कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 309, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकहे सिकन्दर पीर सुन, मेरो शिर वरु लेहु ।
फक्कड़ कबीर न मारिए, यह माँगे मोहि देहुं ॥
रमैनी ।
सुन्ते ही तकी क्रोध प्रजारा । शिरसे ताज जमींपर मारा ॥
निपट विकल देखो तेही भाई । तब हम शाहसे कहा बुझाई ॥
कहैं कबीर सुनो सुलताना । करो पीरको वचन प्रमाना ॥
साखी ।
पीर कहे सो करो तुम, हमें नहीं कुछ त्रास ।
हमहूं कहें सत नाम बल, कहें कबीर सुदास ॥
रमैनी ।
कहै सिकन्दर सुनोजी पीरा । मन मानैं सा करो कबीरा ॥
साखी ।
डारो मार कबीरको, हम नहि मानैं ऊन ।
ताका कबहु न भलाहो, जो करे फक्कड़का खून ॥
रमैनी ।
शेख तकी तब कहे रिसाई । है कोई बाँध कबीरा भाई ।
साखी ।
शेख तकी आपै उठ, काजी पण्डित झार ।
बाँध बाँध सब कोई कहै, कोइ न करे गोहार ॥
बाँह बाँध पग बाँधके, बोर गङ्गजल नीर ।
नहि संशय निश्चिन्त होइ, निभंयदास कबीर ॥
गङ्गजलपर आसन, बंद परे खहराय ।
जिन कबीर सत नामबल, निभंय मङ्गल गाय ॥
शाह सिकंदर देखही, औ ढाढ़े सब लोग ।
धन्य कबीर सब कोई कहै, शेख तकी भा सोग ॥
रमैनी ।
शेखतकी तब मीजें हाथा । सूखे मुँह नहि आवै बाता ॥
साखी ।
शाह सिकन्दर जोर कर, कहै सुनो तुम पीर ।
किसको बाँध डुबाव है, निभंयदास कबीर ॥