कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 308, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंयह बात सुनकर काजी तथा पण्डितगण अतिप्रसन्न हो प्रशंसा करने लगे कि, आप क्यों न ऐसे हों बाहवा ! आपसे सब कुछ होगा अब आप कृपा करें कि, यह जोलाहा किसी प्रकार मारा जावे ।
शेखतकीका कबीरजीको मरानेका प्रयत्न ।
यह बात सुनकर शेखजी बादशाहके पास जाकर कहा कि, ऐ सुलतान ! तू मेरा कहना मान ले । इस जोलाहेके प्राणघातकी आज्ञा देवे । इसने बड़ा कुफ्र मचाया है । यदि तू इसको मरवा न डालेगा तो मैं तुझको शाप बूंगा जिससे तेरी सम्पत्ति तथा तेरे प्राणका विनाश हो जावेगा ।
शेखतकीके कबीरजीपर जुल्म ।
यह बात सुनकर शेखजीको बादशाहने समझाया कि, ऐ पीरजी ! आपने तो मुझसे कई बार कहा था कि, पीर फकीर स्वयम् परमेश्वर हैं । तब आप क्योंकर कबीर साहबके प्राणघातके निमित्त आग्रह करते हैं । उन्होंने तो आपकी कोई क्षतिही नहीं की है फिर आपने क्यों ऐसा कुफ्र मचाया है ।
कबीर सागर न. ७ पृ. ६७ बोध सागर ।
कहो कबीरके मारन ताई । कुछ न हमारो यहाँ बसाई ॥
पीर फकीर जात अल्लाहा । मेरो जोर न पहुँचे ताहा ॥
साखी ।
जो वह होते रैयत, तो हम करते जोर ।
वह अलमस्त फकीर है, तहाँ न फावै मोर ॥
तुमहूँ कही समझाय, पीर फकीर अल्लाह ।
अब तुम कहते मारने, यह न होय हम पाह ॥
रमैनी ।
अहो पीरजी तुम वह एका । अपने मनमें करो विवेका ॥
इन कुछ तुमरो नाहि बिगारा । काहे तुमने कुफ्र पसारा ॥
बुजुर्ग सब नेकी फरमावे । जोर जुल्म कुछ ताहि न भावे ॥
साखी ।
कहा हमारा कीजिए, छोड़ दीजिए रार ।
सुलह कुल्ह दे बैठिए, अल्ला ओर निहार ॥
कहे तकी सुलतान सुन, तुझे नहीं कुछ दुःख ।
जो मैं कहूँ सो मानिए, कर मेरो सन्तोष ॥