भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

कृष्णका इन्द्र दमन राजाको सपना देना समुद्रके कोपका कारण

लोग पूछते कि, कबीरजी ! आपका गुरु कौन है ? उस समय तो आपका कोई गुरु नहीं था, इस प्रश्नपर आप निरुत्तर और निस्तब्ध हो कुछ न बोलते । तब साधु लोग कहते कि बिना गुरुके तुम्हारा ज्ञान किसी कामका नहीं, बिना गुरुके किसीको मुक्ति नहीं मिलेगी, तुम्हारा यह सब ज्ञान और कथनी व्यर्थ है ! जब साधु लोग कबीर साहबपर इस प्रकार कटाक्ष करने लगे तब आपने रामानन्द स्वामीको गुरु करनेका संकल्प किया, उस समय आपका वय पाँच वर्ष मात्रका था ।

गुरु करनेका वृत्तान्त । (बृ. कसौटी)

सो वृत्तान्त अब करें बखाना । जिमि कबीर काशी कथ ज्ञाना ॥

पांच वरषके जब भये, काशीमांझ कबीर ।

गरीबदास अजब कला, ज्ञान ध्यान गुणसीर ॥

जबसे काजी कबीर साहबके बचनोंसे लज्जित होकर चला आया तबसे वह तो कभी साहबके सामने नहीं जाता । परन्तु उस दिनसे साहबकी ऐसी प्रसिद्धि हुई कि, आपकी ज्ञानपूर्ण बातोंको सुननेके लिये अनेक लोग आपके पास आने लगे ।

षटदर्शन मिलनेको आवैं । आत्मज्ञान सबकौ समझावैं ॥

सत्य पंथका कीन परचारा । हिंसा कर्म नीच निरधारा ॥

कबीरोपदेश ।

तीरथ बरत अरु मूरत पूजा । जीव हनैं ईश्वर कथ दूजा ॥

जीव घात करई जो कोई । बासा तासु नरकमें होई ॥

पाहनको पूजैं पाखण्डी । गल काटै जो सन्मुख चंड़ी ॥

बकरा मुरगा जबह जो करहीं । विस्मिल्लाः कहि धर्मकहि उच्चरहीं ॥

ते सब पापकर्म कमाहीं । हिन्दू तुच्छ दौउ नरके जाहीं ॥

इस प्रकारके उपदेशको सुनकर हिन्दू मुसलमान दोनोंही द्वेष मानने लगे । किन्तु कबीर साहबको कुछ भय नहीं था । बल्कि जब बहुतसे बालक इकट्ठे हो जाते तब आप उनके संग खेलने लग जाते और उनसे कहते सब, 'राम, राम, गोविन्द, गोविन्द' कहो ।

एक दिन एक मुसलमानने कहा, देखो यह कबीर हिन्दू देवोंका नाम लेता है । यह बड़ा भारी काफिर होगा । यह सुनकर कबीर साहबने उससे कहा—
गला काटि बिस्मिल करैं, ते काफिर बे बूझ ।
औरनको काफिर कहैं, अपना कुफ न सूझ ॥

यह सुनकर वह मुसलमान चुप हो गया । एक दिन कबीर साहब राम, कृष्ण, गोविन्दका नाम लेते सुनकर एक हिन्दूने कहा, 'क्यों बे ! मुसलमान होकर हमारे ईश्वरका नाम लेता है ?' तब कबीर साहबने उत्तर दिया—

शब्द—भाईरे दुई जगदीश कहांतें आये कौने मति भरमाया ।

अल्लहः राम करीमा केशव हरि हजरत नाम धराया ॥

गहना एक कनक ते बनता तामें भाव न दूजा ।

कहन सुननको दुइ कर थापे इक निमाज इक पूजा ॥

वहि महादेव वही मुहम्मह ब्रह्मा आदम कहिये ।

कोइ हिन्दू कोइ तुर्क कहावे एक जमीं पर रहिये ॥

वेद किताब पढ़ें वे खुतवा वै मूलना वे पांडे ।

विगत विगतकें नाम धरावें एक मटियाके भांडे ॥

कहैं कबीर वै दूनों भूले रामैं किनहु न पाया ।

वैं खसिया वे गाय कटावैं वादे जन्म गवाँया ॥

ऐसेही अवसर पर एक दिन एक ब्राह्मणने व्यंगसे कहा कि, भाई ? तू उससे क्या पूछता है, राम नाम बिना मुक्ति किसकी हुई है ! रामनाम सब वेदोंका सार है, अल्लाह, खुदामें क्या धरा है ! इसलिये तो कबीर अल्लाह खुदा छोड़कर राम राम कहता है । इसपर कबीर साहबने उसको उत्तर दिया—

शब्द - पंडित बाद बदौ सो झूठा ।

राम कहे जगत गति पावे, खांड कहै मुख मीठा ॥

पावक कहै पांव जो दहै, जल कहे तिरषा बुझायी ।

भोजन कहे भूख जो भागै, तौ दुनिया तरि जायी ॥

बरक संग सुवा हरि बोलै, हरि प्रताप नहि जानै ।

जो कबहुँ उडि जाय जंगलको, तो हरि सुरति न आनै ॥

विनु देखे विनु अरस परस, विनु नाम लियेका होई ।

धनके कहे धनिक जो होवे, निर्धन रहत न कोई ॥

सांची प्रीति विषय माया सो, हरि भगतनकी हांसी ।

कहहि कबीर एक राम भजे विनु, बाँधे जमपुर जासी ॥

जोई आकर कबीर साहबके विचारका खण्डन करना चाहता वह आपही परास्त होकर चला जाता. तब तो बिद्वेषियों मजहबियोंको बड़ी कठिनाता पड़ने लगी; क्योंकि, बालक कबीरकी अद्भुत लीला और चरित्रको देखकर

भ्रम विमोचन स्वामी रामानुजाचार्य और जगन्नाथपुरी

संसारी जीव सहजही उनकी ओर आकर्षित होते। और जो कबीर साहबके पास जाता सो आपके उपदेशको ग्रहण कर पाखण्डको छोड देता। यह देखकर विचार करते २ उन्हें और तो कोई उपाय नहीं सूझा, किन्तु उनमेंसे जब कोई कबीर साहबके निकट आता तब लोगोंकी भीड़ देखकर यह कहता, कि, भाइयो ! तुम इस दुधमुहे बालककी बातोंमें क्या लगे हो ! विचारने अबतक गुरुका भी मुख नहीं देखा है, जानते नहीं हो ? शुक्रदेव जैसे तपस्वी और त्यागी ज्ञानी महात्मा बिना गुरु किये स्वर्गमें नहीं जाने पाये। तब इस निगुरे बालककी बातोंको सुननेसे तुम्हारा क्या भला होगा ?

यह सुनकर कबीर साहबने विचार किया “यद्यपि मुझे गुरु करनेकी आवश्यकता नहीं है, तथापि भक्तिकी मर्यादा स्थापित करने और सत्य धर्मके प्रचारके लिये मैं संसारमें आया हूँ, इसलिये गुरु करना उचित है। दूसरे आजकलके सबसे बड़े गुरु स्वामी रामानन्दजी संसारी भावनाओंमें पड़कर सत्य-मार्गसे भ्रष्ट हो रहे हैं। सो वह शिष्य बनकर मेरा उपदेश तो सुनेंगेही नहीं, मैं ही उनका शिष्य बनकर उनको मार्गपर लाऊँ तो ठीक है।” किन्तु, रामानन्द स्वामी तो वर्णाश्रमके फन्देमें ऐसे पड़े थे कि, द्विजोंके सिवाय किसीका मुख भी नहीं देखते थे। फिर मुसलमान करके प्रसिद्ध बालक कबीरको वह अपना शिष्य कैसे बनाते ? इसलिये कबीर साहबने यह युक्ति निकाली। जो आगेके प्रकरणमें वर्णित है।

