भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 297

भारी करता होगा, मैं किस प्रकार काफ़िर हूँ । उस समय आर्पने यह साखी कहा :—

साखी—गला काटकर बिसमिल करें, ते काफ़िर वेबूझ ।
औरनको काफ़िर कहें, अपनी कुफ़ न सूझ ॥

छयालीसवाँ प्रकरण ।

बाल कबीर वैष्णवके बानेमें ।

एकबार कबीर साहबने गलेमें यज्ञोपवीत डाल लिया और अपने माथेपर तिलक लगा लिया तब ब्राह्मणोंने यह देखकर कहा कि, यह तो तेरा धर्म नहीं है तूने वैष्णव वेष कैसे बनाया ? और तू राम राम गोविंद गोविंद नारायण नारायण कहता है, यह तो मेरा धर्म है तेरा धर्म नहीं । तब कबीर साहब ब्राह्मणोंको उत्तर देते कि, हम तो ताना तनते हैं जानेऊ तुम्हारा किस प्रकार हुआ और गोविन्द और राम तो हमारे हृदयमें बसते हैं, तुम्हारे कैसे हुए । तुम तो गीता पढ़ते हो, परन्तु सांसारिक धनके निमित्त सदैव धनाढ्योंके द्वार द्वार पर दौड़ते और भटकते रहते हो और हम तो गोविन्दके अतिरिक्त और किसी अन्यको जानते ही नहीं । इतना सुनकर ब्राह्मण निरुत्तर होते । वहाँ आप यह शब्द कहते—

शब्द—मेरी जिह्वा विस्नू लैना नारायन हिरदे बसे गोविन्दा ।
जम द्वारे जब पूछि परे तब का करे मुकुंदा ॥ टें० ॥
हम घर सूत तनै नित ताना, कंठ जनेउ तुम्हारे ।
तुम नित बांचत गीता गायत्री, गोविन्द हिरदे हमारे ॥
हम गोरु तुम ग्वाल गुसाई, जनम जनम रखवारे ।
कबहिं न बार सो पार चलाये, तुम कैसे खसम हमारे ॥
तुम बाभन हम कासीके जुलहा, बूझो मेरा ग्याना ।
तुम खोजत नित भूपति राजे, हरि संग मेरा ध्याना ॥

सैंतालीसवाँ प्रकरण ।

बालक कबीरकी ज्ञान कथनी और गुरुकी पूछ ।

हिन्दू तथा मुसलमान दोनों आपके साथ वाद विवाद किया करते थे सब परास्त होते थे । जब साधुओंने देखा कि, यह लड़का तो बड़ा ज्ञानी है, तब वे