कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1314, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्द— कीना मगह प्याना सतगुर कीनारे ।
दोनों दीन चले संग जाके हिन्दू मुस्लमानारे ॥
मुक्ति क्षेत्रको छाड़ि चले हैं तजि काशी अस्थानारे ॥
शाह सिकन्दर कदम लेत है बादशाहा सुल्तानारे ॥
चारों वेद कितेव संग है खोजी बड़े वयानारे ॥
सालिगराम मुरतिसे सेवैं ज्ञान समुन्दर दानारे ॥
षट् दर्शन जा संग चलत हैं गावत बानी बानारे ॥
अपना अपना इष्ट सम्हालें बांचे पोथी पानारे ॥
चादर फूल बिछाई सतगुरु देखि सकल जहानारे ॥
चारों दाग रहित है सतगुरु बिगत अलख अमानारे ॥
राय बीरसिंघ करें बिनती बिजली खान पठानारे ॥
दो चादर बख्शी दोनोंको दीन पान परवानारे ॥
नूर नूर निर्गुण पद मेला दर्शाहि वही हैरानारे ॥
पद लौलीन भये अविनाशी पाये पिंड परानारे ॥
क्षब्द सरूप साहब सारेंगे शब्दी शब्द समानारे ॥
दास गरीब कबीर अर्थमें फरके ताहि धुजानारे ॥
साखी— गरीब—काशीपुरी कसूरिया, मुक्ति होत सब जात ॥
काशी तजि मगहर गये, लगी मुक्ति सर लात ॥
गरीब—पन्द्रह सौ पचहत्तरा, किया मगहको गौन ॥
मगसर सुदी एकादशी, मिली पवनमें पवन ॥
रमैनी— चले कबीर मगहके ताई । तहवां फूलन सेज बिछाई ॥
दोनों दीन अधिक पर भाव । दुखी दुश्मन और सब साव ॥
तहाँ चले बिजलो खा पैठाना । बीर सिंह बघेल रवाना ॥
काशी उमडी चली मगहरको । कोई न पावे ताभु डगरको ॥
वैरागी सन्यासी योगी । चले मगहको क्षब्द वियोगी ॥
तीन रोजमें पहुँचे जाई । तहवाँ सुमिरण राम खुदाई ॥
दोनों दीनहि बाहन जोरी । शस्त्र बांध लियो भर कोई ॥
वे गाड़न वे जारन कहई । दोनों दीन अधिक उरझहई ।
तहाँ कबीर कहें एक भाखा । शस्त्र करे सो ताहि तलाका ॥
शस्त्र करे सो हमरो द्रोही । ताके बीच पिछोड़ी होई ॥
सुधि बिजली खां जात हमारी । हम हैं शब्द रूप निरंकारी ॥