवल प्यारेके स्मरणमें लगे रहते हैं । ऐसे ईश्वर प्रेमियोंको वासना किञ्चित मात्रभी शेष नहीं रह जाती । अपने देहकी भी सुधि भूलकर प्यारेके चिन्तनमें विदेह हो ध्यान करते २ उसीके रूपमें मिल जाते हैं अथवा वही हो जाते हैं । उनमें मैं तूका लेशमात्र भी बखेड़ा नहीं रहता ।
दृष्टांत—लुधियाने नगरमें एक महात्मा साधु जो कि, सिद्ध भी सुने जाते थे एक अति सुन्दर यौवन और रूप पूर्ण गोकली नामकी स्त्री पर मोहित हो गये । क्रमशः वह इतने आशिक हुए कि, मान मर्यादा त्यागकर गोकलीके पीछे पीछे फिरने लगे । लोगोंने उनकी बहुत निन्दा की उनको बहुत धिक्कारा पर उसको किसी बातकी परवाह न हुई ।
एक दिन गोकली कई एक स्त्रियोंके साथ नदीमें स्नान करने गई, साधु भी उसके पीछे पीछे पहुँचा गोकलीने जैसे जलमें डुबकी मारी उसी प्रकार साधूने भी डुबकी मारी । गोता लगाकर बाहर निकलने पर संत भी गोकली हो गया । यह कौतुक देखकर लोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ।
वर्तमानकालमें कितने लोग इंगरेजी शिक्षा प्राप्त करते हैं । उच्च २ परीक्षा देकर कोई बी. ए. कोई एम्. ए. कोई एल्. एल्. बी. कोई २ डी. डी. कोई डी. एल्.एल्. आदि नाना प्रकारकी उपाधि प्राप्त कर उच्च पदको प्राप्त करते हैं । उसी प्रकार सत ईश्वरी परीक्षा पासकरके ईश्वर बन जात हैं । इस प्रकार साहब साधु दोनों एक हो जाते हैं ।
साखी—तू तू करते तू हुआ, मुझमें रही न हूँ ।
आपा परका मिट गया, जित देखूं तित तूं ॥
किसका भजन करे ब्रचारोंका तत्त्व निर्णय
जबतक ईश्वरमें लीन हो ईश्वररूप नहीं हो जाते तबतक संत लोग भिन्न भिन्न श्रेणी और पदोंको भोगते रहते हैं।
इसी प्रकार ईश्वरके प्रेमो ईश्वरसे मिल जाते हैं, भेद नष्ट हो जाता है। सांसारिक प्रेम ईश्वरी प्रेमकी नकल है। यह संसार एक नदी है जिसमें प्रेमी लोग गोता लगाते हैं। जो सत्य अन्तःकरणसे जिसपर आशिक होगा वह उसीका रूप हो जावेगा। प्यारेके मिलनेके लिये सच्चे प्रेमके सिवा दूसरा कुछ नहीं चाहिये। जिसने सच्चे अद्वैत परमात्मासे मन लगाया वह उसीका रूप हो गया। वह अद्वैत अनूपम कबीर साहब है जिसकी स्तुति और प्रार्थना सब ऋषि मुनि करते आ रह हैं।
तरकीब बन्द।
तीन लोक पूर्ण है नारी। माया ब्रह्म जीव सब झारी ॥
सबही नारी नहीं नर कोई। ब्रह्मविष्णु आदिक त्रिपुरारी ॥
मृत्यु लोक और सर्ग पताला। तीन भुवन जम जाल पसारी ॥