अङ्गतालीसवाँ प्रकरण ।

कबीरसाहबका रामानन्द स्वामी वैष्णवके पास जाना और दीक्षा देनेका निवेदन करना और स्वामीजीका दीक्षा देनेसे इनकार करना तब कबीर साहबका एक छोटा लडका होकर रामानन्दके पथमें पड़ना, स्वामीजीके खड़ाऊँकी ठोकर कबीर साहबको लगने और चेलाका संबंध बनानेका वृत्तान्त ।

कबीर साहबका जब पाँच वर्षका वय हुआ तब आपने रामानन्द स्वामीके पास समाचार भेजा कि, स्वामीजी ! मुझको दीक्षा देकर अपना शिष्य बनाइये और मुझसे गुरुदक्षिणा लीजिए। यह बात सुनकर स्वामीजीने उत्तर भेजा कि, मैं शूद्रको दीक्षा नहीं देता। देखो रामानन्द और कबीर गोष्ठी ज्ञानतिलकमें—

तीसरी बार कबीर साहिबका पृथ्वीपर प्रकट होना इत्यादि

कबीर वचन ।

रामानन्द गुरुदिच्छा दीजे । गुरुदच्छिना हमसे लीजे ॥

रामानन्द वचन ।

सूद्रेके कान न लागा भाई । तीन लोकमें मोर बड़ाई ॥

जब रामानन्दजीने स्पष्ट उत्तर दे दिया कि, मैं दीक्षा नहीं दूंगा, तब कबीर साहब चुप चाप चले आये। स्वामीजीका यह नियम था कि, एकपहर रात रहताँ तब गंगास्नानको आया करते थे। कबीर साहबने वह समय ठीक कर लिया और जब स्वामी ी स्नान करने चले तब आप छोटे बालकका रूप धारण करके स्वामीजीके मार्गमें सीढ़ियोंपर सो गये। स्वामीजी खड़ाऊँ पहने चले आते थे। वहाँ आतेही आपकी खड़ाऊँ की ठोकर बालकके शिरमें लगी। तब बालक रोने लगा। जब लड़केको रोते देखा तब स्वामी जी खड़े हो गये, और बालकके शिरपर हाथ धरकर कहा कि, बत्स ! मत रों राम राम कहो। तब कबीर साहब शान्त हो गये और कहने लगे गुरुजी राम राम कहूँ ? स्वामीजीने कहा हों राम राम कहो, उस समयसे कबीर साहब बराबर राम राम कहने लगे और स्वामी रामानन्दजीसे गुरु शिष्यका संबंध जोड़ लिया। फिर प्रातःकाल कंठी धारण कर हाथमें तुलसीकी माला लेलिया और मस्तकपर तिलक लगाकर ठीक वैष्णव मूर्ति बना राम राम की धुन लगादी। कबीर साहबका यह रंग ढंग देखकर अनेक मनुष्य प्रश्न करने लगे, कबीर साहबजी ! आपने यह वेष्ट वैष्णवका किस कारण बनाया है ? तब वे सब लोगोंको उत्तर देने लगे कि, मैंने रामानन्द स्वामीको गुरु बनाया है। यह बात सुनतेही संन्यासी तथा वैरागियोंने स्वामीजीसे जाकर कहा कि, महाराज ! आपने ऐसी मर्यादा छोड़ दी कि, जोलाहेके पुत्रको शिष्य कर लिया, ऐसा आपको उचित नहीं था। यह बात सुनकर स्वामीजीने कहा कि, मैंने चेला नहीं किया, बुलाओ कबीरको। लोग गये और कबीर साहबको बुला लाये।

उनचासवों प्रकरण ।

स्वामी रामानन्द कबीर साहबको शिष्य स्वीकार करना ।

उस समय रामानन्द स्वामीका यह नियम था कि, वह किसीको देखते नहीं थे और कंदराके भीतर परदेमें रहा करते थे। कबीर साहबको लाकर लोगोंने परदेके बाहर खड़ा किया। परदेके भीतरसे स्वामीजी बोले कि, ऐ कबीर ! मैंने तुमको अपना चेला कब बनाया। तब कबीर साहबने उत्तर दिया

कबीर साहिबका ४ थी ५ वीं छठीं और ७ वीं बार प्रकट होने का वृत्तान्त

कि, स्वामीजी जब आप गंगा स्नान को जाते थे, और मैं पथमें पड़ा था, आपके खड़ाऊँ की ठोकर मेरे माथेमें लगी मैं रुदन करने लगा । तब आपने कहा राम राम कह; उस समयसे मैं राम राम कहने लगा । तब स्वामीजीने कहा कि, हों ! एक बालक था जिसको मेरे खड़ाऊँ की ठोकर लगी और उससे मैंने राम राम कहा था । तब कबीर साहबने कहा कि गुरुजी वह लड़का मैं ही था । स्वामी जीने कहा कि, क्या इस प्रकार कोई गुरु चेला हो सकता है ? कबीर साहबने कहा कि, गुरुजी वेदशास्त्रमें रामनामसे बढ़कर और दूसरा क्या है ? तब स्वामीने उत्तर दिया कि, सबसे बढ़कर यही है, इससे बढ़कर और कुछ नहीं है । कबीर साहबने कहा कि, जो नाम सबसे बढ़कर है, सो तो आपने मेरे माथेपर हाथ धरकर देही दिया, फिर गुरु और शिष्य किस प्रकार होता है । कबीर साहबने स्वामीजीको अपनी बातोंसे निरुत्तर कर दिया । तब स्वामीजी बोले कि, जिस बालकसे मैंने राम नाम कहा था वह छोटा था और तू तो बड़ा जान पड़ता है । उस समय कबीर साहब वैसाही छोटा बालक बनकर, स्वामीजीकी गुफाके भीतर घुस गये और उनके चरणोंपर गिरकर कहने लगे कि, मैं उस समय ऐसाही छोटा था न ! यह कौतुक देखकर लोगोंको अत्यंत आश्चर्य हुआ कि, देखो यह बालक कौसा छोटा हो गया । तब अनन्तानन्दजीने, जो रामानन्द-स्वामीके बड़े चेले थे, समझाया कि, गुरुजी आप कबीरको मनुष्यका बालक न समझो, यह सिद्धका अवतार है, आप इससे किसी प्रकारका भेद मत करो । उस समय से स्वामीजीने कबीर साहबसे परदा छोड़ दिया और अपने शिष्योंमें मिला लिया । स्वामीजीके जितने शिष्य थे सब कबीर साहबको गुरुके समान मानते और अत्यंत मर्यादा तथा प्रतिष्ठा किया करते थे । स्वयम् कबीर साहब भी सबसे नितान्तही नम्रता पूर्वक मिलते थे, आपके गुरु भाई आपके आज्ञा कारी थे, आपका बड़ा ध्यान रखते थे, यों स्वामी रामानन्द स्वामीके चौदहसौ चौरासी शिष्योंमें सबके सरदार कबीर साहब बने ।

फिर समय २ पर कबीर साहब और रामानन्द स्वामीमें ज्ञान और मुक्तिके विषयमें विवाद हुआ करता था । रामानन्द स्वामी तथा कबीर साहब की वार्तालाप बहुत है जिसकी इच्छा हो दूँढ कर देखलें, कबीर साहबने स्वामीजी को अनेक कौतुक दिखलाए, सो भिन्न २ ग्रंथोंमें लिखे हैं ।


कबीरसाहब और स्वामी रामानन्दजीकी गोष्ठी ।
(वृहतक० सौ०)

मुहम्मद साहिबको चेतानेका वृत्तान्त मुहम्मद साहिबके मेआराजके विषयमें मत भेद

शिष्य होनेके दूसरे दिन कबीरसाहब सबेरहीसे स्नान तिलक ध्यानमें लगे । गलेमें एक माला और जनेऊ डाल और द्वादश तिलक करके साक्षात रामानन्दियोंके समान बेष बना लिया, । वैष्णवोंकासा वेष बनाते देखकर नीमाने कहा “बेटा ! यह क्या करते हो ? किसने तुम्हारी बुद्धि ऐसी फेर दी, कि, अपने धर्म कर्मको छोड़के दूसरे धर्मवालोंकी राहपर चलते हो !” उस समय कबीरसाहबने नीमा और नीरुसे अत्यन्त नम्र भावके साथ निवेदन किया, कि, ए मात ! यह एक भ्रमही है कि, यह दीनमें तथा यह वेदीन है धर्म हमारा है यह दूसरेका है ।

