भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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सद्गुरु उनकी रक्षा करता है । जो लोग झूठे गुरु पर विश्वास करते हैं, उनका उपदेश मानते हैं वे सब नष्ट हो जाते हैं ।

मुखम्मिसतरजीअ बन्द ।

वह लोग कहाँ मेरे शहरके । दरवेश हजार गैर दरके ।

मुखविर नसो हमारे घरके । सब बन्दे जमीन जमान जरके ॥

झूठे नबीपर यकीन करके ।

झूठे गुरु झूठे अम्बिया है । झूठे पै गवाही सब दिया है ।

दे झूठेके अहदको लिया है । सब सैद हूये हरी व हरके ॥ झूठे० ॥

हो झूठे गुरुकी दस्त गीरी । हरगिज नहि छूठे तब असीरी ॥

सब इलमो अमलसे हो तगीरी । फन्दमें पड़े सो काल डरके ॥ झूठे० ॥

उनको नहि मुक्तिकी है उम्मेद । जो जाने नहीं झूठ सचका भेद ॥

हरगिज न करे सुकर्मका छेद । पिया है जहर प्याला भरके ॥ झूठे० ॥

दरिमाय अमीक दो जहां है । वह किशती व नाखुदा कहाँ है ॥

यह खानः आबी अबलहां है । जा कौन सके यह पार तरके ॥ झूठे० ॥

जहां मस्त तंग डूबे कोते । मामूर मनी हैं मगज जेते ॥

आजिज न व इजज दिल जो देते । महरम न कूच और सफरके ॥

झूठे नबीपर यकीन करके ।

यह तो थोड़ासा जो कुछ हाल लिखा वह व्यावहारिक विमुखोंका लिखा है ।

धार्मिक विमुखोंका हाल ।

जो लोग ईश्वर अथवा गुरुसे विमुख हुये, उनको न तो ईश्वरही मिला न गुरुही मिला उन्होंने शुभ अथवा अशुभ जो कुछ किया उसका फल भोगते हुए आवागमनमें पड़े रहेंगे उनको मुक्तिका मार्ग नहीं मिलेगा ।

जो लोग गुरुविमुख होते हैं वेही ईश्वरसे विमुख होते हैं। क्योंकि, गुरुपद गोविन्द पदसे बहुत बढ़कर है । कितने आचार्यसे अपने गुरुसे विमुख हुए उनके पीछे कितने अपने आचार्य विमुख हुये ऐसे विमुखोंके ऊपर धिक्कार और शोक है ।

वर्तमान कालमें कबीरपंथान्तर्गत नानक पंथके नानकशाह स्वयम् विमुख नहीं थे । वे सदा अपने गुरुकी स्तुति किया करते थे ।

शब्द— ऊँचे अपार वे अन्त स्वामी, कौन जाने गुण तेरा ।

गावत उधरे सुनत इधरे, बिनशे पाप धनेरा ॥