भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 304

हँसि हँसि कहत कबीरकी भँना भैया अमर भये ।

कहँहि धर्मदास सुनो भाई साधो कबीरा साहिब भये ॥

भाव—हमारे वंशमें 'राम' किसने कहा है ए देवरानी ज़िठानियों ! सुनो, एक बड़े अचरजकी बात है वा मुड़ियाने सातसूत खोये हैं फिर भी यह मेरा नहीं है मा तुरकिकी बापु जुलाहो किन्तु बेटा भक्त बन रहे हैं । जबसे इसने कंठी माला हाथमें लीं हैं उस दिनसे, मुझे कुछ भी सुख नहीं हुआ । सौ कमलकी कलियाँ कबीरको जन्मावें यह कबीर हुआ कहाँसे हैं कबीरकी माँ रो २ कर कहती है कि, ऐसा कबीर मरा भी नहीं यह सुन कबीरकी बहिन कहती है कि कबीर तो सत्य पुरुषका पथप्रदर्शक है । धर्मदासजी कहते हैं कि, ए साधुओ ! सुनो ! कबीरजी साहिब हुए हैं । एक दिन किसीने आपसे कह दिया कि, आपका घर बड़ी बुरी जगहमें है । इस पर आपने उत्तर दिया कि—

कबीरा तेरा झोंपड़ा गलकटियोंके पास ।

जेकरेंगे सो भरेंगे तुम क्यों हुए उदास ।

भाव—ए कबीर ! तेरा झोपड़ा कसाइयोंके पास है पर जो करेंगे वो भोगेंगे तुम क्यों उदास होते हो ? आपका निजी परिवार कमाल कमाली और लोईका था ये तीनों आपको स्वामीजी कहते थे । पं. हरदेवके साथ कमालीका गान्धर्व विवाह कर दिया था । अन्ततक नीमा नीरूको इनका बोध नहीं हुआ था जहाँतक कि, माताने मसाल हाथमें लेकर इनके विरुद्ध सिकायत की थी । अन्तमें इन्होंने गुरुचरणोंको ही अपना शरण बनाया तथा गुरुका सन्निधिमें अधिक समय लगाने लगे ।

कबीर दासजीके बड़े भंडारेके बाद नीमा और नीरू तो कालवश हो गये आप घरका त्याग करके सत्यपुरुषके सन्देश सुनाने आदिमें समय बिताने लगे । जब भगवान् रामानन्दजी भगवान्की मानसिक पूजा करते थे उस समय सब शिष्य लोग अपने २ नित्य नियमोंमें लग जाया करते थे यदि देर हो जाती थी तो प्रतीक्षा करते हुए वहाँ बैठे रहते थे पीछे नित्य नियमसे उठनेपर सब दर्शस्पर्श करके अपनी २ कुटियोंमें चले जाते थे ।

इसी प्रकार एकदिन रामानन्दजी स्वामी मानसिक ध्यानमें मग्न थे । उस समय ठाकुरकी माला छोटी हो गयी । तब स्वामीजीको बड़ी चिंता हुई कि, अब ठाकुरके गलेमें इसे कैसे पहनाऊँ । तब कबीर साहब स्वामीजीके मनकी बात जानकर बोले कि, स्वामीजी मालाकी गॉठ खोलकर ठाकुरको माला पहनाओ । स्वामी रामानन्दजीने ऐसाही किया । इस प्रकारके अनेक कौतुकोंको