सत्य पुरुष सबके लिये एक है उसका कियेसे भेद भाव नहीं है बोही सबका रचनेवाला है सिवा उसके और कोई कर्ता धर्ता और विधाता नहीं राम रहीम सब उसीके नाम हैं पीर फकीर और साधु सब अपने २ ढंगसे उसीका नाम लेते हैं ।

इस प्रकारके अनेकों उपदेशोंके बाद माता पिता दोनों शान्त हो गये आप सदाकी तरह दोवटी बुनकर बाजार में बेच दिया करते धर्म पूर्वक जो उसे मिलता उसीसे साधुसेवा कर दिया करते यदि अधिककी आवश्यकता होती हो स्वयं भगवान् पूरी करते ।

जब कोई सन्त महात्मा आपके घर आवे तो उनके भोजन बनानेके लिये चौका लगवाते । कोरे वरतन मंगवाकर विशुद्ध भोजनका सामान तयार करके देते अपनेसे जो भी कुछ हो सकती उतनी उसकी सेवा चाकरी करते । यहाँतक कि, इस कामसे उनकी परमस्नेह रखनेवाली माता भी इस कृत्यके करते करते अकुता जाती थी पर कबीर साहिबके प्रेम तथा उनकी आकर्षण शक्तिके आगे सब नतमस्तक ही रहते थे । माताका भी साहस नहीं होता था कि, वो कबीरके कथनको न माने माता का अकुलाना इसी इस शब्दमें आया है ।

शब्द — हमारे कुलकोने राम कह्यो ॥

सुनो घोरनियौ सुनो जिठनियौ, अचरज एक भयो ।

सात सूत या मुंडिया खोये मुंडियौ क्यों न मेरा ।

माय तुरकिनी बाप जुलाहा बेटा भक्त भये ॥

जबकी माला लई इन पूते तबते सुख न भये ।

नित उठ कोरी गागर मांगत लीपत जन्म गये ॥

पकज शत मुंडिया और सुवे कबीरा कहांते भये ।

रोय रोय कहत कबीरकी माता बेटा मरन गये ॥

हँसि हँसि कहत कबीरकी भँना भैया अमर भये ।

कहँहि धर्मदास सुनो भाई साधो कबीरा साहिब भये ॥

भाव—हमारे वंशमें 'राम' किसने कहा है ए देवरानी ज़िठानियों ! सुनो, एक बड़े अचरजकी बात है वा मुड़ियाने सातसूत खोये हैं फिर भी यह मेरा नहीं है मा तुरकिकी बापु जुलाहो किन्तु बेटा भक्त बन रहे हैं । जबसे इसने कंठी माला हाथमें लीं हैं उस दिनसे, मुझे कुछ भी सुख नहीं हुआ । सौ कमलकी कलियाँ कबीरको जन्मावें यह कबीर हुआ कहाँसे हैं कबीरकी माँ रो २ कर कहती है कि, ऐसा कबीर मरा भी नहीं यह सुन कबीरकी बहिन कहती है कि कबीर तो सत्य पुरुषका पथप्रदर्शक है । धर्मदासजी कहते हैं कि, ए साधुओ ! सुनो ! कबीरजी साहिब हुए हैं । एक दिन किसीने आपसे कह दिया कि, आपका घर बड़ी बुरी जगहमें है । इस पर आपने उत्तर दिया कि—

कबीरा तेरा झोंपड़ा गलकटियोंके पास ।

जेकरेंगे सो भरेंगे तुम क्यों हुए उदास ।

भाव—ए कबीर ! तेरा झोपड़ा कसाइयोंके पास है पर जो करेंगे वो भोगेंगे तुम क्यों उदास होते हो ? आपका निजी परिवार कमाल कमाली और लोईका था ये तीनों आपको स्वामीजी कहते थे । पं. हरदेवके साथ कमालीका गान्धर्व विवाह कर दिया था । अन्ततक नीमा नीरूको इनका बोध नहीं हुआ था जहाँतक कि, माताने मसाल हाथमें लेकर इनके विरुद्ध सिकायत की थी । अन्तमें इन्होंने गुरुचरणोंको ही अपना शरण बनाया तथा गुरुका सन्निधिमें अधिक समय लगाने लगे ।

कबीर दासजीके बड़े भंडारेके बाद नीमा और नीरू तो कालवश हो गये आप घरका त्याग करके सत्यपुरुषके सन्देश सुनाने आदिमें समय बिताने लगे । जब भगवान् रामानन्दजी भगवान्की मानसिक पूजा करते थे उस समय सब शिष्य लोग अपने २ नित्य नियमोंमें लग जाया करते थे यदि देर हो जाती थी तो प्रतीक्षा करते हुए वहाँ बैठे रहते थे पीछे नित्य नियमसे उठनेपर सब दर्शस्पर्श करके अपनी २ कुटियोंमें चले जाते थे ।

इसी प्रकार एकदिन रामानन्दजी स्वामी मानसिक ध्यानमें मग्न थे । उस समय ठाकुरकी माला छोटी हो गयी । तब स्वामीजीको बड़ी चिंता हुई कि, अब ठाकुरके गलेमें इसे कैसे पहनाऊँ । तब कबीर साहब स्वामीजीके मनकी बात जानकर बोले कि, स्वामीजी मालाकी गॉठ खोलकर ठाकुरको माला पहनाओ । स्वामी रामानन्दजीने ऐसाही किया । इस प्रकारके अनेक कौतुकोंको

देखकर स्वामीजीकी इच्छा हुई कि, जानना चाहिए यह कबीर कौन है जो ऐसे २ कौतुक किया करता है इस कारण स्वामीजीने ठाकुरका ध्यान किया तब ध्यानमें दिखाई दिया कि, 'ठाकुरके सिंहासनपर जो ठाकुर की मूर्ति है उसके शिरके ऊपर कबीर साहबका सिंहासन रक्खा हुवा है । जब कबीर साहबकी ऐसी बड़ाई और इतना प्रताप दृष्टिगोचर हुवा तबसे स्वामीजी कबीर साहबकी बड़ी मर्यादा करने लगे अनेक बार स्वामीजी कबीर साहबकी प्रशंसा किया करते थे । रामानन्द तो कबीर साहबकी प्रशंसा किया करते और कबीरसाहब अपने गुरुके गुण गाया करते थे ।

उस समय गोरखनाथ योगी जो बड़ाही बलिष्ठ सिद्ध था वह प्रायः रामानन्द स्वामीसे आकर वाद विवाद किया करता था, एकबार उसका सामना कबीर साहबसे हुआ । कबीर साहबका गोरखनाथके साथ बड़ाही वाद विवाद हुआ । दोनोंही ओरसे अनेक कौतुक दिखलाई दिए । जो लोगोमें प्रसिद्ध हैं । अन्तमें गोरखनाथ परास्त हुआ । और अपनी सेली और टोपी कबीर साहबके चरणोंपर चढ़ा दंडवत् प्रणाम करके एक ओरको चलता बना ।

अध्याय ॥ ४ ॥

सिकन्दर लोदी बादशाहका काशीमें आना कबीर साहबका वहाँ बुलाया जाना उनके दर्शनसे बादशाहके शरीरकी जलन दूर होना सुलतानका उनपर विश्वास लाना—