कहे सुने वेद जो और बानी। सब नारी माया हंकारी ॥
सत कबीर पुरुष इक आया। मैं क्या कहूं कहें ऋषि राया ॥
जा कबीरकी अकथ कहानी। वाका भेद वेद नहीं जानी ॥
सुर मुनि जश निशिदिन गावे। नेति नेति कही उचरी बानी ॥
ऋषि मुनि परमहंसको बाना। तीन काल सो बिरद बखानी ॥
अबिचल पुरुष अखंड अपारा। सत्य कबीर पुरुष सोई ज्ञानी ॥
तामें सबही धरम और दाया। मैं क्या कहूं कहें ऋषि राया ॥
सत्य पुरुषके जो फरजन्दा। सदा काल सो ब्रह्मानन्दा ॥
ब्रह्मरूप समरथके वेटे। जिनकी कृपा कटें जम फन्दा ॥
सो सत्य पुरुष गुण गावे। उनके निकट नहीं दुख दन्दा ॥
सो सत पुरुष है आप कबीरा। परमानन्द सो आनंद कन्दा ॥
सो कबीर हैं अगम अमाया। मैं क्या कहूं कहें ऋषि राया ॥
वार पार है पुरुष कबीरा। यहां वहां सो दोनों तीरा ॥
देह बिदेह कहा नहीं जावे। वाको ज्ञान है अगम गंभीरा ॥
गो खुर सम उतरें भौसागर। गुन गावें मुनि वा गुरु पीरा ॥
अलख पुरुष निरबान है सोई। वाहीको सेवक धम्म धीरा ॥
सुयश जो वेद पुराणन गाया। मैं क्या कहूं कहें ऋषिराया ॥
कुशटम गरुड भुशंड रुक महिया । दत्त दिगंबर और दुरवासा ॥
धनुक जनक नारद सनकादिक । कोटिन ऋषि मुनि जिनकी आसा ॥
धरे जो देह बिदेह कहाये । गावें गुण मुनि मगन हुलासा ॥
अधम जीव उतरें भौपारा । सो देखे साहब निजपासा ॥
खुद कबीर सत पुरुष कहाया । मैं क्या कहूं कहें ऋषिराया ॥
गोरख ऋषभ कनक नूप जाना । योगधीर योगेश्वर नाना ॥
बंग देश पति मोहन राजा । इबराहीम अधम सुलताना ॥
अमर भूपाल और सुपच सुदर्शन । दास मलूक करें गुणगाना ॥
धरमदास है शिर ताजा । नानक दादू हंसन बाना ॥
सबकी बानीमें निर ताया । मैं क्या कहूं कहें ऋषि राया ॥
शाह सिकन्दर दिल्ली शाहा । देश मगध बिजली खां नाहा ॥
रामानन्द जासुगुन गावें । दास गरीब कहते गुन गाहा ॥
नाम देव रविदास गोस्वामी । भौसागरको पायो थाहा ॥
इन्द्रमती मन्दोदरी रानी । मुड़ कमाली प्रिती निबाहा ॥
जो पहचान अमर बर पाया । मैं क्या कहूं कहें ऋषि राया ॥
सिद्ध साध सब पीर पयम्बर । धर्मके यकता जो धरनी पर ॥
स्वर्ग और कोटिन ब्रह्माण्ड । तन धारी जो जीव चराचर ॥
वाणी अगणित पारको पावे । सुयश कबीर कथें सब तनधर ॥
परमानन्द दास बलिहारी । साहब सत्य कबीर एक नर ॥
करता पुरुष धरे नर काया । मैं क्या कहूं कहें ऋषिराया ॥
शब्द— काशीपुरीके वासी, सतगुरु काशीपुरीके वासी हो ॥
नाम कबीरा मतिके धीरा, जगसे रहित उदासी हो ॥
पांच पचीस कियो बस अपने, पकड़े मन मवासी हो ॥
