कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पूर्व देशमें काल पुरुषका जीवोंको फसानेके— —लिये नानामत मतान्तरका प्रचार करना
तब तुम होहु कृस्न अवतारा । लैहो ओयलसों कहों विचारा ॥
नाथहु नाग कलिंद्री जाई । अब तुम जाहु विलम्ब न लाई ॥
ऊँच होइके नीच सतावे । ताकर ओयल मोहि सो पावे ॥
जो जिव देह पीर पुनि काहू । हम पुनि ओयल दिबावै ताहू ॥
पहुँचे हम तब तुव पास । कीन्हेट सत्य वचन परगासा ॥
भेटेउ नाहि मोहि पद ताता । विष ज्वाला साँवल भोगाता ॥
व्याकुल भयो तवै फिर आयो । पितु पद दरसन मैं नहि पायो ॥
अद्याका विष्णुको ज्योतिका दर्शन कराना ।
इतना सुनि हरषित भई माई । लीन्ह विस्नु कहैं गोद उठाई ॥
पुनि अस कहेउ आदि भवानी । अब सुनहु पुत्र प्रिय मम बानी ॥
देख पुत्र तोहि पिता भिटावों । तोरे मन कर धोख मिटावों ॥
प्रथमहि ज्ञान द्रिष्टिसो देखो । मोर वचन निज हिये परेखो ॥
मन सरूप करता कहैं जानों । मनते दूजा और न मानो ॥
सरग पताल दौर मन केरा । मन इस्थिर मन अहै अनेरा ॥
छनमहैं कला अनंत दिखावे । मन कहैं देख कोइ नहि पावे ॥
निराकार मनहीको कहिये । मनकी आस दिवस निसि रहिये ॥
देखहु पलटि सून्यमहैं जोती । जहूँ झिलमिल झालर होती ॥
फेरहु स्वास गगन कहैं धाओ । मार्ग अकासहि ध्यान लगाओ ॥
जैसे माता कहि समुझावा । तैसे विस्नु ध्यान मन लावा ॥
छंद-पैठि गुफा ध्यान कीन्हो स्वास संयम लायके ॥
पवन धूँका दियो जबते गगन गरज्यो आयके ॥
बाजा सुनत तब मगन भा पुनि कीन्ह मन कस ख्याल हो ॥
सून्य स्वेत पीत सज्ज लाल दिखाय रंग जंगल हो ॥ ३० ॥
सोरठा-तेहि पीछे धर्मदास, मन पुनि आपे दिखायऊ ॥
कीन्ह ज्योति परकास, देखि विस्नु हरषित भये ॥ ३० ॥
मातहि नायो सीस, बहु अधीन पुनि विस्नु भा ॥
मैं देखा जगदीस, हे जननी परसाद तुव ॥ ३१ ॥
धर्मदास वचन ।
धरमदास गहि टेके पाया । हे साहिब इक संशय आया ॥
कन्या मनको ध्यान बतावा । सो यह सकल जीव भरमावा ॥
पश्चिमके चार किताबोंका वर्णन तौरीतमें उत्पत्तिका वृत्तान्त आदमकी पैदाइश
सद्गुरु वचन ।
धरमदास यह काल स्वभाऊ । पुरुष भेद विस्नु नहिं पाऊ ॥
कामिनिकी यह देखहु बाजी । अम्रित गोय दियो विष साजी ॥
जोत काल दूजा जनि जानहू । निरखि धर्म सत्यहिं उर आनहू ॥
परगट तोहि कहीं समुझाई । धरमदास परखहु चित लायी ॥
जस परगट तस गुपुत सुभाऊ । जो रह हियासो बाहर आऊ ॥
जब दीपक बारै नर लोई । देखहु जोति सुभाव विलोई ॥
देखत जोति पतंग हुलासा । जानि प्रीति आवै तिहि पास ॥
परसत होवे भसम पतंगा । अन जाने जरि मरहि मतंगा ॥
जोति सरूप काल अस आही । कठिन काल वह छाँडत नाही ॥
कोटि विस्नु औतारहि खाया । ब्रह्मा रुद्रहि खाय नचाया ॥
कौन विपति जीवनकी कहऊँ । परखि वचन जिन सहजहिं रहऊँ ॥
लाख जीव वह नित्यहि खाई । अस विकराल सो काल कसाई ॥
धर्मदास वचन ।
धर्मदास कह सुनहु गुसाई । मोरे चित संसय अस आई ॥
अष्टंगिहि पुरुष उत्पानी । जिहि विधि उपजी सो मैं जानी ॥
पुनि वहि त्रास लीन्ह धर्म राई । पुरुष प्रताप सु बाहर आई ॥
सो अष्टंगी अस छल कीन्हा । गोइसि पुरुष प्रगट जम कीन्हा ॥
पुरुष भेद नहिं सुनत बतावा । काल निरंजन ध्यान करावा ॥
यह कस चरित कीन्ह अष्टंगी । तजी पुरुष भई कालकि संगी ॥
सद्गुरु कबीर वचन ।
धर्म सुनहु जन नारि सुभाऊ । अब तुहि प्रगट वरणि समझाऊ ॥
होय पुत्री जेहि घर माहीं । अनेक जतन परितोषत ताही ॥
वस्त्र भच्छ सुख सेज निवासा । घर बाहर सब तिहिं विस्वासा ॥
यज्ञ कराय देय पितु माता । बिदा कीन्ह हित प्रीतिसों ताता ॥
गयी सुता जब स्वामी गेहा । राती तासु संग गुन नेहा ॥
माता पिता सबै बिसरावा । धरमदास अस नारि स्वभावा ॥
ताते अध्या भई विगानी । काल अंग ह्वै रही भवानी ॥
ताते पुरुष प्रगट ना लायी । काल रूप विस्नुहि दिखलायी ॥
धर्मदासवचन कबीर प्रति ।
हे साहब यह जान्यो भेदा । अब आगेका करहु उछेदा ॥
आदम और हव्वाकी सन्तान
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
पुनि माता कहि विस्नु दुलारा । मरद्यो मान जेठ निज वारा ॥
अहो विस्नु तुम लेहु असीसा । सब देवनमें तुमहीं ईसा ॥
जो इच्छा तुम चितमें धरिहौ । सो सब तोर काज मैं करिहौ ॥
मायाका विष्णुको सर्वप्रधान बनाना ।
प्रथम पुत्र ब्रह्मा दुरि गयऊ । अकरम झूठ ताहि प्रिय भयऊ ॥
देवन सेष्ठ तुमहिं कहैं मानहिं । तुम्हरी पूजा सब कोई ठानहिं ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
किरपा वचन अस मातैं भाखा । सबसे सेष्ठ विस्नु कहैं राखा ॥