सम्बत् १५४५ विक्रमीमें बहलूलका पुत्र सिकंदर लोदी काशी नगरमें पहुँचा, बादशाहके शरीरमें जलनका रोग था । वह भी ऐसा कि, उससे उसका शरीर रात दिन जला करता था । उस रोगसे उसे तनिक भी चैन नहीं मिलता था । तब लोगोसे उसने पूछा कि, इस नगरमें कोई ऐसा भी है जो मुझे इस रोगसे मुक्त कर सके ? तब वे लोग जो कबीर साहबसे द्रष्ट रखते थे बोले कि, यहाँ कबीर नामक एक फकीर है । यदि वह आवे तो श्रीमान् आरोग्य हो सकते हैं (ऐसा कहनेका उनका तात्पर्य यह था, इस बहानेसे कबीरको बादशाहके सामने बुलवाकर मरवा डालें, जब लोगोंने बादशाहसे ऐसा कहा तब बादशाह ने आज्ञादी कि, तुरन्त कबीर साहबको बुला लाओ विलम्ब होने न पावे । शाही आज्ञा पातेही भूत्यगण दौड़े और कबीर साहबसे आकर कहा कि, आपको बादशाह बुलाते हैं शीघ्र चलो । कबीर साहब बादशाहके सामने आए । बादशाह आपका दर्शन पातेही उसी समय रोगमुक्त होगया । शरीर ठंडा हो गया, बड़ा सुख पाया । तब बादशाह सिंहासनसे उठ खड़ा हुवा । बड़ी प्रतिष्ठाके साथ

कबीर साहबको अपने बराबर बिठालिया ॥ यह कौतुक देखकर वैरियोंके दाँत खट्टे हो गए, जिह्वा बंद हो गई । उस समय ब्राह्मण और काजी जो कबीर साहबसे द्वेष रखते थे बादशाहसे फरियाद करने लगे कि, यह कबीर बड़ा काफिर है । हिन्दू तथा मुसलमान दोनों दीनोंके विरुद्ध है, अपनेको परमेश्वर कहता है । प्रत्यक्षमें पुकारता फिरता है कि, मैं समस्त संसारका रचयिता हूँ सदैव कुफ़्ही बकता रहता है । ये बातें सुनकर बादशाहने पूछा कि, ऐ कबीर ! क्या यह बात सत्य है कि, आप अपनेको परमेश्वर कहते हो ? देखो गरीबदासजीकी वाणीमें (कबीरचरित्र बोध पृ.३३)

गरीबदास वचन ।

शाह सिकन्दर बोलता, कह कबीर तू कौन ।
गरीबदास गुज़रै नहीं, कैसे बैठा मौन ॥

उत्तर कबीर साहबका ।

हम ही अलख अल्लाह हैं, कुतुब गौस गुरु पीर ।
गरीबदास मालिक धनी, हमरो नाम कबीर ॥
मैं कबीर सर्वज्ञ हूँ, सकल हमारी जात ।
गरीबदास पिंडदानमें, युगन युगन सँग साथ ॥
शाह सिकंदर देखकर, बहुत भए मिसकीन ।
गरीबदास गति शेरकी, थरकीं दोनों दीन ॥

जब कबीर साहबने प्रत्यक्षमें इस बातको कहा एवं सर्व साधारणके सामने शाही इजलासमें अपनेको परमेश्वर होनेका दावा किया । खुल्लेमखुल्ला कहा कि, मैं समस्त सृष्टिका रचयिता हूँ । तब बादशाहने एक गाय मँगवाई और अपने सामने हलाल करवाकर कबीर साहबसे कहा कि, यदि आप परमेश्वर हों तो इस गायको जिला दीजिये ।

गरीबदास वचन ।

गऊ पकड़ बिसमिल करे, दरगह खंड वजूद ।
गरीबदास उस गऊका, पिए जोलाहा दूध ॥
चुटकी तारी थाप दे, गऊ जिलाई वेग ।
गरीबदास दूहन लगे, दूध भरी है देग ॥

शाहने गायको हलाल करवा कबीर साहबसे कहा कि, इसे जीवित करिये तब कबीर साहबने उस गायके थापी दी तथा चुटकी मारी—उसी समय वह गाय उठ खड़ी हुई । उसका सब घाव तथा दर्द मिट गया । उसके स्तन दूधसे भर

खुदा साकार

गये । उसके दुग्धसे बरतन भर गए । उस दुग्धको पान करके लोग अत्यंत हर्षित हुए । शाह सिकंदर तथा उसके सभासदगण इस कौतुकको देखकर अत्यंत आश्चर्यान्वित हुए । बादशाहको विशेष विश्वास हुआ ।

शेखतकीका क्रोध ।

जब शाह सिकन्दरके पीर शेखतकीने देखा कि, अब तो शाह सिकन्दरने कबीर साहब पर बहुत विश्वास किया है और उनकी अत्यंत प्रतिष्ठा तथा मर्यादा करता है तब वह जल मरा । कारण यह कि, वह बड़ाही द्वेषी तथा ईर्षा करनेवाला था । उसने बादशाहसे कहा कि, ऐ सिकंदर ! आपने जोलाहेसे प्रेम तथा मुझसे अलगाव किया है । तब बादशाहने कहा कि, ऐ गुरुजी ! आप तो मेरे पीर हो वह एक दरवेश (साधु) है । आपने आज्ञा दी थी कि, गुरु तथा फकीर स्वयम् परमेश्वर हैं । आप और कबीर एकही हैं । मैं जलनकी बीमारीसे मर रहा था मेरे जाते हुए प्राण उसने रख लिए—मैंने उसके प्रसादसे घातक रोगसे आरोग्य लाभ किया है ।

लोगोंका शेखतकीके पास आना ।

जब बादशाहने ऐसा कहा तब शेखतकी चुपचाप अपने डेरेंको चले गए । शेखजी अपने डेरेंमें बैठे थे वे लोग जो कबीर साहबसे शत्रुता रखते थे शेखजीके पास आकर इकट्ठे हुए । ब्राह्मण तथा मुल्ला सब मिलकर कहने लगे कि, यह कबीर बड़ा काफिर है । हिन्दू तथा मुसलमान दोनोंकी निन्दा करता है । हम लोग गुरु तथा देवताके नामपर जो बलिप्रदान करते हैं अथवा कुरबानीके नामपर गऊ बकरी और मुरगा चढ़ाते हैं । इस कारण यह हम लोगोंको कसाई कहता है । इस कबीरको समस्त काशीवासी मानते हैं । हमारी कोई बात नहीं पूछता यदि यह जोलाहा किसी प्रकार मारा जाय तो हमारी छतियोंपरका भारी बोझा टल जावे । जब शेखतकीने ब्राह्मणों तथा मुसलमानोंसे ऐसा सुना तब अत्यंत प्रसन्न हो कहने लगे कि, जोलाहेसे और मुझसे तो पहलेहीसे वैर हो रहा है । अब तुमलोग इस बातपर उद्यत हो तो मैं अब निश्चय कबीर साहबका वध करूंगा कदापि जीवित न छोड़ूंगा । मेरा नाम शेखतकी है । मैं बादशाह सिकंदरका पीर हूँ । देखूँ तो वह मेरे हाथसे किस प्रकार बचता है, कैसा फक्कड़ कबीर है । मैं चाहूँ तो उसको नदीमें डुबवाऊँ—चाहूँ तो अग्निये दहन करदूँ—चाहूँ तो दीवारमें चून दूँ—चाहूँ तो टुकड़े २ काटकर कौमा करूँ—यदि चाहूँ तो बठुवेमें चुरा डालूँ । यदि चाहूँ तो तोपके सामने रखकर उड़ाऊँ । चाहूँ तो कुएँमें बंद कर दूँ और चाहूँ तो हाथीसे चखा डालूँ ।

मुहम्मद साहिबका जलाली खुदा मुहम्मद बोधका संक्षेपसार

यह बात सुनकर काजी तथा पण्डितगण अतिप्रसन्न हो प्रशंसा करने लगे कि, आप क्यों न ऐसे हों बाहवा ! आपसे सब कुछ होगा अब आप कृपा करें कि, यह जोलाहा किसी प्रकार मारा जावे ।

शेखतकीका कबीरजीको मरानेका प्रयत्न ।

यह बात सुनकर शेखजी बादशाहके पास जाकर कहा कि, ऐ सुलतान ! तू मेरा कहना मान ले । इस जोलाहेके प्राणघातकी आज्ञा देवे । इसने बड़ा कुफ्र मचाया है । यदि तू इसको मरवा न डालेगा तो मैं तुझको शाप बूंगा जिससे तेरी सम्पत्ति तथा तेरे प्राणका विनाश हो जावेगा ।