माया मान बड़ाई छोड़ी, मिले राम अविनाशी हो ॥
सुर नर मुनिजन और योगीश्वर, वांछत मन सन्यासी हो ॥
मुक्ति क्षेत्र तजि गये मगह कर, ऐसी दृढ़ विश्वासी हो ॥
अग्नि न जरे धरनी न गड़े, पड़े न जमकी फांसी हो ॥
सहदेही पद माहिं समाये, देखा लोग विलासी हो ॥
हिन्दू तुर्क दोनोंसे बनाया, कर्म भर्म कियो नाशी हो ॥
दास गरीब वहाँ कोई यक पहुँचे, बातें बहुत बनासी हो ॥
तीन प्रकारके आनन्द प्रत्येक मतमें मुक्तिका विचार
शब्द— कीना मगह प्याना सतगुर कीनारे ।
दोनों दीन चले संग जाके हिन्दू मुस्लमानारे ॥
मुक्ति क्षेत्रको छाड़ि चले हैं तजि काशी अस्थानारे ॥
शाह सिकन्दर कदम लेत है बादशाहा सुल्तानारे ॥
चारों वेद कितेव संग है खोजी बड़े वयानारे ॥
सालिगराम मुरतिसे सेवैं ज्ञान समुन्दर दानारे ॥
षट् दर्शन जा संग चलत हैं गावत बानी बानारे ॥
अपना अपना इष्ट सम्हालें बांचे पोथी पानारे ॥
चादर फूल बिछाई सतगुरु देखि सकल जहानारे ॥
चारों दाग रहित है सतगुरु बिगत अलख अमानारे ॥
राय बीरसिंघ करें बिनती बिजली खान पठानारे ॥
दो चादर बख्शी दोनोंको दीन पान परवानारे ॥
नूर नूर निर्गुण पद मेला दर्शाहि वही हैरानारे ॥
पद लौलीन भये अविनाशी पाये पिंड परानारे ॥
क्षब्द सरूप साहब सारेंगे शब्दी शब्द समानारे ॥
दास गरीब कबीर अर्थमें फरके ताहि धुजानारे ॥
साखी— गरीब—काशीपुरी कसूरिया, मुक्ति होत सब जात ॥
काशी तजि मगहर गये, लगी मुक्ति सर लात ॥
गरीब—पन्द्रह सौ पचहत्तरा, किया मगहको गौन ॥
मगसर सुदी एकादशी, मिली पवनमें पवन ॥
रमैनी— चले कबीर मगहके ताई । तहवां फूलन सेज बिछाई ॥
दोनों दीन अधिक पर भाव । दुखी दुश्मन और सब साव ॥
तहाँ चले बिजलो खा पैठाना । बीर सिंह बघेल रवाना ॥
काशी उमडी चली मगहरको । कोई न पावे ताभु डगरको ॥
वैरागी सन्यासी योगी । चले मगहको क्षब्द वियोगी ॥
तीन रोजमें पहुँचे जाई । तहवाँ सुमिरण राम खुदाई ॥
दोनों दीनहि बाहन जोरी । शस्त्र बांध लियो भर कोई ॥
वे गाड़न वे जारन कहई । दोनों दीन अधिक उरझहई ।
तहाँ कबीर कहें एक भाखा । शस्त्र करे सो ताहि तलाका ॥
शस्त्र करे सो हमरो द्रोही । ताके बीच पिछोड़ी होई ॥
सुधि बिजली खां जात हमारी । हम हैं शब्द रूप निरंकारी ॥
प्यारेसे मिलनेकी युक्ति
बीरसिंह पुनि विनती करे । है सतगुर तो कैंसो मरे ॥
तहवैं चादर फूल बिछाई । सोजा झाहि पदे समाई ॥
दो चादर दो दीन उठावे । ताकी मध्य कबीर न पावे ॥
