कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 303, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंशिष्य होनेके दूसरे दिन कबीरसाहब सबेरहीसे स्नान तिलक ध्यानमें लगे । गलेमें एक माला और जनेऊ डाल और द्वादश तिलक करके साक्षात रामानन्दियोंके समान बेष बना लिया, । वैष्णवोंकासा वेष बनाते देखकर नीमाने कहा “बेटा ! यह क्या करते हो ? किसने तुम्हारी बुद्धि ऐसी फेर दी, कि, अपने धर्म कर्मको छोड़के दूसरे धर्मवालोंकी राहपर चलते हो !” उस समय कबीरसाहबने नीमा और नीरुसे अत्यन्त नम्र भावके साथ निवेदन किया, कि, ए मात ! यह एक भ्रमही है कि, यह दीनमें तथा यह वेदीन है धर्म हमारा है यह दूसरेका है ।
सत्य पुरुष सबके लिये एक है उसका कियेसे भेद भाव नहीं है बोही सबका रचनेवाला है सिवा उसके और कोई कर्ता धर्ता और विधाता नहीं राम रहीम सब उसीके नाम हैं पीर फकीर और साधु सब अपने २ ढंगसे उसीका नाम लेते हैं ।
इस प्रकारके अनेकों उपदेशोंके बाद माता पिता दोनों शान्त हो गये आप सदाकी तरह दोवटी बुनकर बाजार में बेच दिया करते धर्म पूर्वक जो उसे मिलता उसीसे साधुसेवा कर दिया करते यदि अधिककी आवश्यकता होती हो स्वयं भगवान् पूरी करते ।
जब कोई सन्त महात्मा आपके घर आवे तो उनके भोजन बनानेके लिये चौका लगवाते । कोरे वरतन मंगवाकर विशुद्ध भोजनका सामान तयार करके देते अपनेसे जो भी कुछ हो सकती उतनी उसकी सेवा चाकरी करते । यहाँतक कि, इस कामसे उनकी परमस्नेह रखनेवाली माता भी इस कृत्यके करते करते अकुता जाती थी पर कबीर साहिबके प्रेम तथा उनकी आकर्षण शक्तिके आगे सब नतमस्तक ही रहते थे । माताका भी साहस नहीं होता था कि, वो कबीरके कथनको न माने माता का अकुलाना इसी इस शब्दमें आया है ।
शब्द — हमारे कुलकोने राम कह्यो ॥
सुनो घोरनियौ सुनो जिठनियौ, अचरज एक भयो ।
सात सूत या मुंडिया खोये मुंडियौ क्यों न मेरा ।
माय तुरकिनी बाप जुलाहा बेटा भक्त भये ॥
जबकी माला लई इन पूते तबते सुख न भये ।
नित उठ कोरी गागर मांगत लीपत जन्म गये ॥
पकज शत मुंडिया और सुवे कबीरा कहांते भये ।
रोय रोय कहत कबीरकी माता बेटा मरन गये ॥