शेखतकीके कबीरजीपर जुल्म ।

यह बात सुनकर शेखजीको बादशाहने समझाया कि, ऐ पीरजी ! आपने तो मुझसे कई बार कहा था कि, पीर फकीर स्वयम् परमेश्वर हैं । तब आप क्योंकर कबीर साहबके प्राणघातके निमित्त आग्रह करते हैं । उन्होंने तो आपकी कोई क्षतिही नहीं की है फिर आपने क्यों ऐसा कुफ्र मचाया है ।

कबीर सागर न. ७ पृ. ६७ बोध सागर ।

कहो कबीरके मारन ताई । कुछ न हमारो यहाँ बसाई ॥
पीर फकीर जात अल्लाहा । मेरो जोर न पहुँचे ताहा ॥

साखी ।

जो वह होते रैयत, तो हम करते जोर ।
वह अलमस्त फकीर है, तहाँ न फावै मोर ॥
तुमहूँ कही समझाय, पीर फकीर अल्लाह ।
अब तुम कहते मारने, यह न होय हम पाह ॥

रमैनी ।

अहो पीरजी तुम वह एका । अपने मनमें करो विवेका ॥
इन कुछ तुमरो नाहि बिगारा । काहे तुमने कुफ्र पसारा ॥
बुजुर्ग सब नेकी फरमावे । जोर जुल्म कुछ ताहि न भावे ॥

साखी ।

कहा हमारा कीजिए, छोड़ दीजिए रार ।
सुलह कुल्ह दे बैठिए, अल्ला ओर निहार ॥
कहे तकी सुलतान सुन, तुझे नहीं कुछ दुःख ।
जो मैं कहूँ सो मानिए, कर मेरो सन्तोष ॥

कहे सिकन्दर पीर सुन, मेरो शिर वरु लेहु ।
फक्कड़ कबीर न मारिए, यह माँगे मोहि देहुं ॥

रमैनी ।

सुन्ते ही तकी क्रोध प्रजारा । शिरसे ताज जमींपर मारा ॥
निपट विकल देखो तेही भाई । तब हम शाहसे कहा बुझाई ॥
कहैं कबीर सुनो सुलताना । करो पीरको वचन प्रमाना ॥

साखी ।

पीर कहे सो करो तुम, हमें नहीं कुछ त्रास ।
हमहूं कहें सत नाम बल, कहें कबीर सुदास ॥

रमैनी ।

कहै सिकन्दर सुनोजी पीरा । मन मानैं सा करो कबीरा ॥

साखी ।

डारो मार कबीरको, हम नहि मानैं ऊन ।
ताका कबहु न भलाहो, जो करे फक्कड़का खून ॥

रमैनी ।

शेख तकी तब कहे रिसाई । है कोई बाँध कबीरा भाई ।

साखी ।

शेख तकी आपै उठ, काजी पण्डित झार ।
बाँध बाँध सब कोई कहै, कोइ न करे गोहार ॥
बाँह बाँध पग बाँधके, बोर गङ्गजल नीर ।
नहि संशय निश्चिन्त होइ, निभंयदास कबीर ॥
गङ्गजलपर आसन, बंद परे खहराय ।
जिन कबीर सत नामबल, निभंय मङ्गल गाय ॥
शाह सिकंदर देखही, औ ढाढ़े सब लोग ।
धन्य कबीर सब कोई कहै, शेख तकी भा सोग ॥

रमैनी ।

शेखतकी तब मीजें हाथा । सूखे मुँह नहि आवै बाता ॥

साखी ।

शाह सिकन्दर जोर कर, कहै सुनो तुम पीर ।
किसको बाँध डुबाव है, निभंयदास कबीर ॥

(देखो ग्रंथ कबीरसागरनं. ११ कबीरचरित्रबोध तथा दूसरे ग्रन्थोंमें) तब शेखने कहा, मैं जानता हूँ कि, कबीरने जादू किया है इस कारण वह नहीं डूबा है। यदि अबकी बार मैं कबीरको पाजाऊँ तो अग्निमें जलादूँ—यदि वह अग्निसे बच जावेगा तो मैं उसको परमेश्वरका सत्य अंश समझूंगा। उसी समय कबीर साहब गङ्गासे बाहर निकल शाहसिकंदरके निकट गये आपके देखतेही शाह उठ खड़ा हुआ और अत्यंत मान संप्रभम सहित कबीर साहबको अपने बराबर आसनपर बैठा लिया। यह देखके पूर्वोक्त शेख अत्यंत क्रुद्ध हुआ। उसके नेत्र रक्तवर्णके होगये, कहा कि ए, कबीर ! तूने जादू किया है इस कारणही जलमें नहीं डूबा। तब कबीर साहबने कहा कि, ऐ शेखजी ! जैसे आप कहो बादशाह बोला कि, आप मुझे कबीरके मारनेके लिये कहते हैं पर इसमें मेरा कुछ वश नहीं है क्योंकि, पीर और फकीर परमात्माकी जात हैं वहां मेरा जोर नहीं पहुंच सकता। यदि वो रैयत (प्रजा) होते तो मैं जोरभी करता वो लापरभा फकीर है वहां जोर करना शोभा नहीं देता। आप ही तो यह समझकर कहा करते थे कि, पीर और फकीर परमात्मा हैं अब आप इस फकीर कबीरको मारनेके लिये कहते हैं यह मुझसे नहीं हो सकता। आप और वो एकही तो हैं यह अपने मनसे विचारो उसने तो आपका कुछ भी नहीं बिगाड़ा है। आप उसपर क्यों गजब करना चाहते हो, बड़े लोग नेकी बताया करते हैं, उन्हें जोरो जुल्म नहीं अच्छे लगते। आप मेरी बात मानलें लड़ाई छोड़ दें परमात्माकी ओर देखकर मेल करलें। यह सुन तकी बोला कि, ए सुलतान ! तुमें कोई दुःख न होगा मैं कहूं सो मानकर मेरा सन्तोष कर। यह सुन सिकन्दर बोला कि, चाहे मेरा शिर लेलीजिये पर फक्कड़ कबीरको न मारो, मैं यह मांगता हूँ मुझे देदीजिये। यह सुन तकौने क्रोधमें आ आपने ताजको जमीपर दे मारा। कबीर दासजी कहते हैं कि, जब हमने शाहको व्याकुल देखा तो कह दिया कि, ए सुलतान ! अब पीरका कहा करें हमें इसमें कुछ भी त्रास नहीं है मैं इसी तरह कह रहा हूँ यह भी बात नहीं है किन्तु सत्य नाम (श्रीराम नामके बलपर) कहता हूँ क्योंकि, मैं भी उसका ही दास हूँ। यह सुन बादशाहने कह दिया कि, जो चाहे सो कबीरका करलो, आप मार डालों हम कुछ भी बुरा न मानेंगे पर जो साधुको मारता है उसका भला नहीं होता। क्रोधमें आकर शेखतकीने कह दिया कि, कोई है जो कबीरको बांधे। आप शेखतकी उठ खड़े हुए तथा सभी काजी पंडितभी बांध २ कहने लगे। किसीनेभी नहीं कहा कि, देखो विचारो। हाथ पैर बांधकर गंगाजीमें बार दिया, पर, कबीरजीको इसमें कोई संशय नहीं हुआ। आप गंगाजलके ऊपर आसनबांधे दीखे