माता गयी रुद्रके पास । देख रुद्र अति भये हुलासा ॥
अद्याका महेशको बरदान देना ।
पुनि लहुरा कहैं पूछे माता । तुम सिव कहो हृदयकी बाता ॥
माँगहु जो तुम्हरे चित भावे । सो तोहिं देउँ माता फुरमावे ॥
दोइ पुत्रन कहैं मता दृढावा । माँग महेश जोई मन भावा ॥
महेशवचन ।
जोरि पानि सिव कहबे लीन्हा । देहु जननि जो आज्ञा कीन्हा ॥
कबहिं न विनसे मेरी देही । हे माता माँगों बर एही ॥
हे जननी यह कीजे दाय। कबहुँ न विनशै मेरी काया ॥
अद्यावचन ।
कह अष्टंगी अस नहिं होई । दूसर अमर भयो नहिं कोई ॥
करहु योग तप पवन सनेहा । रहे चार जुग तुम्हरी देहा ॥
जौलौ पृथ्वी अकास सनेही । कबहुँ न विनसे तुम्हरी देही ॥
धर्मदासवचन ।
धर्मदास विनती चित लाई । ज्ञानी मोहि कहो समुझाई ॥
यह तो सकल भेद हम पायी । अब ब्रह्माको कहो उपायी ॥
अद्या साप ताहि कहैं दीन्हा । तेहि पीछे ब्रह्मा कस कीन्हा ॥
कबीरवचन ।
विस्नु महेश जबै वर पाये । भये आनन्द अतिहि हरषाये ॥
दोनों जने हरण मन कीना । ब्रह्मा भयो मान मद हीना ॥
धरमदास मैं सब कुछ जानों । भिन्न २ कर प्रगट बखानों ॥
जलप्रलय और नूहकी किस्तीका वर्णन
शाप पानेके कारण दुःखित हो ब्रह्माका विष्णुके पास जाकर
अपना दुःख कहना और विष्णुका उसे आश्वासन देना ।
ब्रह्मा मनमें भयो उदासा । तब चलि गयो विस्तुके पास ॥
ब्रह्मावचन विष्णु प्रति ।
जाय विस्तुसे विनती ठाना । तुम हो बंधु देव परधाना ॥
तुम पर माता भई दयाला । साप विवश तुम भये बिहाला ॥
निज करनी फल पावउ भाई । किहि बिधि दोष लगाऊँ माई ॥
अब अस जतन करो हो भ्राता । चल परिवार वचन रह माता ॥
विष्णुवचन ।
कहे विस्तु छोडो मन भंगा । मैं करिहँ सेवकाई संगा ॥
तुम जेठे हम लहुरे भाई । चित संसय सब देहु बहाई ॥
जो कोइ होवे भगत हमारा । सो सेवै तुम्हरो परिवारा ॥
छंद—जग माहि ऐसे दिढाइहँ फल पुन्य आसा जोय हो ॥
जज्ञ धर्म अरु करे पूजा द्विज बिना नहि होय हो ॥
जो करे सेवा द्विजनकी तेहि महापुन्य प्रभाव हो ॥
सो जीव मोकह अधिक प्यारे राखिहों निज ठाँव हो ॥ ३१ ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
सोरठा—ब्रह्मा भये आनंद, जबहि विस्तु अस भासेऊ ॥
मेटेउ चितकर दुंद, सखा मोर सब सुखीभौ ॥ ३२ ॥
काल प्रपंच ।
देखहु धर्मान काल पसारा । इन ठग ठग्यो सकल संसारा ॥
आसा दै जीवन बिल मावै । जनम जनम पुनि ताहि सतावै ॥
बलि हरिचंद बेनु बइरोचन । कुंती सुत औरो महिसोचन ॥
ये सब त्यागी दानि नरेसा । न कहूँ लै राखै केहि देसा ॥
जस गंजन इन सबकी कीन्हा । सो जग जाने काल अधीना ॥
जानत है जग होय न सुद्धी । काल अमरबल सबकी हर बुद्धी ॥
मन तरंगम जीव भुलाना । निज घर उलटिन चीन्ह अजाना ॥
धर्मदासवचन ।
धर्मदास कह सुनो गुसाई । तबकी कथा मोहि समझाई ॥
तुम प्रसाद जमको छल चीन्हा । निस्वय तुम्हरे पद चित दीन्हा ॥
इब्राहीम पैगंबरका वर्णन यूसुफ पैगंबरका वृत्तान्त
भव बूडत तुमही गहि राखा । सब्द सुधारस मोसन भाखा ॥
अब वह कथा कहो समुझाई । स्नाप अन्त किय कौन उपाई ॥
कबीर बचन धर्मदास प्रति गायत्री के अद्या को शाप देनेका वृत्तान्त
धर्मनि तुम सन कहों बखानी । भाषा ज्ञान अगमकी बानी ॥
मातु स्नाप गायत्री लीन्हा । उलटि साप पुनि मातहि दीन्हा ॥
हम जो पाँच पुरुषकी जोई । पाँचोकी तुम माता होई ॥
बिना पुरुष तू जनि है वारा । सो तो जनि है सकल सनसारा ॥
दुहुन साप फल पायो भाई । उगरह मयो देह धरि आई ॥
इति सृष्टि उत्पत्ति विषयक प्रमाण-अनुराग सागर ।
अथ आदिमंगल
बोहा—
प्रथमै समरथ आप रहे, दूजा रहा न कोइ ।
दूजा केहि बिधि ऊपजा, पूछत हों गुरु सोइ ॥ १ ॥
तब सतगुरु मुख बोलिया, सुकृत सुनो सुजान ।
आदि अन्तकी पारचै, तोसों कहैं बखान ॥ २ ॥
प्रथम सुरति समरथ कियो, घटमें सहज उचार ।
ताते जामन दीनिया, सात करी बिस्तार ॥ ३ ॥
दूजे घट इच्छा भई, चित मनसा तो कीन्ह ।
सातरूप निरमाइया, अविगत काहु न चीन्ह ॥ ४ ॥
तब समरथके स्त्रवणते, मूल सुरति भै सार ।
सब्द कला ताते भई, पाँच ब्रह्म अनुहार ॥ ५ ॥
पाँचौ पाँचे अंड धरि, एक एकमा कीन्ह ।
दुइ इच्छा तहैं गुप्त है, सो सुकृत चित चीन्ह ॥ ६ ॥
योगमया यकु कारने, ऊजे अक्षर कीन्ह ।
या अविगति समरथ करि, ताहि गुप्त करि दीन ॥ ७ ॥
स्वासा सोहं ऊपजे, कीन्ह अमी बंधान ।
आठ अंश निरमाइया, चीन्हौ संत सुजान ॥ ८ ॥
तेज अंड अचिंत्यका, दीन्हो सकल पसार ।
अंड शिक्षापर बैठकै, अधर दीप निरधार ॥ ९ ॥
फिरऊनका वृत्तान्त मूसाकी उत्पत्तिका वृत्तान्त
ते अचिन्तके प्रेमते, उपजे अक्षर सार ।
