कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1310, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंवेद प्रमाण भी ऐसाही है जैसा कि, कबीर साहब कहते हैं।
सर्व ब्रह्म ज्ञानियोंके गुरु कबीर साहब कहते हैं वेद तौरीत उसके ऊपर साक्षी भरते हैं फिर कौन है कि, चन्द्रमाको अंधकारमय बतलाये ? केवल लोगोंको भ्रम हो गया है इस कारण सत्यको छोड़ असत्यको लिये बैठे हैं। उसी पर विश्वास किये बैठे हैं। सत्य झूठका निर्णय नहीं करते।
जब चन्द्रमा बेप्रकाश होगा तो विराट पुरुष भी काना ही होगा इसमें सन्देह नहीं कि, “जो ब्रह्मण्डे सोई पिण्डे” तब तो विराटके काने होनेके कारण सब जीवधारीको काना होना चाहिये।
पर इसके उलटा मनुष्य दो आँखवाले देख पड़ते हैं।
इस संसारमें जितने निश्चय हैं सब बुद्धके ठहराये हुये हैं पर स्वयम् सत्य एवं अनित्य हैं उसके निश्चय नित्य और सत्य कैसे हो सकते हैं।
भिन्न २ भाषाओं और देशोंमें अनेक मतवाले अनेकही विद्वान् हो गये हैं सबके विचारमें कुछ न कुछ भेद है पर भारतीय विद्वानों और महात्माओंका जो कुछ कथन है यह उनके अंतरीय प्रकाशके बलसे है उसमें किसी प्रकार भी असत्यता नहीं हो सकती।
टाम्की, टकोड, बराह, कोप निक्स और सर आजक नियुटन ये चार भूगोल विद्याके जाननेवाले विदेशमें हुए हैं। उन लोगोंके कथनोंमें परस्पर बहुत विरोध है, कोई पृथ्वीको गति वाली तो कोई अचल बतलाता है। जबतक नया कोई वक्ता न उठ खड़ा हुआ तबतक योरोपियन्स पुरानोंकीही बातोंको ईश्वरी लेख समझते हैं पर जब कोई नया युक्ति प्रौढ़ बादसे अथवा और किसी रीतिसे अपना कथन पुष्ट करे तो पिछलेको तृणवत् त्याग देते हैं दो सौ वर्षोंसे पश्चिमी लोगोंने सबके कथनको असार समझकर सर आइजक नियुटनके कथन पर अवलम्ब किया है देखें यह अवलम्ब उनका कबतक ठहरता है। सर आइजकका भी सार माना गया सिद्धान्त कबतक सार रहता है ? कबतक लोग विवेक और विचारके विरुद्ध इस प्रकारके विश्वास करते रहते हैं।
यद्यपि चतुर लोगोंने अपनी चतुराईसे कितने सिद्धान्त बनाये और बनाते जाते हैं पर किसीकी स्थिति नहीं हुई न होगी। प्राकृतिक जन उनकी अनुसरता कर करके पछताये और पछतावेंगे। सन्तोंने अंतरीय प्रकाश और ज्ञानके बलसे जो कुछ कहा है वही सत्य है। उन्हींका वचन माननेसे भाग्यमान् हो सकता है।