तहवैं अविगत फूल सो वासी । मगह गोर और चौरा काशी ॥
अविगत रूप अलख निरवानी । तहवैं नीर छीर दियो छानी ॥
मुरब्बा
तु इन्सान है पकड़ इन्सान आदत । न इस्से और बढ़कर है सआदत ॥
न तू क्यों कर कबूल अपनी शहादत । इबादत कर इबादत कर इबादत ॥
जो पहिना तू है आदमको जामा । पढ़ो दिनरात सच्चा इश्कनामा ॥
बवस्फे यार दे तहरीक खामा । इबादत कर इबादत कर इबादत ॥
तू जाहिर बातिनी आखोंसे पहचान । वह साहब खुद धरी है देह इन्सान ॥
तू उसके स्ख निगह कर अज्र दिलोजां । इबादत कर इबादत कर इबादत ॥
इबादत जुहद तकवासे जो खाली । शरीअत मत्य सुकृतकी न चाली ॥
क्योंकर पावे राहे लायजाली । इबादत कर इबादत कर इबादत ॥
पड़ा है किस लिये इस गंदिगीमें । लगाता दिल न क्यों इस बन्दगीमें ॥
तू देख आजिज उसी खुद जिन्दिगीमें । इबादतकर इबादतकर इबादत ॥
तीन लोक धर्म रायके कन्धे । आये जिव सुन जम कालके बन्धे ॥
लगा भूल तू धोके धन्धे । हाय जीव अन्धे हाय जीव अन्धे ॥
सांचा सतगुर नहिं पहिचाना । भूल कैलके गैल फन्दाना ॥
जाना नहीं क्या पद निर्वाना । हाय जीव अन्धे हाय जीव अन्धे ॥
सतगुरने तुझको समझाया । तेरे चित्त एक नहिं आया ॥
यम जालिम तेरे मन भाया । हाय जीव अन्धे हाय जीव अन्धे ॥
बन्दी छोर जो सन्त पुकारें । भूत प्रेत पशु पक्षी तारे ॥
वाकी राह न तू पग धारे । हाय जीव अन्धे हाय जीव अन्धे ॥
सारे गुरु एकसा कहिया । बिन जाने भौसागर बहिया ॥
तीरथ पारख पदमें रहता । हाय जीव अन्धे हाय जीव अन्धे ॥
जो है तेरा तारनहारो । ताके ओर न तनिक निहारो ॥
इत उत अपनी आँख पसारो । हाय जीव अन्धे हाय जीव अन्धे ॥
झांका झूँकी चहुँदिशि लावा । मन भटका ये कौन फल पावा ॥
योनी संगति फिर फिर आवा । हाय जीव अन्धे हाय जीव अन्धे ॥
गुरु और चेलेकी पहिचान गुरु शब्दका अर्थ
तन मन धन तू काको दीना । अपने चित्र विचार न कीना ॥
भवसागरमें वासा लीना । हाय जीव अन्धे हाय जीव अन्धे ॥
तन मन धन सत गुरुको दीजे । आवागमन फेर नहीं कीजे ॥
यमके फन्द न पांव धरीजे । हाय जीव अन्धे हाय जीव अन्धे ॥
सत्य कबीर पुरुष परमात्म । सुर नर मुनि जो कहत महात्म ॥
बाके बिन लाभ न आयम । हाय जीव अन्धे हाय जीव अन्धे ॥
परमानन्द चरण रज ढूँढ़ा । जाकी कृपा पाव पद गूढ़ा ॥
ताको नहीं पहिचाने मूढ़ा । हाय जीव अन्धे हाय जीव अन्धे ॥
९१ प्रश्न—जो लोग सतगुरुको पाकरभी विमुख होगये वे क्यों विमुख हुए ? उनकी क्या गति होगी ?