चारि अंश निरमाइया, चारि वेद विस्तार ॥ १० ॥
तब अक्षरका दीनिया, नींद मोह अलसान ।
वे समरथ अवि गति करी, मर्म कोई नहि जान ॥ ११ ॥
जब अक्षरके नींदगे, देवी सुरति निरवान ।
स्यामवरन यक अंड है, सो जलमें उतरान ॥ १२ ॥
अच्छर घटमें ऊपजे, व्याकुल संसय सूल ।
किन अंडा निरमाइया, कहा अंडका मूल ॥ १३ ॥
तेहि अंडके मुखपर, लगी सब्दकी छाप ।
अक्षर दृष्टिसे फूटिया, दसद्वारे कठि बाप ॥ १४ ॥
तेहिंते जोति निरञ्जनौ, प्रकटे रूप निधान ।
काल अपरवल बीरभा, तीनिलोक परधान ॥ १५ ॥
ताते तीन देव भे, ब्रह्मा विष्णु महेस ।
चारि खानि तिन सिरजिया, मायाके उपदेश ॥ १६ ॥
चारि वेद षट सास्त्रऊ, औं दशअष्ट पुरान ।
आसा दै जग बाँधिया, तीनों लोक भुलान ॥ १७ ॥
लख चौरासी धारमा, तहाँ जीवदिय बास ।
चौदह यम रखवारिया, चारिवेद विश्वास ॥ १८ ॥
आपु आपु सुख सबरमै, एक अंडके माहिं ।
उत्पत्ति परलय दुःख सुख, फिरि आवहिं फिरि जाहिं ॥ १९ ॥
तेहि पाछे हम आइया, सत्य सब्दके हेत ।
आदि अन्तकी उत्पत्ती, सो तुमसों कहि देत ॥ २० ॥
सात सुरति सबमूल है, प्रलयहु, इनहीं माहिं ।
इनहींमासे ऊपजे, इनहीं माहैं समाहिं ॥ २१ ॥
सोई ख्याल समरथकर, रहे सो अच्छप छपाई ॥
सोई संधिलै आइया, सोवत जगहिं जगाइ ॥ २२ ॥
सात मुरतिके बाहिरे, सोरह संखके पार ॥
तहैं समरथको बैठका, हंसन केर आधार ॥ २३ ॥
घर घर हम सबसों कही, शब्द न सुनें हमार ॥
ते भसागर डूबहीं, लख चौरासी धार ॥ २४ ॥
मंगल उत्पत्ति आदिका, सुनियो संत सुजान ॥
कह कबीर गुरु जाग्रत, समरथका फुरमान ॥ २५ ॥
दूसरी किताब जबूरका वृत्तान्त
प्रमाण श्वास गुञ्जारका ।
देखो प्रकरण दशवाँ, पृष्ठ २७ ।
कबीर बचन—चौपाई ।
कहे कबीर सत्य प्रकाश । श्रोता सुरति धनी धर्मदासा ॥
सत्य सार सुकृत गुन गावों । अविचल बाँह अच्छे पद पावों ॥
संशय रहित सदा सो गाऊँ । शीलरूप सब हितकर नाऊँ ॥
करै कुलाहल हंस उजागर । मोह रहित सब सुखके सागर ॥
तेहि पुर जरा मरन भ्रम नाही । मन विकार इंद्री नहिं ताहीं ॥
सत्यलोक हंसन सुख होई । सो सुख इहाँ न जाने कोई ॥
जाने सो जो उहाँ रहाई । इहूवाँ आय कहै समुझाई ॥
आवत जात बार नहिं लावे । उहाँकी चाल सो इहाँ चलावे ॥
जो समझे सोइ उतरे पारा । बिन समझे जब जमके चारा ॥
समय—अमरलोककी महिमा, सत्य शब्द उपदेश ।
हंस हेतु सों बरनों, छूटे जमकर देस ॥
अमरलोककी अविगति बानी । धरमदास मैं कहूँ बखानी ॥
जो समझे सो उतरे पारा । बिन समझे सब जमके चारा ॥
धर्मदास बचन ।
प्रथम शरन सतगुरु गुन गाऊँ । अच्छरभेद सकल सुधि पाऊँ ॥
सत्यलोक कर भाव अपारा । सो भवसागर करै पसारा ॥
भाषो अग्र अग्रकी बानी । भाषो द्वीप जहां लगि खानी ॥
भाषो पुरुष पुरुषकी काया । भाषो अमी अमान अमाया ॥
भाषो पुरुष लोककी बानी । भाषो सबै सहज सहिदानी ॥
जो काया प्रभु आप सँवारा । सो समुझाइ कहौ व्यवहारा ॥
अमर तार अखंडित बानी । स्वासा पार सार सहिदानी ॥
जब का प्रभु कीन बन्धाना । कहौ विचारि तासु सहिदाना ॥
जोतिक स्वासा पुरुषकी देहा । तार तार कर कहो सनेहा ॥
कबीर बचन ।
अमर तार अखंडित बानी । स्वाँसा सार पार सहिदानी ॥
जेता बचन पुरुष उच्चार । तेता बचन नाम अधिकारा ॥
स्वासा पारम आदि निरबाना । सोरह सुतकी नाल बखाना ॥
समय—पंच अमीकी देह धरि, प्रकटी जोति अपार ।
सुरतिवंत निहतत्त पुर, होत स्वाँस गुंजार ॥
तीसरी किताब इजीलका वृत्तान्त
धर्मदास वचन— चौपाई ।
हाथ जोरिके टेकेउ पाऊ । साहब कहौ तहवौ कर भाऊ ॥
कहौ लोककी बात बिचारी । जहैलौ दीप करी विसतारी ॥
बरनौ दीप गुप्त अनुसार । बरनौ जहैललिग सकल पसारा ॥
बरनौ सोरह सुतकर भाऊ । तिनको फिर कैसे निरमाऊ ॥
पुरुष स्वास जेता अनुसार । ताकर कहो सकल विसतारा ॥
केहि विधि सोरह सुत परगासा । कहो केही कहाँ रहिवासा ॥
कहो बिस्तार सकल अस्थाना । सत्यलोक और जमके थाना ॥
कैसे निरगुन परभुहि कीन्हा । कैसे पांच तत्वको चीन्हा ॥
कैसे आदि अन्त प्रभु कीन्ही । कैसे रची देहकर चीन्ही ॥
कैसे भय निरंजन राया । कैसे तीन लोक निरमाया ॥
कैसे उपजन विनशन कीन्हा । काह जान बाजी जम दीन्हा ॥
कैसे चित्त अचित्त तन दीना । कैसे जीव सीव कर लीना ॥
कैसे इन्द्दी देह बनाई । कैसे जीव परा बसि आई ॥
कैसे जीव अपन पौ दरसे । कैसे जीव पुरुष पग परसे ॥
सयय—काया मध्ये स्वास है, स्वासा मध्ये सार ।
सार शब्द बिचारिके, साहब कहो सुधार ॥
सतगुरु वचन— चौपाई ।
कहै कबीर सुनो धर्म दासा । अहंकार जस कीन तमासा ॥
अहंकार कीन यकं थाती । तासे होय दिवस अरु राती ॥