प्रथम नासूत मुकामका वर्णन

इन्द्रियजित कबीर सत्यनामके बलसे निभंय होकर मंगल गारहे थे । यह तमासा शाह सिकन्दर तथा दूसरे लोग देख रहे थे । सबी धन्य कबीर ! धन्य कबीर ! कहने लगे इससे शेखतकीके दिलमें शोक हुआ । वो हाथ मलने लगा मुंहसे बात नहीं आती थी । सिकन्दर बादशाहने जोरके साथ शेखतकीसे कहा कि, आप बाँधकर डुबाना चाहते हैं यह निभंय पदका दास कबीर हैं दूसरा कोई नहीं हैं । वैसा मुझको मत समझो, मैं जादू क्या जानूँ मुझे तो केवल साहब नामका जादू है । तब शेखजीने कबीर साहबको एक देगमें बंद करके देगका मुँह भली भाँति बंद कर अग्निपर धर दिया और स्वयम् खड़ा हो देगके नीचे अग्नि जलाने लगा उस समय बादशाहने समाचार भेजा कि, पीरजी ! आप किसको आँच दिलाते हैं कबीर साहब तो मेरे पास बैठे हैं । तब शेखने देगका मुँह खोला तो उसको खाली पाया । तब शेखने कहा कि, अब आगसे बचो तब मैं आपपर विश्वास करूँगा । तब कबीर साहबने कहा कि, जो आपकी इच्छा हो-सो करो अब आगमें जला दो । तब शेखजीने बहुतसा काष्ठ भँगाया पीछे कबीर साहबका हाथ पाँव बाँधवा कर आगमें डालदिया उसी समय वह अग्नि बुझकर बिलकुल ठंडी होगई । शेखजी बहुत बल करते रहे पर वह नहीं जले; कबीरसागर नं० ९ के बोध सागरमें लिखा है कि, फिर शेखजी तलवार लेकर अपने हाथसे काटने लगे कबीर साहबके शरीरसे अस्ति इस प्रकार बाहर निकल जाती थी जैसे कि, वायुअथवा खलाके मध्यसे कृपाण निकलपर पार हो जाती है । इस प्रकार कबीरसाहबके शरीरसे पार होकर निकलती और शरीरपर तनिक चिह्न भी नहीं होता था न कोई रोमही मैला हुवा । किन्तु शेखजी मारते २ थक गए । फिर शेखजी आपको कुएँमें डाल दिया उसको इंट तथा पत्थरोंसे भरही रहे थे कि, कबीर साहब शाह सिकन्दरके समीप जा बैठे । तब शाह सिकन्दरने अपने पीरके पास समाचार भेजा कि, पीरजी ! आप किसको कुएँ में बंद कर रहे हो कबीर साहब तो मेरे निकट बैठे हुए हैं । फिर शेखने कबीर साहबको तोपपर बाँधकर उडवायापर तोपमें जल भर गया । फिर हाथीसे कचरवाया किन्तु वह हाथी चीख मारकर भाग गया ये सब लीलाएँ देखकर शाह सिकन्दरने कबीर साहबका बड़ा मान सम्मान किया । आपको अपने साथ लेकर इलाहाबाद गया, गङ्गातटपर बादशाह कबीर साहब और शेख बैठे थे, तब शेखने कहा कि, ऐ कबीर साहब ! गङ्गामें जो मुरदा बहा जाता है उसको आप जीवित करो । तब कबीर साहबने कहा कि, ए मुरदे ! परमेश्वरके प्रभावसे उठ उसी समय वह उठ खड़ा हुआ । कबीर साहबने उस मुरदाको जीवित किया । मुरदेके रूपमें छोटा लड़का था । जब वह जीवित हुआ तब उसका नाम कमाल

दूसरे मलकूत मुकामका वर्णन

रखा। वही कबीरका पुत्र कमाल कहलाता है। [देखो ग्रन्थ निर्भयज्ञानमें] इसप्रकार शेखने कबीर साहबकी बावन लीलाएँ देखीं। तब बादशाह और शेखजी दोनों कर जोड़कर खड़े हुए और निवेदन करने लगे कि, ऐ कबीर साहब ! आप परमेश्वर हो। आपही खुदा हो आपही हमारे गुरु तथा पीर हो। हमारा अपराध क्षमा करो। हमको शाप मत दीजिये। तब कबीर साहबने कहा कि, ऐ प्यारे बादशाह ! आपका तो कुछभी दोष नहीं है परन्तु आपके गुरुनेही हमारे साथ यह सब कुछ किया है, मैं उसेभी कभी शाप नहीं दूंगा क्योंकि जैसा कोई करता है, वह अपनेही निमित्त करता है।

कबीर साहबकी शाह सिकन्दरने नञ्जतापूर्वक बन्दनाकी।

देखो ग्रन्थ बोधसागर गरीबदासका वचन।

साखी - कंध कुल्हाड अघाल, मतक दुनियाँ भार।

गरीबदास शाह यों कहे, बखशो अबकी बार ॥

तहैं सतगुरु लौलीन हो, परचा अबकी बार ॥

गरीबदास शाह यों कहे, अल्ला देव दीदार ॥

सुनो काशीके पण्डितो, काजी मुल्ला पीर।

गरीबदास उस चरण गहि, अल्ला अलख कबीर ॥

यह कबीर अल्लाह है, उत्तरा काशी धाम।

गरीबदास शाह यों कहे, झगड़ भूए बेकाम ॥

क्यों बिगड़ी डगरी दुनियां, कहता कबीर समूल।

गरीबदास उस वृक्षके, अनन्त कोटि रंगफूल ॥

हम्द साखी।

ऐ कबीर तुम अल्ला हो, पलक बीच परवाह।

गरीबदास कर जोरके, ऐसे कहता शाह ॥

तुम दयालु दरवेश हो, धर आए नररूप।

गरीबदास शाह यों कहे, बादशाह जहान भूप ॥

उठे कबीर करम किया, बरसे फूल अकाश।

गरीबदास सेली चलै, चँवर करै रँदास ॥

तीन एक चण्डोलमें, रँदास शाह कबीर।

गरीबदास चौरा करै, बादशाह बलवीर ॥

मुकुट मनोहर शीशधर, चढ़े फील कबीर।

गरीबदास उस परीमें, कोई न धरता धीर ॥

तीसरे जिबरूत मुकामका वर्णन चौथे, पांचवें और छठे मुकामोंका वर्णन

श्री कबीर साहबजीके भण्डारेकी कथा ।

कबीरकसोटी जब ब्राह्मणोंने देखा कि, अब तो कबीर साहबका विशेष गौरव हुवा, हम लोगोकी कोई युक्ति नहीं चली, तब सबने परामर्श करके यह निश्चय किया कि, अब ऐसी युक्ति करनी चाहिए जिसमें कि, कबीरसाहबकी प्रतिष्ठा भङ्ग हो जावे । तब उन लोगोंने चार ब्राह्मणोंको नियत किया कि, तुम लोग देश देशान्तरोंमें जाकर समाचार दो कि अमुक दिवस कबीर साहबका भण्डारा है । सब संत महंत कृपा करके आवें । तब उन चारों ब्राह्मणोंने डाढी मूँछ मुँडवाकर वैष्णव वेष बनाया । उन चारोंने दो दो चले किये । यह सब बारह हुए, ये बारहों ब्राह्मण सब स्थानोंमें दौड़ गए और समस्त संत महन्तोंसे कहा कि, अमुक दिवस कबीर साहबका भण्डारा है ।

यह बात सुनकर समस्त संत महंत उस दिन कबीर साहबकी कुटीपर आए । बडी भीड़ हुई । कबीर साहबने अपना इकतारा लेकर बनका मार्ग लिया शब्द गाते हुए सत्यलोककी ओर दृष्टि की । तब सत्यलोकके हंस, मनुष्यस्वरूप धारण करके उत्तर पड़े लाखों बोरे नाना प्रकारके स्वादिष्ठ पकवानोंके लेकर आ पहुँचे । केशव बनजारा मेवे तथा अन्यान्य वस्तुएँ लेकर आ पहुँचा । नौ लाख बोरे खानेकी वस्तुओंके भरकर केशव बनजारा आया था, भण्डारा आरंभ हो गया । सब साधुओंकी सेवा तथा पहुनई आरंभ हो गई । किसीको इस बातकी सुध नहीं कि, ये कौन लोग हैं तथा कहाँसे आए हैं, जो भण्डारा कर रहे हैं । पन्द्रह दिवसपर्यन्त बराबर भण्डारा होता रहा इसके पीछे समस्त संत महंतोंको भेटे तथा वस्त्रादिक देकर विदा किया । सब धन्य कबीर धन्य कबीर एवं जय कबीर कहते हुए विदा हुए सब द्वेषी ब्राह्मण मूँह पसारकर रह गए कुछ न बन पड़ा । देवी भागवत छठएँ स्कंधके ग्यारहवें अध्यायके ४२-४५ में लिखा है कि, जो त्रेता और द्वापरमें राक्षस थे वेही अब कलियुगमें ऐसे ब्राह्मण हैं जो पाखण्डमें लगे हुए हैं प्रायः सज्जन मनुष्योंको ठगते हैं झूठे तथा वेदके धर्मसे हीन हैं, कपटी, चूस्त चालाक-धमंडी वेदविहीन, शूद्रोंकी सेवा करनेवाले हैं तथा कोई कोई अनेक अपधर्मोंको प्रवर्त करते हैं । वेदनिन्दक, क्रूर, धर्मशत्रु और गप्पी हैं ॥ कबीर साहबने भी अनेक बार कहा है कि, कलियुगके वे ब्राह्मण राक्षस हैं इस कारण वे साधुओंसे वैर करते हैं ।