उत्तर—जो कोई कबीर साहबकी शरणमें आकर सच्चे हृदयसे सत्गुरुका भक्त बना उसीकी स्तुति प्रार्थनामें अपना सौभाग्य समझा उसके ऊपर असत्य आत्माका आक्रमण नहीं हो सकता । परन्तु जो अपनी प्रतिष्ठा, बड़ाई और सांसारिक झूठी मर्यादाके लोभमें पड़कर सद्गुरुका नाम छिपाकर, अपना प्रकाशित करना चाहा उसके ऊपर काल पुरुषकी ओरसे झूठी आत्मा भेजी जाती है, जो उसको भटकाकर सुख और सत्यके मार्गसे भ्रष्ट कर असत्य पथमें डालकर नष्ट कर देती है सदा उसपर प्रबल बनी रहती है ।
राम बनवास—अतः रामायणमें वृत्तांत है कि, जिस समय महाराजा भयभीत हो विचारने लगे कि, यदि रामचन्द्र गद्दीपर बैठ गये तो रावणका माराजाना दुर्लभ हो जावेगा । अंतमें सब देवताओंने विचार कर दुष्टात्मा भेजा जिसने आकर मंथराको भरमाया । मंथराने रानी कंकयीको बहकाया जिससे रानीने राजासे रामचन्द्रके बनवासका वरदान मांगा । राजाने वचन बन्ध होनेके कारण विश्व हो रामचन्द्रजीको बनयात्रा देकर आपभी असार संसारको त्याग गया । यह सब काम देवताओंके भेजे हुये उसी अशुद्ध आत्मासे पूरे हुए । रामचन्द्रकी कथा अत्यन्त प्रसिद्ध है इस कारण संक्षेप मात्र लिखी है । दुष्ट आत्माने जिसके हृदयमें वास किया वह सदाके लिये नष्ट और भ्रष्ट हो गया ।
हिरण्याक्ष—इसी प्रकार दुष्टात्माने हिरण्याक्षके हृदयमें वास किया वह विष्णुसे शत्रुता कर बैकुण्ठमें भगवान्को मारने गया । यद्यपि समय सूचकताके कारण भगवान् विष्णु बैकुण्ठ छोड़कर बाहर चले गये पर समय पाकर प्रह्लादकी सहायताका निमित्तले नरसिंह रूप धरकर उसका सर्वनाश कर दिया ।
चेलेके लक्षण बाजीगर और चरवाहा निष्कर्ष, द्रोणाचार्य और भील
रावण—इसी प्रकार रावणकोभी दुष्टात्माने बहकाया । सब ऋषि, मुनि, संत साधुने बहुत समझाया । अंतमें कबीर साहबने भी उसकी भलाई उसको दर्शाई पर मूर्खने न माना बरन सत्तरवार सतगुरुपर तलवारका घात किया । उसका जो परिणाम हुआ सो कौन नहीं जानता ? इसी प्रकार कंस आदि अनेक राजाओंको दुष्ट आत्माने बहकाकर उभयलोकसे भ्रष्ट कराया ।
शिद्वाद बादशाह—पश्चिमीय बादशाहोंमेंसे शिद्वादको दुष्ट आत्माने बहकाया उस समयके नबीको जिनका नाम हूद पैगम्बर था खुदाने उस (शिद्वादको) समझानेका हुकुम दिया । हूदने बहुत समझाया पर शिद्वादने एक भी नहीं मानी । तब हूद नबीने उसको विहिंशतका वर्णन करके कहा कि, मेरा खुदा तुझको विहिंशत देगा । शिद्वादने कहा कि, मैं तेरे खुदाके समान स्वयम् विहिंशत बनवाता हूँ ।