बाजीगर यह जाल पसारा । धंधे लाय दियो संसारा ॥
काम क्रोध लालच अरु मोषा । जाल पसार सगरो ये धोखा ॥
एती जाल पास संसारा । विरला गुरु मुख उतरे पारा ॥
धरमदास जो पूछेहु आई । आदि अंत सब कहों बुझाई ॥
कहों लोक लोककी बानी । कहों पुरुष सुतकी उत्पानी ॥
कहों संदेश दया करि तोही । भुक्ति जानि जो पूछहु मोही ॥
सुनहुँ संदेश आदि निरबाना । जाके सुनत काल छै माना ॥
सुमिरहु आदि पुरुष दरबारा । सुमिरत आप हंस होय पारा ॥
समय—तीन लोकके भीतरे, रोकि रहो जम द्वार ।
वेद शास्त्र अगुवा कियो, मोह्यो सकल संसार ॥
चौथी किताब कुरानका वृत्तान्त आठ वेदोंका वर्णन, निरञ्जनका पंथ
चौपाई ।
धरमदास चित्त चेतहु जानी । कहों बुझाय अगरकी खानी ॥
पुरुष अजावन रहे विदेहा । तत्त्व बिहीन सुरति सनेहा ॥
चारि करी सिंहासन जोरा । पांचऐँ आप मध्य अंजोरा ॥
चारि करी चारिउ परवाना । स्वाती युक्त भीतर अकुलाना ॥
समय-करी करी महा परिमल, वास सुवासकी खानि ।
तेज करीन परगट भई, चिता आनि समानि ॥
चौपाई ।
पुरुष आंचित चिता जब कीन्हा । उपज्योशब्द सुरतिको चीन्हा ॥
रहे गुप्त परगट भई काया । स्वासा सार शब्द निरमाया ॥
शब्दहिते है पुरुष अस्थूला । शब्दहिते है सबको मूला ॥
शब्दहिते बहु शब्द उचारा । शब्दै शब्द भया उजियारा ॥
शब्दहिं पारस शब्द अधारा । शब्दहिते भौ सकल पसारा ॥
शब्दहिं रूप गुरु कर धारा । सोई शब्द जिवके रखवारा ॥
प्रथम शब्द भया अनुसार । निहतत्त्वी यक कमल सुधारा ॥
नीहतत्त्वीपर आसन कीन्हौ । रचना रची सकल तब लीन्हौ ॥
रच्यौ पुहुप रचना मनि भारी । सहस्र अठासी दीप सुधारी ॥
अच्छै वृक्ष एक रचा बनाई । अग्रवास तहैं रही समाई ॥
समय-पेड पात रस फूलमें, प्रगटी वास अनूप ।
पारस गिहतत्त्वहि पुरुष, सुरति हंसको रूप ॥
पेड पात फल फूलमें, प्रगटी वास अनूप ।
प्रसन्न होत निहतत्त्व पुरुष, सुरति हंसको रूप ॥
चौपाई
जब पारस सुरति भये स्थाना । अगर प्रताप निमिष उरआना ॥
पुहुप प्रसन्न होत उजियारा । स्वासा पारस बचन सुधारा ॥
पुरुष प्रसन्न नाम उच्चार । श्वासापर सब रचनि सुधारा ॥
स्वासा पार शब्द गुँजारा । पांच अमीको भयो बिस्तारा ॥
पांच अमीको जो विसतारा । ताहि अमी सब लोक सुधारा ॥
स्वासा पुहुप अगरकी खानी । सोलह सुतकी भई उत्पानी ॥
पांच अमी साहबके अंगा । पांचों तत्त्व ताहि परसंगा ॥
स्वासा नेह सबै उपजाया । बानी बानी बरन बनाया ॥
सत्य सार सबहिनको मूला । भयऊ सत्य सो सब अस्थूला ॥
स्वासासार सत्य कर भाऊ । अमी आदि उपजी तेहि नाऊ ॥
सत्यसार स्वासा संभारी । अमी आदि पारस तहैं धारी ॥
स्वासा आदि सुरङ्ग बखाना । रंग अमीकर भा बंधाना ॥
स्वासा अजर नाम अनुमाना । परगट अमी सो कहों सुजाना ॥
अदल नाम स्वासा परकाशा । उपजी अमी अमान सुबासा ॥
स्वासा निरञ्जन भया अनुसार । अधर अमीका भा विस्तारा ॥
स्वासा पांच परगट विस्तारा । पांच अमीको भयो पसारा ॥
पांच अमी पांचों अधिकारा । पांचों तत्व तेहि संग सुधारा ॥
पांच अमी सब लोक पसारा । पांचों तत्व गुप्त अनुसार ॥
समय-पांच अमीते पांच भये, पांच नाम अधिकार ।
सनै सनैही सब भया, अमी तत्व विस्तार ॥
चौपाई
सोरह स्वासा सार सुहाया । सोरह सुतकी प्रगटी काया ॥
सोरह सुतकी सोरह नाला । एकते एक अमान रिसाला ॥
पुहुप नाम स्वासा अनुसारि । उपजी सुरति हंसपति भारी ॥
सुरति समानी प्रभुकी देहा । बाहर भीतर एक सनेहा ॥
पांच अमीकी प्रकटी देहा । सुरति कीन्ह तेहि मांहि सनेहा ॥
जेतिक पुरुष खान निरमाया । पांच अमीते सबकी काया ॥
पांचों अमी सुरतिके अंगा । नाल सात उपजी तेहि संग ॥
सात नाल संग एकै भाऊ । सातो सुरत पुरुष परगटाऊ ॥
सात नालकर एके भाऊ । सातौं रहै पुरुषके ठाऊ ॥
पुरुष सुरति कहैं अगुवा कीन्हा । सातौं नाल सौंप तेहो दीना ॥
सातौं नाल सुरति जब पाई । ताहि नालमों रही समाई ॥
छिन बाहर छिन भीतर आवै । देह विदेह दोऊ दरसावै ॥
अमरतार निःअच्छर कियेऊ । सोऊ पुरुष सुरति कह दियेऊ ॥
सत्तपुरुष निज सुरति सनेही । पारस आदि रची सबदेही ॥
समय-अधर निहछर संग लिये, सेत ध्वजा फहराय ।
पलटि समानि सुरति पुरुष, रहि सो अछप छिपाय ॥
सोलह सुतकी उत्पत्ति-चौपाई ।
सुरत सनेह प्रभु इच्छा कीन्हीं । सोरह सुत उपजावे लीन्हीं ॥
आदि भवानी आद्याका पन्थ ब्रह्माका पंथ, विष्णु और शिवकापंथ
सत्यसार स्वासा अनुमाना । सुकृत अंस भये अगुआना ॥
दुसरी स्वासा बाहर आई । उपजे सहज सून्य तिनह पाई ॥
तिसरी स्वासा पुहुप सनेही । तेहिंते भई हमारी देही ॥