लक्ष्मीजीका कबीर साहबको लुभानेकी इच्छासे आना और विफलमनोरथ होकर लौट जाना ।

विष्णुने लक्ष्मीजीसे कहा कि, तीनों लोकमें तो ऐसा कोई नहीं है जो तुम्हारे

नयनबाणरूपी, लोभद्वारा आहत न हुआ हो। तुम्हारी मोहिनी मूर्ति और तुम्हारी कटाक्षद्वारा अपनेको न भूल गया हो। पर जब तुम कबीर साहबपर अपना जादू डालोगी तब मैं तुम्हारे मनमोहनमंत्रकी प्रशंसा करूंगा। इस कारण तुम काशीजी जावो। कबीर साहबके हृदयको हस्तगत करलो। लक्ष्मीजी काशीमें कबीर साहबके पास अत्यंत हावभावके साथ आ सामने खड़ी होकर कहने लगीं कि, ऐ महाराज ! आप मुझको अपने घरमें रखो। मैं आपके पास निवास किया चाहती हूँ। तब कबीर साहबने उसकी ओर दृष्टिपात भी नहीं किया और कहा कि, ए लक्ष्मी ! तू मेरे समीप क्यों आई है ? क्या स्वर्गलोक उजाड़ पड़ा है जो तू मेरे पास यहाँ आई है—मुझे तेरी कामना नहीं है तू यहाँसे शीघ्र चलीजा तब लक्ष्मीने अत्यंत नम्रता की कि, महाराज ! मुझको चार दिन तो अपने घरमें रहने दो। तब कबीर साहबने कहा कि, तू यहाँसे चली जा। धन अनेकों अनर्थोंकी जड़ हो जाता है मैं तो निर्धनही अच्छा हूँ। लक्ष्मी निराश होकर वैकुण्ठको पलट गई इसके पीछे देवराज आये और कहने लगे कि, कबीरसाहब आप जो कुछ राजकाज धन सम्पत्ति मांगें वो सब मैं दूँ। कबीर साहबने कहा कि, इन सब वस्तुओंकी तो मुझको कामना नहीं है, यदि तुम्हारे पास वह नाम हो कि, जिससे आवागमन मिट जावे तो वह मुझको अवश्य दीजिये। उसने कहा कि, यह तो अभी मेरे अधिकारसे बाहर है, पीछे धन्य कबीर धन्य कबीर ऐसा कहते हुए निजलोकको चले गए। ये सब कौतुक जब सिकन्दरशाह देख चुका तब उसने कबीरसाहबको उत्तम वस्त्र पहनाए। जड़ाऊ मुकुट शीशपर रक्खा। आपको हाथीके ऊपर सवार करा पीछे आप खड़ा हुवा चंबर करता तथा सत्यगुरुकी प्रशंसा करता हुवा अपने साथ ले चला। यह लीला देखकर समस्त काशीके लोग चकित हो रहे। ब्राह्मण और मुल्ला काजी इत्यादि सबके मस्तककी वायु पृथक् हो गई। शाह सिकन्दर कबीर साहबको दिल्लीको ले गया। उस समय शंखतकीके मनमें अत्यंत खेद हुआ। कबीर साहबकी आश्चर्यमय लीलाएँ तो अगणित हैं जिनका विवरण देवता तथा मनुष्य कोई नहीं कर सकता मैं भी उन सबको यही छोड़ता हूँ। केवल आवश्यककी बातें लिखता हूँ। जब कबीर साहबने अपना धर्म पृथ्वीपर प्रचलित किया, सत्य पुरुषकी भक्ति प्रगट की और सत्य-

दश सोहंगका हाल।

कबीर साहबने ग्रन्थ मुहम्मदबुद्धिमें जिन दश स्थानोंका विवरण किया है वह यही दश सोहंग हैं। १—सत्यपुरुष सोहंग। २—सहज सोहंग। ३—अंकुर सोहंग। ४—इच्छा सोहंग। ५—सोहंग सोहंग। ६—अचिन्त्य सोहंग। ७—अक्षर

सातवें साहूत, मूकाम, आठवें राहूत स्थानका वर्णन, नवमें आहूत, स्थानक' वर्णन, दशवें जाहूत स्थानका वर्णन, सत्यलोकका वर्णन

सोहंग । ८-निरञ्जन और माया सोहंग । ९-ब्रह्मा विष्णु और शिव सोहंग । १०-समस्तजीवसोहंग । यह दश सोहङ्ग हैं और समस्त संसार सोहङ्ग है । जिसका गुरु जहाँकी सूचना देगा वह उसी स्थानको पहुँचेगा । यह समस्त जीवोंमें विष्ट हो रहा है समस्त शरीरसे यही शब्द निकल रहा है । और समस्तका निचोड़ तथा सिद्धांत यह है कि, इसके ध्यानसे ज्ञान है और उसहीसे शान्ति है । कबीर साहबने जो दस स्थान प्रगट किये हैं उन दशके निमित्त इस प्रकारकी विद्याएँ कही हैं । देखो ग्रंथ मुहम्मदबुद्धिमें उनके नाम यह हैं-१ शरीअत (व्याय) । २-तरीकत (प्रथा) । ३-हकीकत । ४-मारफत । ५-मरौवहत । ६-ध्यान दोरहियत । ७-जुलकार चन्द्रगी । ८-हुकम मुरतिद । ९-दएनाका । १०-शब्द सार । ये दश प्रकारकी विद्याएँ हैं । जिस किसीको जहाँका ज्ञान देता है, वह उसी स्थानको पहुँचता है । बिना विद्याके कोई पहुँच नहीं सकता जिसके गुरुकी जहाँलों पहुँच है वह अपने शिष्यको वहाँलों पहुँचा सकता है । पुस्तकों द्वारा केवल चार प्रकारकी विद्याओंको मनुष्य प्राप्त कर सकते हैं । कर्म जो है उसकी पहुँच नासूत स्थानपर्यन्त है । उपासना मलकूतपर्यन्त पहुँचाती है । योग जिवरूत स्थानमें स्थित कराता है । जहाँ सहस्र पेंखुडियोंका कमल है, वहाँ अलख निरञ्जन ज्योतिस्वरूप रहता है । निर्विकल्प समाधि लगाकर योगी लोग उसी स्थानपर जा पहुँचते हैं - आगे नहीं । जिसको मार्फतकी श्रेणी प्राप्त हो-उरफानकी विद्याका प्रकाश धारण किए हो वह लाहूत स्थानको जाता है । लोक और वेद द्वारा मनुष्यों के निमित्त ये चार स्थान ठहराए गए हैं । अचिन्त्य द्वीपपर्यन्तको कभी २ कोई २ साधुओंमें से इङ्कित करनेवाले हैं-मनुष्यको इससे पारका समाचार तनिक भी ज्ञात नहीं है । सब व्यर्थही हवाई बांध मुक्तिमार्ग बतलाते फिरते हैं-समस्त धर्मके मनुष्य प्रण रोपते हैं कि, हमारे धर्ममें मुक्ति है, पर कोई कहीं नहीं पा सकता । जिवरूत स्थानमें तीनोंका रचनेवाला रहता है-सब उसीकी वंदना करते हैं-उसीके द्वारा चार प्रकारकी मुक्ति और समस्त स्वर्गोंका सुख प्राप्त करते हैं-इन समस्त स्थानोंमें शारीरिक आनन्द तथा पाशविक कामनाके अतिरिक्त और लोकका समाचार दिया-तब किसीको निश्चय नहीं हुआ । मुग्ध वेद तथा पुस्तकों की लिखावटोंको सत्यमाना, चार प्रकारकी ही मुक्तिको मोक्षमार्ग न जाना, पर कबीर साहब इन चार प्रकारोंकी मुक्तियोंको बन्धन इच्छा हो तो कालपुरुषका महाजाल बतलाते थे, लोगोंका वह पथ छोड़ना तथा इस पथको ग्रहण करना बड़ा दुष्कर हुआ । इस कारण सब आपके वँरी हो, ऐसा वँसा व्यवहार करने लगे । इसी कारण मैं उन स्थानोंको परिलक्षित किया चाहता हूँ जिनसे संसार

