भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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लोग पूछते कि, कबीरजी ! आपका गुरु कौन है ? उस समय तो आपका कोई गुरु नहीं था, इस प्रश्नपर आप निरुत्तर और निस्तब्ध हो कुछ न बोलते । तब साधु लोग कहते कि बिना गुरुके तुम्हारा ज्ञान किसी कामका नहीं, बिना गुरुके किसीको मुक्ति नहीं मिलेगी, तुम्हारा यह सब ज्ञान और कथनी व्यर्थ है ! जब साधु लोग कबीर साहबपर इस प्रकार कटाक्ष करने लगे तब आपने रामानन्द स्वामीको गुरु करनेका संकल्प किया, उस समय आपका वय पाँच वर्ष मात्रका था ।

गुरु करनेका वृत्तान्त । (बृ. कसौटी)

सो वृत्तान्त अब करें बखाना । जिमि कबीर काशी कथ ज्ञाना ॥

पांच वरषके जब भये, काशीमांझ कबीर ।

गरीबदास अजब कला, ज्ञान ध्यान गुणसीर ॥

जबसे काजी कबीर साहबके बचनोंसे लज्जित होकर चला आया तबसे वह तो कभी साहबके सामने नहीं जाता । परन्तु उस दिनसे साहबकी ऐसी प्रसिद्धि हुई कि, आपकी ज्ञानपूर्ण बातोंको सुननेके लिये अनेक लोग आपके पास आने लगे ।

षटदर्शन मिलनेको आवैं । आत्मज्ञान सबकौ समझावैं ॥

सत्य पंथका कीन परचारा । हिंसा कर्म नीच निरधारा ॥

कबीरोपदेश ।

तीरथ बरत अरु मूरत पूजा । जीव हनैं ईश्वर कथ दूजा ॥

जीव घात करई जो कोई । बासा तासु नरकमें होई ॥

पाहनको पूजैं पाखण्डी । गल काटै जो सन्मुख चंड़ी ॥

बकरा मुरगा जबह जो करहीं । विस्मिल्लाः कहि धर्मकहि उच्चरहीं ॥

ते सब पापकर्म कमाहीं । हिन्दू तुच्छ दौउ नरके जाहीं ॥

इस प्रकारके उपदेशको सुनकर हिन्दू मुसलमान दोनोंही द्वेष मानने लगे । किन्तु कबीर साहबको कुछ भय नहीं था । बल्कि जब बहुतसे बालक इकट्ठे हो जाते तब आप उनके संग खेलने लग जाते और उनसे कहते सब, 'राम, राम, गोविन्द, गोविन्द' कहो ।

एक दिन एक मुसलमानने कहा, देखो यह कबीर हिन्दू देवोंका नाम लेता है । यह बड़ा भारी काफिर होगा । यह सुनकर कबीर साहबने उससे कहा—
गला काटि बिस्मिल करैं, ते काफिर बे बूझ ।
औरनको काफिर कहैं, अपना कुफ न सूझ ॥