चौथी स्वासा तेज सनेहा । तेहिंते भई धरमकी देहा ॥
पांचें स्वासा नाम खुमारी । उपजी कन्या आदि कुमारी ॥
शील नाम स्वासा निरमयऊ । छठयें अंसं सुजन जन भयऊ ॥
सतमें स्वासा नाम अनंगा । उपजे अंश भृंगीमुनि संगा ॥
अठवें स्वासा नाम सुहेली । उपजे कूर्म सीस उर मेली ॥
नवमें स्वासा नाम सोहंगी । जाते उपजे सुत सरवंगी ॥
दसएँ स्वासा नाम रसीला । जाते उपजे सरवन लीला ॥
ग्यारहें स्वासा नाम सुरंगा । सुत स्वभाव उपजे तेहि संगा ॥
बारहें स्वासा नाम सुमाहा । भाव नाम सुत उपजे ताहां ॥
तेरहें स्वासा अछय सुभाऊ । उपजे सुत विवेक तेहि नाऊँ ॥
चौदह स्वासा अमर बंधाना । उपजे सुत संतोष सुजाना ॥
पंद्रहे स्वासा प्रेम सनेहा । उपजी कदल ब्रह्मकी देहा ॥
षोडशे स्वासा नाम जलरङ्गी । उपजे दयापालना सङ्गी ॥
षोडश स्वासा षोडश बानी । उपजे जोगसंतायन ज्ञानी ॥
सोलह स्वासा नाम बखाना । उपजे सोलह सुत निरवाना ॥
सोरह सुत कर एकै मूला । भिन्न भिन्न प्रगटी अस्थूला ॥
एके प्रीति एकै व्यवहारा । सबही रहैं पुरुष दरबारा ॥
एक पाँवते सेवा करहीं । पुरुष वचन शीशपर धरहीं ॥
सेवा करें रहैं लौलीना । पुरुषलोकते होहि न भीना ॥
सेवा करें समाधि लगावैं । पुरुष लोक तजि अनतन जावैं ॥
कहैं कबीर सुनो धर्म दासा । यहि विधि सोलह सुत परगासा ॥
समय-सोरह सुतकी एक मति, एकत एक अधीन ।
कर जोरें सेवा करें, प्रेम प्रगति लौलीन ॥
१ पाठभेद=तेरहें स्वासा अछय सुधारा । ताते सुत विवेक औतारा ॥
२ भाव यह है कि-सोलहों मिलकर जोग संतायन हुए । कहीं कहीं “सतरहें स्वासा अदल सुवानी । उपजे योग संतायन ज्ञानी ॥” लिखा है-किन्तु जब पूर्वापर सब जगह “सोलह सुत” बराबर लिखते जाते हैं तब सत्रवाँ लिखना असंगत है । इसके अतिरिक्त जब स्पष्ट लिखा है “षोडस स्वासा षोडश बानी । उपजे जोगसंतायन ज्ञानी” तब तो सत्रहवें सुतकी कल्पनाकी जड़ मिटकर स्पष्ट सिद्ध होता है कि, सोलहोंके समूहका नाम है “योगसंतायन” और है भी ऐसाही-योगसंतायनमें सबकेही लक्षण पाये जाते हैं । स्पष्टीकरण कबीर धर्मदर्शनमें होगा ।
३ किसी किसी प्रतिमें “वचन” के बदले “चरन” लिखा है, यद्यपि उससेभी आज्ञाकारिता का भाव निकलता है किन्तु “वचन” से विशेष गूढार्थ प्रकट होता है ॥ - श्री युगलानन्द विहारी ॥
विष्णुका पंथ प्रथम श्री सम्प्रदायके धाम क्षेत्रका वृत्तान्त ब्रह्म संप्रदायके धामक्षेत्रका वृत्तान्त
चौपाई ।
सेवा करत बहुत दिन गयऊ । पुरुष अवाज अधर धुनि भयऊ ॥
अधर अवाज भई जब बानी । निकसी अगर बासकी खानी ॥
सबतर लोक दीप रहि छाई । बिमल बास भरपूर समाई ॥
अगर बास सब हंसन पाई । निर्मल बास सदा सुखदाई ॥
पीय अमृत सबै अधाने । अपने अपने लोक सिधाने ॥
और पुत्र सब अच्छप छिपाये । धरम धीर सबते बरियाये ॥
धरमराय सेवा अधिकाने । सो सब तोहि कहौं सहिदाने ॥
छलके बचन पुरुष सो लीन्हा । पाछे दुदैं लोक महैं कीन्हा ॥
समय—और सबै सुत बैठे, अपने अपने थान ।
धरम रोष सबते कियो, ठाँम ठाँम विगरान ॥
धर्मदास बचन—चौपाई ।
धर्मदास बिनवै कर जोरी । साहब संसय मेटहु मोरी ॥
और सब सुत अच्छप छिपाने । धरमराय कस भये बिगाने ॥
कैसे और सबे सुत भारी । धरमराय कस भये विकारी ॥
सतगुरु बचन ।
धर्मदास सुनहुँ चितलाई । कहौं सँदेश आदि समझाई ॥
जब प्रगटे प्रभु अम्मर तारा । निकसी अधर निअच्छर धारा ॥
भई अवाज अधरसे बानी । निकसी अगर वासकी खानी ॥
पारस परिमल महक बसाई । सोई परिमल सुरति दुराई ॥
अगर छिपाय आप महैं राषा । सुरति सनेह मुख प्रगटी भाषा ॥
प्रथम पुरुष मुख भाषा आई । भाषा अग्र पारस निरमाई ॥
भाषा बचन भया अधिकांश । भाषहिंते सकलो विस्तारा ॥
भाषा बचन पुरुष उच्चार । भाषा ते सकलो व्यवहारा ॥
भाषा बोल पुरुष उच्चार । सेवहु सत्यलोक के द्वारा ॥
स्वैसा सार तार जुरियाना । अधर अमान ध्वजा फहराना ॥
भाषा स्वर बानी अनुमाना । बचन समान शब्द बन्धाना ॥
निमिष माहिं अनेक संचारा । बचन समान सबै जग सारा ॥
नाम सनेह शब्द मँझारा । बचन समान स्वास गुञ्जारा ॥
स्वासा नेह देह भइ जबही । भाषा सहज बचन भा तबही ॥
चौथे सनकादिक संप्रदायका वृत्तान्त चारों भाईके धाम क्षेत्रका वृत्तान्त वैष्णव धर्मकी श्रेष्ठता शांकरी संप्रदायका वृत्तान्त
आगेकी उत्पत्ति ।
प्रथम श्वासकी निकसी खानी । उपजे सुक्रित सीतल बानी ॥
निमिष नेह प्रसन्न सुर धारे । नाम मूल टकसार उचारे ॥
भो बिस्तार निमष गड़ छूटी । दुह चित मूल अवस्था लूटी ॥
मूल गुप्त मस्तक नहिं देखा । आदि नाम अमर घर लेखा ॥