मुहम्मद साहिबको सत्य पुरुषका दर्शन होना, पांचकलमांका वर्णन पांचवें कलमेका वृत्तान्त

नितान्तही अनभिज्ञ तथा अज्ञ है, केवल चार मुक्तियोंको सत्य मानते हैं जो वस्तुतः वास्तविक हैं। निम्नलिखित विवरणको देखो —

सत्य लोक।

<!-- image: A hand-drawn circle, possibly representing a celestial body or a conceptual element. -->

यह सत्यलोक सत्यपुरुष का स्थान है और : जाह्नव आहूतसे असंख्य लाख योजना ऊपर
इसको अमरधाम कहते हैं और यहाँहीसे कवीर : है—और दश असंख्य लाख योजना खल अर्थात्
साहव सत्य पुरुषका समाचार लेकर पृथ्वी पर : सून्य है।
आया करते हैं और इसी जगदीश्वरकी आज्ञा :
समस्त संसारपर चलती है और सब इसहीके : आहूत राहूतसे दो असंख्य योजना ऊपर है।
अधीन हैं। : राहूत साहूतसे चार असंख्य योजना शून्यके ऊपर है।

सहजद्दीप सहजपुरुषका स्थान है। : साहूत बाहूतसे पाँच असंख्य शून्यके ऊपर है।
अंकुरद्दीप अंकुरपुरुषका स्थान है। : बाहूत हाहूतसे तीन असंख्य योजना ऊपर है।
दृच्छाद्दीप दृच्छापुरुषका स्थान है। : यह हाहूत स्थान लाहूतसे एक असंख्य योजना ऊ०
सोहजद्दीप साहप पुरुषका स्थान है। : यह लाहूतमलकूतसे ग्यारह पालंग योजना ऊपर है
अचिन्त्यद्दीप अचिन्त्यपुरुषका स्थान है। : यह जवरुत स्थान मलकूत से अठारह करोड
अरण्यद्दीप अक्षरस्थान सायुज्य मुक्ति। : योजना ऊ०
आंझरीद्दीप सारुप्यमुक्ति निरञ्जन स्थान यह :
बैकुंठ विष्णुका स्थान सामीप्यमुक्ति। :
दसु अंशका स्थान सालोक्यमुक्ति। :
पृथ्वी और नासूत स्थानके मध्य यह। :
देवताओं की पुरियों और सिद्धोंके स्थान है।

<!-- image: A small decorative square symbol. -->

पृथ्वी • भलाई बुराई का स्थान।

यह सात नरक हैं।

{ : इन सात नरकों में चौरासी कुण्ड हैं
: और पापियोंके दंड पानेका स्थल है।

कुछ भी नहीं है। त्रियातीतकी श्रेणी जिसको वेद सबसे बढ़कर बतलाता है, इस श्रेणीमें अलख निरञ्जन अधिकृत है—जितने साधुगण उस श्रेणीको हस्तगत कर लेते हैं—वे सब उसके समान होजाते हैं—सब सृष्टिकी रचना करनेका सामर्थ्य रखते हैं—वे सबके देय उसी विद्यासे प्रकाशित है—समस्त सिद्धियाँ उनके वशमें

नवीबेर प्रकट होकर इबराहीम अद्दम सुलतानको शिक्षा देने और शिष्य करनेका वृत्तान्त

हैं—और वे सब अपनी रचनाके रचयिता और स्वामी हैं—वे लोग जगत्प्रभु कहलाते हैं । सांसारिक मनुष्योंमें वह बल और बुद्धि कहाँ है कि, साधुओंके भेदको पहचान सकें । ये बातें केवल सत्यगुरुद्वारा प्राप्त होती हैं जिनके ऊपर पारख गुरुकी दया हो वह इस विषयको जान सकता है—किसी मनुष्यमें इतना पौरुष नहीं । सात स्वर्ग, सात द्वीप, पृथ्वी और नरक—ये ब्रह्माण्डके इक्कीस भाग निरञ्जनके अधीन हैं—सबके ऊपर वह आज्ञा चलाता है । सात द्वीप जो पृथ्वीके हैं उनमें भौंति-भौंति के सुख दुःख हैं—जो सात स्वर्ग हैं उनमें बहुत सुख है—पर वहाँ यह दुःख है कि, एक दूसरे की ईर्षासे जलते रहते हैं स्वर्गके लोगोंकी किसी सीमा-पर्यन्त ज्ञान होता है कि, अब हम स्वर्गसे गिर पड़ेंगे—हमारा सब सुख चला जायगा आपत्तियों तथा दुर्दशाओंमें फँस जायगे इस दुःखसे वे अत्यंत कातरतासे विलाप करते हुए दुःख करते हैं अन्तमें उनका स्वर्गीय शरीर इसी दुःखसे टूट जाता है पीछे वे पृथ्वीपर आकर जन्म लेते हैं जैसे उनके ध्यान होते हैं वे वैसाही चोला पाते हैं । जितने स्वर्ग हैं एवं क्रमानुसार जिस प्रकार एक दूसरेके ऊपर हैं वैसेही उनका सुखभी विशेष होता जाता है । यानी जैसे २ ऊपर हैं वैसेही वैसे सुख तथा आनन्दका आयोजन विशेष होता है—नीचेके विभागोंमें न्यून है । वह सब सुख अस्थायी तथा अल्पकालिक हैं । कुछ समयके उपरान्त स्वप्नके समान भङ्ग हो जानेवाले हैं । सो उन सब स्वर्गों और चारों स्थान जिनको वेदने मुक्तिदाता कहा है—यहाँलों मनुष्योंको ज्ञान होता है—इसके आगे कोई कुछ नहीं जानता । परन्तु कबीर साहबने कहा है कि, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव ये जो तीनों देवता हैं—वे सहज द्वीप पर्यन्त पहुँच सकते हैं—इसके आगे किसीको तनिक भी सुध नहीं है । तीन देवता सहजद्वीपपर्यन्तकी सुध रखते हैं—परन्तु मनुष्योंको वे नहीं बतलाते—अपना भेद अपने मनमेंही रखते हैं—और भलाई बुराईके समस्त कार्योंका रचयिता निरञ्जन है भलाई करो तो स्वर्ग और वैकुण्ठमें जाय यदि बुराई करे तो नरकमें प्रविष्ट हो—चाहे मृत्युलोकमें जन्म लेता रहै । जैसे आकाशके सुखका विवरण है वैसेही नरकयंत्रणा अत्यंत भयानक है सुतरां मुसलमानी पुस्तकोंमें मैंने पढ़ा था कि, जिस समय हजरत दाऊद नरकमंत्रणाका विवरण किया करते थे—उस समय सुननेवाले बेतरह रोते तड़पते थे । कितनेही भयके मारे मर जाते थे ।

एक बेर नरकयंत्रणाको सुनकर सत्तर मनुष्य भयसे मरगये । स्वयम् दाऊद ऐसा रोता और तड़पता था अचेत हो जाता था । ऐसा हाथ पावें और शिर पीटता था कि, अन्तमें उसे उसकी लौडियाँ और लोग पकड़ लेते थे वह ऐसा विह्वल तथा बेसुध हो जाता था । दाऊद यद्यपि बादशाह था तथापि सारी रात ऐसा रुदन