भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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तन मन धन तू काको दीना । अपने चित्र विचार न कीना ॥
भवसागरमें वासा लीना । हाय जीव अन्धे हाय जीव अन्धे ॥
तन मन धन सत गुरुको दीजे । आवागमन फेर नहीं कीजे ॥
यमके फन्द न पांव धरीजे । हाय जीव अन्धे हाय जीव अन्धे ॥
सत्य कबीर पुरुष परमात्म । सुर नर मुनि जो कहत महात्म ॥
बाके बिन लाभ न आयम । हाय जीव अन्धे हाय जीव अन्धे ॥
परमानन्द चरण रज ढूँढ़ा । जाकी कृपा पाव पद गूढ़ा ॥
ताको नहीं पहिचाने मूढ़ा । हाय जीव अन्धे हाय जीव अन्धे ॥

९१ प्रश्न—जो लोग सतगुरुको पाकरभी विमुख होगये वे क्यों विमुख हुए ? उनकी क्या गति होगी ?

उत्तर—जो कोई कबीर साहबकी शरणमें आकर सच्चे हृदयसे सत्गुरुका भक्त बना उसीकी स्तुति प्रार्थनामें अपना सौभाग्य समझा उसके ऊपर असत्य आत्माका आक्रमण नहीं हो सकता । परन्तु जो अपनी प्रतिष्ठा, बड़ाई और सांसारिक झूठी मर्यादाके लोभमें पड़कर सद्गुरुका नाम छिपाकर, अपना प्रकाशित करना चाहा उसके ऊपर काल पुरुषकी ओरसे झूठी आत्मा भेजी जाती है, जो उसको भटकाकर सुख और सत्यके मार्गसे भ्रष्ट कर असत्य पथमें डालकर नष्ट कर देती है सदा उसपर प्रबल बनी रहती है ।

राम बनवास—अतः रामायणमें वृत्तांत है कि, जिस समय महाराजा भयभीत हो विचारने लगे कि, यदि रामचन्द्र गद्दीपर बैठ गये तो रावणका माराजाना दुर्लभ हो जावेगा । अंतमें सब देवताओंने विचार कर दुष्टात्मा भेजा जिसने आकर मंथराको भरमाया । मंथराने रानी कंकयीको बहकाया जिससे रानीने राजासे रामचन्द्रके बनवासका वरदान मांगा । राजाने वचन बन्ध होनेके कारण विश्व हो रामचन्द्रजीको बनयात्रा देकर आपभी असार संसारको त्याग गया । यह सब काम देवताओंके भेजे हुये उसी अशुद्ध आत्मासे पूरे हुए । रामचन्द्रकी कथा अत्यन्त प्रसिद्ध है इस कारण संक्षेप मात्र लिखी है । दुष्ट आत्माने जिसके हृदयमें वास किया वह सदाके लिये नष्ट और भ्रष्ट हो गया ।

हिरण्याक्ष—इसी प्रकार दुष्टात्माने हिरण्याक्षके हृदयमें वास किया वह विष्णुसे शत्रुता कर बैकुण्ठमें भगवान्को मारने गया । यद्यपि समय सूचकताके कारण भगवान् विष्णु बैकुण्ठ छोड़कर बाहर चले गये पर समय पाकर प्रह्लादकी सहायताका निमित्तले नरसिंह रूप धरकर उसका सर्वनाश कर दिया ।

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