पेड़के गहे मूल धुन जागा । सोई मूल फूल फल लागा ॥
पेड़हिं गहे मूल और साखा । मूल मिले तर्वाहिं रस नाखा ॥
गुप्त मूलते प्रगटी साखा । पल्लव मूल पेड़ गहिं राखा ॥
पेड़ देखि पल्लव फँलावै । पल्लव फँल अंत नहिं पावै ॥
पल्लव चढे पेड़ चित राखा । मिले मूल तब फल रस चाखा ॥
आदि अन्त दुइ पेड़ समाना । आपहिं राख आप पहिचाना ॥
जागी सुरति पुनि पेड़ निहारा । फल रस चाख बीज गहिं डारा ॥
बीजहिं ते सो फल होई । फल रस लेइ मूल तजि छोई ॥
जागि सुरति सपन मिटि गयऊ । दुई चित मेटि एकचित भयऊ ॥
दूजे स्वासा प्रभुकी देहा । उपजे सहज समाधि सनेहा ॥
तिसरे स्वासा फूल सनेही । जाते भई हमारी देही ॥
स्वास सार संग गुप्त सनेही । देही माँही रहे विदेही ॥
काया अविहर अविहर वासा । सोई परगट गुप्त निवासा ॥
कायामे काया रहिवासा । तब चौथे स्वासा परकासा ॥
चौथे स्वासा निकरे चाहा । तब चिता उपजी मनमाहा ॥
चिता प्रकट भई दिल जबहीं । आपते आप भूलाने तबहीं ॥
आपु शरीर आपु तब झाँका । विमल प्रकाश उदित तनताका ॥
कायारूप भई उजियारी । निरमल देह विमल तन भारी ॥
विमल प्रकाश किरन जब देखा । बरतन बनै न तनको लेखा ॥
विमल प्रकाश किरन जब फँला । का बरने कोई ताकर सैला ॥
कला अनंत अंत नहिं पावा । बरतन जिह्वा लच्छ न आवा ॥
देखत रूप लीला अधिकारी । आप अपन पौ कीन्ह बिचारी ॥
कमल करी महँ भा उजियारा । देखा आदि अंत विस्तारा ॥
आपु बरन सब देखा जबहीं । दुबिधा रूप झाँइ भइ तबहीं ॥
कमल झांक प्रभु देखा जबहीं । हमर रूप को दोसर अबहीं ॥
इतना कहत बार नहिं लाये । निकसि कमलते बाहर आये ॥
छाड़ि कमल प्रभु भये निनारा । तबहीं कमल भया अंधियारा ॥
शांकरी संप्रदायसे मिलते और पन्थ
कमल झोंकि देख्यो सब न्यारा । भये तिमिर तन तेज अपारा ॥
अंधकार प्रभु देखा जबहीं । काया जोति मलिन भई तबहीं ॥
निमिष एक चित संसय आवा । निमिष एक आनंद समावा ॥
पल सनेह चित संसे आवा । निमिष एक चित हरष समावा ॥
मूल समाधि निमिष ठरि गयउ । जागी सुरत सुपन मिट गयऊ ॥
विस्मय हरष दोऊ एक ठाऊँ । एक पुरुष कर दोऊ सुभाऊ ॥
आपु आपहिं भया अतिचारा । तेही औसर बचन उचारा ॥
उठि अवाज शब्द सतभाऊ । कमल मध्य कस सून्य रहाऊ ॥
घटही वचन आप संधाना । तब चौथी स्वासा बंधाना ॥
तेज पुंज भी गरभ सरीरा । फूँकी नाल देह बल बीरा ॥
कमलनाल धरि फूँका जबहीं । चौथा स्वासा निकसा तबहीं ॥
फूँका कमल तेजके नेहा । चला प्रसेव पुरुषको देहा ॥
फूँकत कमल बार नहिं लागा । भया उजियार तिमिर सबभागा ॥
कारन काल कपट यह धोखा । दुइ चित मूल तेजमैंह रोखा ॥
चौथा स्वासा विषय सनेही । मोह विकार धरमकी देही ॥
मोह विकार तिमर अधिकारा । ता संग भये धरम औतारा ॥
तिसरा स्वासा गुप्तहिं राखा । जाते जोर निरंजन भाखा ॥
फूँकत कमल तेज झरि गयऊ । तेहिंते काल ज्योति धरिभयऊ ॥
जोति जहाँ लगिज्वालाभाखा । तेहिं ते नाम निरंजन राखा ॥
महाबली देही धरिके बैठा । जाने धरममहीं हौं जेठा ॥
तेज लगन स्वासा अनुसार । ताते धरमराय बरियारा ॥
तेज तिमिर संग शून्य निवासा । सबतर भयो काल परगासा ॥
निराकार आकार धराये । जोति काल बहु नाम कहाये ॥
चौदह द्वार काल जो भाखै । सुनि सों सबै नाम मन राखै ॥
सांकित अंड भयो प्रचंडा । फूटत अंड भयो कहु खंडा ॥
चौदह बुन्द अमि ठरि गयऊ । चौदह अंस ताहिंते भयऊ ॥
चौदह पौरिया द्वार बैठारा । इन चौदह बहु ज्ञान पसारा ॥
आप समान सबै रचि राखे । चौदह कोटि ज्ञान तिन भाखे ॥
चौदह अंस धरम तहैं पाये । ते चौदह विद्या पौ लाये ॥
वही चौदहो अगम अपारा । तापर काल धरम बटपारा ॥
भवसागर
धरम समाधि चितही जम धारा । चौदह मांहि चोर कुतवारा ॥
ताकी कला कहै को पारा । जेहिंके सुत कोटिन उजियारा ॥
कोटिन कला करै बहु भारी । आपहिं पुरुष आपहीं नारी ॥
आपहिं वेद आपही बानी । आपहिं कोटिन ज्ञान बखानी ॥
आदि अजर अवगाह कहावै । मूल नाम गहि धोख लगावै ॥
नाना ज्ञान कथे बहु बानी । प्रकटो आदि आप गुन जानी ॥
कहाँ लगि कहीं कालके भाऊ । वहतो काल बहु नाम धराऊ ॥
मुरति सरोतर जागे नाहीं । मनमथ पवन चंचला ताहीं ॥
धर्मदास बचन—चौपाई ।
धरमदास विनवै चित लाई । समरथ मोहि कहो समुझाई ॥
अहाँ दास विनवौं कर जोरी । दया करो प्रभु बन्दी छोरी ॥
धरमराइ उत्पनि जस पाई । तेज पाइ भया वरियाई ॥
ऊपजै तस भये कसाई । उपज्यो चित चंचल दुखदाई ॥
पुरुष तेज जब शून्य संचारा । ता संग भया धरम औतारा ॥
शील विकार सहित तन पाई । प्रथमें भक्ति दूजे अन्याई ॥
भक्ति कियसि जब रहा अकेला । अधाके संग भया अपेला ॥
