कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1319, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंसद्गुरु उनकी रक्षा करता है । जो लोग झूठे गुरु पर विश्वास करते हैं, उनका उपदेश मानते हैं वे सब नष्ट हो जाते हैं ।
मुखम्मिसतरजीअ बन्द ।
वह लोग कहाँ मेरे शहरके । दरवेश हजार गैर दरके ।
मुखविर नसो हमारे घरके । सब बन्दे जमीन जमान जरके ॥
झूठे नबीपर यकीन करके ।
झूठे गुरु झूठे अम्बिया है । झूठे पै गवाही सब दिया है ।
दे झूठेके अहदको लिया है । सब सैद हूये हरी व हरके ॥ झूठे० ॥
हो झूठे गुरुकी दस्त गीरी । हरगिज नहि छूठे तब असीरी ॥
सब इलमो अमलसे हो तगीरी । फन्दमें पड़े सो काल डरके ॥ झूठे० ॥
उनको नहि मुक्तिकी है उम्मेद । जो जाने नहीं झूठ सचका भेद ॥
हरगिज न करे सुकर्मका छेद । पिया है जहर प्याला भरके ॥ झूठे० ॥
दरिमाय अमीक दो जहां है । वह किशती व नाखुदा कहाँ है ॥
यह खानः आबी अबलहां है । जा कौन सके यह पार तरके ॥ झूठे० ॥
जहां मस्त तंग डूबे कोते । मामूर मनी हैं मगज जेते ॥
आजिज न व इजज दिल जो देते । महरम न कूच और सफरके ॥
झूठे नबीपर यकीन करके ।
यह तो थोड़ासा जो कुछ हाल लिखा वह व्यावहारिक विमुखोंका लिखा है ।
धार्मिक विमुखोंका हाल ।
जो लोग ईश्वर अथवा गुरुसे विमुख हुये, उनको न तो ईश्वरही मिला न गुरुही मिला उन्होंने शुभ अथवा अशुभ जो कुछ किया उसका फल भोगते हुए आवागमनमें पड़े रहेंगे उनको मुक्तिका मार्ग नहीं मिलेगा ।
जो लोग गुरुविमुख होते हैं वेही ईश्वरसे विमुख होते हैं। क्योंकि, गुरुपद गोविन्द पदसे बहुत बढ़कर है । कितने आचार्यसे अपने गुरुसे विमुख हुए उनके पीछे कितने अपने आचार्य विमुख हुये ऐसे विमुखोंके ऊपर धिक्कार और शोक है ।
वर्तमान कालमें कबीरपंथान्तर्गत नानक पंथके नानकशाह स्वयम् विमुख नहीं थे । वे सदा अपने गुरुकी स्तुति किया करते थे ।
शब्द— ऊँचे अपार वे अन्त स्वामी, कौन जाने गुण तेरा ।
गावत उधरे सुनत इधरे, बिनशे पाप धनेरा ॥