पश्चात् बारह वर्षमें विहिंशत बनकर तैयार हुई शिद्वाद अपने साथियों और दरबारियोंको साथ लेकर विहिंशत देखने चला । पृथ्वीसे ऊपर तक जब सब सौदियोंको चढ़कर अन्तिम सौदीपर पहुँचे तो शिद्वादने एक दरिद्र मनुष्यको फटे कपड़े पहने हुये विहिंशतके द्वारपर खड़ा देखा । शिद्वादने उससे पूछा तू कौन है ? यहाँ क्यों खड़ा है ? उसने उत्तर दिया काल हूँ तेरा प्राण निकालने आया हूँ । शिद्वादने बहुत विनती की कि, मुझे विहिंशत देख लेने दे । कालने एक भी न मान एक ऐसा भयानक शब्द किया कि, शिद्वाद अपने साथियोंसहित पातालमें धँस गया ।
नमरूद—नमरूद भी दुष्टात्माका बहकाया हुआ अपनेको खुदा क हता था । उसकी रंयत और परिजन लोग उसे ईश्वरके समान दंडवत् करते थे । उस समयके नबी इब्राहीमको, खुदाकी आज्ञा हुई कि, नमरूदको समझाओ पर उसने, इब्राहीमके बहुतसे आश्चर्य देखनेपर भी न समझा बरन कहा कि हम तेरे खुदाको मारेंगे ।
फिर एक उड़न खटोला बनवाकर नमरूद आकाशको उड़ा ; जब कुछ दूर गया तब आकाश पर एक बाण चलाया । खुदाने जिबराईलको हुकुम दिया कि, इसका तीर अमुक मछलीकी पीठमें लगा दो । फिर तो रक्त भरा हुआ तीर नमरूदके पास पहुँचा उसने निश्चय करलिया कि, मैंने इब्राहीमके खुदाको मारलिया खटोला पृथ्वीपर लाया । इब्राहीम को बुलाकर कहा कि, देख, तेरे खुदाको मैं मार आया हूँ, अब बतला तेरे खुदाकी फौज कहाँ है उसको भी मारूँ?
मायासे पार होनेका कारण
इतनी बात सुनकर इब्राहीमने कहा कि, मेरा खुदा सर्व शक्तिमान है उसको कौन मार सकता है ? इतना कहकर पहाड़पर गये । ईश्वरसे प्रार्थना की कि, या खुदा नमरुद बड़ा अभिमानी हो गया है कि, कुछभी कहना नहीं मानता । तू अपनी फौज दिखला दे । तब खुदाने हुकुम दिया कि, जाकर नमरुद से कहदे अपनी फौज तैयार करे मेरी भी फौज आती है । इब्राहीमने आकर नमरुदसे कहा मेरे खुदाकी फौज आयाही चाहती है । इतना सुनकर नमरुदने अपनी फौजको हुकुम दिया, वे सब युद्धके लिये तैयार होकर मैदानमें उपस्थित हुये । उधर एक ऐसी जहरीले डंकवाले मच्छरोंकी फौज ऐसी आई कि, एक मच्छर भी किसी मनुष्य अथवा घोड़े हाथीपर बैठ जाता तो वह तत्कालही मृत्युको प्राप्त होता । इसी प्रकार नमरुदकी सेनाको नष्ट कर डाला । एक मच्छरने नमरुदके भी मस्तिष्कमें घुसकर उसका भेजा खाना आरम्भ किया । आराम न होनेपर नित्य प्रति जूतासे उसका मस्तिष्क ठोका जाने लगा । इब्राहीम ने बहुत प्रकारके आश्चर्य कौतुक दिखाकर उसे समझना चाहा लेकिन उसने एक को भी न माना ।
फिरऊन—यही दशा फिरऊनकी हुई थी उसको मूसाने बहुत समझाया पर न माना, अन्तमें सेनासहित नदीमें डूबकर भर गया ।
अख्याब बादशाह—पुराने अहदनामे के दूसरी तवारीखका १८ बाव-१६ से ३४ आयतक लिखा है कि, जब अख्याब बादशाहको खुदाने नष्ट करना चाहा उस समय खुदाका ऐसा प्रकाश भयानक रूप देखा कि, फिरिस्तोंकी सेनाके बीचोबीचमें ज्योति खड़ी है । एक असत्य आत्माने आकर कहा या खुदा मैं झूठी रहूँ हूँ यदि आप आज्ञा दो तो नबियोंके भीतर जाकर नबियोंसे झूठी साक्षी दिलवाऊँ जिससे अख्याब मारा जावे ।