सो अधा उन कैसे पाई । कहि विधि पुरुष ताहि निरमाई ॥
साहब कहौ भेद समुझाई । कैसे कन्या पुरुष बनाई ॥
कैसे धरमराय तिहिं पाई । तौन भेद तुम कहो गुसाई ॥
कहौ विचारि दोऊ कर भाऊ । दुइ कर जोरिके बन्दों पाँऊ ॥
सतगुरु बचन ।
धरमदास मैं तुम्हे लाखावों । आदि अन्त सब भेद बतावों ॥
चौथे स्वासा संग अधिकारी । सून्यते जगो भई उजियारी ॥
पुरुष कमलपर बैठे आई । गई गरम उपजी शितलाई ॥
पुरुष कमलपर बैठे जबहीं । परिमल उदित भया तन तबहीं ॥
शीतल पवन सोहागन खानी । मूल कमलपर आसन ठानी ॥
सिंहासनपर सो सत्य विराजे । पारस नेह देह महाँ गाजे ॥
पारस तेज भया तन माही । पँचऐं स्वासा उपजा ताही ॥
उपजत स्वासा देह निहारा । तन परसेव भौ मैल निनारा ॥
काया मैल पुरुष जब जाना । मीजी मैल अबला बलठाना ॥
गएउ तेज भा अबल शरीरा । पाछैं भयो स्वास गंभीरा ॥
बन्धन प्रथम भागके प्रथम अध्यायका उपसंहार
तेहि स्वासा सँग पारस भारी । कायाते मथि मैल निकारी ॥
तनते मैल काढ़ि प्रभु लीन्हा । सोई मैल रचि पुत्री कीन्हा ॥
करि पुत्री कर ऊपर लीन्हा । उपज्यो प्रेम सहजका चीन्हा ॥
भई पुत्री प्रभु देखा जबहीं । सुरत कीन्हा पारसको तबहीं ॥
निर्मल पारस स्वासा पाँचा । रहो समायी मैलके साँचा ॥
आप मैलते स्वासा कीन्हा । पैठी सुरति रंग तेहि दीन्हा ॥
देके रंग बरन सब फेरा । भीतर मैल मोह मद घेरा ॥
ऊपर सोभा रंग बनावा । भीतर लाल रंग वह छावा ॥
ऊपर सोभा बहुत रंगाई । भीतर आस ललित रुचि छाई ॥
पांच अमीकर पांच सुभावा । पांच तत्त्व तेहि संग बनावा ॥
पांच अमीते पुरुष सरीरा । ताते पांच तत्त्व भए धीरा ॥
पांच अमीते तत्त्व बनावा । पांच अमी तेहि सँग निरमावा ॥
पांच तत्त्व पांचो बेवहारा । तेहिंते भवउ सकल विस्तारा ॥
पुरुष मैलते पुत्री कीन्हा । पांच तत्त्व तेहि भीतर दीन्हा ॥
आप सुरति ते पुत्री कीन्हा । पांच कर गुन भीतर दीन्हा ॥
भीतर बाहर तत्त्व पसारा । पांचों तत्त्व रंग अधिकारा ॥
पांच रंग तत्त्व की धारा । पांचों तत्त्व रंग बहु सारा ॥
पांच तत्त्व पांचों रंग भारी । पांचों रंगते कला प्सारी ॥
तत्त्व रंगते लीला धारी । पांच तत्त्व पांचों रंग सारी ॥
तत्त्व रंग बहु लीला धारी । पुत्री बहुत बिचित्र सँवारी ॥
तासु कला अनंत पसारी । ताते बहुत भई विस्तारी ॥
वरनि न जाव रूप उजियारी । सुन धर्मनि मैं कहैं विचारी ॥
कलाअनंत प्रभु पुत्री कीन्हा । पारस सार ताहिमें दीन्हा ॥
उत्पति पारस पुत्री पावा । प्रगटी कला अनंत सुभावा ॥
नखसिख देह सिध प्रभु कीन्हां । पँचई स्वासा भीतर दीन्हां ॥
जब स्वासा काया महँ आई । प्रगटी ज्योति जगामग झाई ॥
आठो अङ्ग बना बहुत रंगा । पारस सार ताहि के संग ॥
निर्मल उदित ताहि सो दंता । चमकैं बिजुली कला अनंता ॥
तत्त्व रंगकी उठै तरंगा । शोभा विशद मनोहर संग ॥
पँचऐँ स्वास जब बाहर कीन्हां । उत्पन पारस ता संग दीन्हां ॥
स्वासा पारस मिलि भै एका । सोभा वरन रूप रस ठेका ॥
पुरुष अंश लीला औतारा । उपजी कन्या कला अपारा ॥
अनन्त कलासो कन्या धारा । रूप अनूप भया उजियारा ॥
जब कन्या प्रभु उत्पन्न कीन्हां । पाँच स्वासा ता संग दीन्हां ॥
ता स्वासा संग पारस भारी । पांचे तत्व सो देह सँवारी ॥
उपजी कन्या अगम स्वभावा । अष्टंगी कहि पुरुष बुलावा ॥
आठों अङ्ग बना निरवाना । शोभा सुरति रूप सुख साना ॥
जब कन्या प्रभु देखा हेरी । कला अनंत रूपकी ढेरी ॥
देखि रूप चित हर्षित कीन्हा । उत्पति पारस तासंग दीन्हा ॥
जीवन शब्द मूल रहिवासा । सुरति निरति दीन्हा तेहि पासा ॥
पुरुष रचा जब आपु शरीरा । उपजी सुरति निरति गंभीरा ॥
काया कमलको व्यवहारा । जो चाही सो सबै सुधारा ॥
दहिने अंग तेज कर दाऊ । बायें शीतल सबै सुगाऊ ॥
मध्यम पुरुष सुरति अंकुरा । ताहि सुरति संग पारस पूरा ॥
ता दिन तीनों गुन ठयऊ । इंगला पिंगला सुखमन कियऊ ॥
मठ तिरमठ सो तहाँ बनावा । इंगला पिंगला सुखमन नावा ॥
ताहि समय तीनों घर ठयऊ । ईडा पिंगला सुखमन भयऊ ॥
तीनों घर कर तीन सुभाऊ । शीतल तेज समितकर भाऊ ॥
अमी अग्रमय तेज शरीरा । उपजे चन्द्र सूर दोऊ बीरा ॥
अग्र तेज औ सौम्य सुरंगा । तीन शक्ति उपजी तेहि संगा ॥
कला अनंत शक्तिके पासा । लीला बहुत बिचित्र प्रकासा ॥
कला अनंत सक्ति गंभीरा । तीनहु सक्ति मध्य दोय बीरा ॥
तिनहु संग अहै दोउ बीरा । इक शीतल इक तेज शरीरा ॥
तीनों शक्ति अंग दोउ बीरा । काया मथिकथि कहै कबीरा ॥
अभय शक्ति है चन्द्र सनेहा । इंगला नाडी संग उरेहा ॥
उलैघिनी शक्ति सूर सनेहा । पिंगला नाडी संग उरेहा ॥