यह बात सुनकर खुदाने हुकुम दिया कि, अच्छा जा, नबियोंसे साक्षी भरा । वह असत्य रहूँ वहांसे चली, नबियोंको बहकाया । जब अख्याबने सब नबियोंको बुलाकर पूछा कि, तुम लोग बतलाओ कि, मैं युद्धमें जाऊँ तो मुझे जय प्राप्त होगी ? नबियोंने झूठी साक्षी भरी कि, हाँ जा तेरीही जय होगी । वह लड़ाईमें गया सेनासहित मारा गया ।
ऐसेही कालपुरषने सब आदमियोंके साथ एक झूठी आत्मा लगा दी है जिससे सुमार्ग छोड़ कुमार्गमें लगे रहे भक्ति मुक्तिकी ओर न झुकें । पर जो लोग सतगुरुसे सत्य प्रीति करते हैं उनपर झूठी आत्माका बल नहीं चलता क्योंकि,
पथ प्रचलित होनेका कारण भ्रमको मुक्तिमार्ग जाननेका कारण
सद्गुरु उनकी रक्षा करता है । जो लोग झूठे गुरु पर विश्वास करते हैं, उनका उपदेश मानते हैं वे सब नष्ट हो जाते हैं ।
मुखम्मिसतरजीअ बन्द ।
वह लोग कहाँ मेरे शहरके । दरवेश हजार गैर दरके ।
मुखविर नसो हमारे घरके । सब बन्दे जमीन जमान जरके ॥
झूठे नबीपर यकीन करके ।
झूठे गुरु झूठे अम्बिया है । झूठे पै गवाही सब दिया है ।
दे झूठेके अहदको लिया है । सब सैद हूये हरी व हरके ॥ झूठे० ॥
हो झूठे गुरुकी दस्त गीरी । हरगिज नहि छूठे तब असीरी ॥
सब इलमो अमलसे हो तगीरी । फन्दमें पड़े सो काल डरके ॥ झूठे० ॥
उनको नहि मुक्तिकी है उम्मेद । जो जाने नहीं झूठ सचका भेद ॥
हरगिज न करे सुकर्मका छेद । पिया है जहर प्याला भरके ॥ झूठे० ॥
दरिमाय अमीक दो जहां है । वह किशती व नाखुदा कहाँ है ॥
यह खानः आबी अबलहां है । जा कौन सके यह पार तरके ॥ झूठे० ॥
जहां मस्त तंग डूबे कोते । मामूर मनी हैं मगज जेते ॥
आजिज न व इजज दिल जो देते । महरम न कूच और सफरके ॥
झूठे नबीपर यकीन करके ।
यह तो थोड़ासा जो कुछ हाल लिखा वह व्यावहारिक विमुखोंका लिखा है ।
धार्मिक विमुखोंका हाल ।
जो लोग ईश्वर अथवा गुरुसे विमुख हुये, उनको न तो ईश्वरही मिला न गुरुही मिला उन्होंने शुभ अथवा अशुभ जो कुछ किया उसका फल भोगते हुए आवागमनमें पड़े रहेंगे उनको मुक्तिका मार्ग नहीं मिलेगा ।
जो लोग गुरुविमुख होते हैं वेही ईश्वरसे विमुख होते हैं। क्योंकि, गुरुपद गोविन्द पदसे बहुत बढ़कर है । कितने आचार्यसे अपने गुरुसे विमुख हुए उनके पीछे कितने अपने आचार्य विमुख हुये ऐसे विमुखोंके ऊपर धिक्कार और शोक है ।
वर्तमान कालमें कबीरपंथान्तर्गत नानक पंथके नानकशाह स्वयम् विमुख नहीं थे । वे सदा अपने गुरुकी स्तुति किया करते थे ।
शब्द— ऊँचे अपार वे अन्त स्वामी, कौन जाने गुण तेरा ।
गावत उधरे सुनत इधरे, बिनशे पाप धनेरा ॥