चेतन शक्ति सुखमना संगा । बसै मध्य तहैं सुरति सुरंगा ॥
बसै मध्य तहैं सुरति तरंगा । सुरति निरति कायाके संगा ॥
नख शिख ज्योति विराजे अङ्गा । शोभा विशद मनोहर संगा ॥
पांचतत्व त्रय सकती राजै । ताहि संग दोय वीर विराजै ॥
तत्वरैंग सकती घरकीन्हां । तेहि महैं उनपनि पारस दीन्हां ॥
उत्पनि पारस भा परसंगा । उपजी जोति कला बहुरैगा ॥
पाँचऐँ स्वासा देह समाना । उपजी जो कला अधिकाना ॥
जागी देह अँखडित अँगा । शोभित भई कन्ना पर संगा ॥
उत्पनि अँश पुरुषके संगा । भाखों भेद कला बहु रैगा ॥
जब कायामो आई स्वासा । जागी जोति पुहुप परगासा ॥
उपजी जो अखंडित बानी । बोले बचन पुहुप रस खानी ॥
मधुर बचन और लीला धारी । देखि रूप तब पुरुष दुलारी ॥
समय—पाँच तत्व तिन सकति सँग, चंद्र सूर दोउ वीर ।
तीनों घर स्वासा रमे, बाहर भीतर तीर ॥
चौपाई ।
उपजी रूप रैंगकी खानी । बोले अमी विरहकी बानी ॥
उपजी कन्या कला अनूपा । पुरुषसे उत्पन पुरुष स्वरूपा ॥
जेहि पारस सब उत्पत्ति कीन्हौ । सो पारस कन्या कहँ दीन्हौ ॥
पारस हाथ महा बल जाना । तब कहँ भा अभिमाना ॥
उपजा रंग रोस गंभीरा । बैठी अमी सरोवर तीरा ॥
यहि विधि सोरह सुत निरमाया । भिन्न भिन्न अस्थान बनाया ॥
जेहिको जेता तन बिस्तारा । तेहिको तैसा लोक सुधारा ॥
काहुको दीप सत्ताइस दीन्हौ । काहूको सात पाँच दशचीन्हौ ॥
काहू चौदह काहू बीसा । काहू सत्रह काहु उनीसा ॥
काहू बारह पन्द्रह तीसा । काहू इकइस बाइस चौवीसा ॥
काहू छत्तीस बत्तीसहि भारी । दीन्हों वास भये अधिकारी ॥
सब कहँ दीन्हों लोक बनाई । आपु रहे प्रभु अछप छिपाई ॥
झूल्पनि पारस पुत्रिहि दीन्हा । सौपेउ तेज धर्म सों लीना ॥
ताते धर्म भये बली बंडा । बैठो सात दीप नौ खंडा ॥
जिहि विधि रचना पुरुष बनाई । तैसी कला धरम निरमाई ॥
जेहि विधि रचना पुरुषहि कीन्हौ । तैसेहि धरम रचा सब चीन्हौ ॥
पुरुष समान रचा अस्थाना । बैठि शून्यमें करे अनुमाना ॥
जावन बिना जीव नहि होई । रचि अस्थूल बैठि मुख गोई ॥
रचना रचि मनमें पछिताई । सून्व शरीर जीव कहँ पाई ॥
जेहि पारस प्रभु लोक बनाया । सो पारस प्रभु कहाँ छुपाया ॥
सो पारस अब कहवौ पाऊँ । जेहि पारसते जिव निरमाऊँ ॥
हेरत पारस आये तहवौ । बैठि सरोवर कामिनि जहवौ ॥
कामिनि धरम भये एक ठाँऊ । अंक मिलाय कीन्ह बहु भाऊ ॥
शील रंग रस कीन्ह मिलापा । धर्म राय सो कीन्ह विलापा ॥
करै विलाप कला बहु भारी । मुख चतुराई हिरदय विकारी ॥
कामिनिसो कीन्हो व्यवहारा । उपजा रंग रूप रसधारा ॥
धरम कहै कामिनिसों वाता । गहै अंग जमकाहै गाता ॥
कामिनि देह कामकी खानी । बोले मधुर बिरहकी वानी ॥
उपजा मोह महा मद भारी । कामिनि कामकला अनुसारि ॥
देखि कला अनुसार भुलाना । व्याकुल भये रंग अभिमाना ॥
कामिनि देखि धरम अकुलाना । उपजा रंग रोष अभिमाना ॥
धर्मराय वचन ।
धर्म कहै कामिनि सों वानी । तोरे है पारस सहिदानी ॥
सो पारस अब तुमरे पास । जाते पूजे मनकी आसा ॥
सो पारस देहु मोर हाथा । तुमहूँ रहो हमारे साथा ॥
सा०—तैं तो पारस पायऊ, अब चलो हमारे देस ॥
कहा मोर जो मानहू, मानहु मोर उपदेश ॥
धर्मराय जब कही कुवानी । तब कामिनि चित संका आनी ॥
अद्यावचन ।
कामिनी कहै धर्मसों वानी । काहे धर्म होहु अज्ञानी ॥
हम तुम एक पुरुषकर कीन्हौ । तुमकहूँदीन्ह सो हमहुँकोदीन्हौ ॥
हम लहुरे तुम जेठे भाई । हमसो कहा करहु अधिकई ॥
यहि कहि कन्या अठलानी । एके नाल कुमारग वानी ॥
वहनिहि भाइहि हुई कुवानी । आगे चली यही सहिदानी ॥
जबही कामिनि कही अस बानी । धरमराय चित दुबिधि आनी ॥
धर्मराय वचन ।
कामिनि चलहु हमारे देसा । कहा करहु मानहु उपदेसा ॥
छल बल करि अपने पुर बाला । तहाँ आनिकै रारि बढावा ॥
धरमराय कामिनिसों बोला । शोभा सुरति अमीरस डोला ॥
निरखि नैन कामिनिसों बोलै । शक्ति आधीन बैन बहु खोलै ॥
सोरह शक्ति कला शशि पूरी । तीनों शक्ति लिये कर छूरी ॥
नैन निरखि मूरति हो झोंके । तत्व निःतत्व आप तन ताके ॥
विधिलौं लाइ बधिक विधि बोले । निरखत अंग २ तनु डोले ॥
अंतरगति विधि विधिहि मनायों । कुमति हाथपर साजनि आयो ॥
विधि दीन्ह बुन्द इक आई । चित सकाई एक रचो उपाई ॥
यहि पुर एक अंचभो ठयऊ । पारसको परताप जनयऊ ॥
इच्छा रूप हरष चित जागी । रचत सरोवर बार न लागी ॥
भूल्यो धरम चित अकुलाना । ऐसो सरवर मैं नहि जाना ॥
अछय अजूनि विधि पारस आना । कहा अचम्भो आनि तुलाना ॥
देखो तेहि पारसको चीन्हौं । जेहिंते मानसरोवर कीन्हौं ॥
सूर मलीन उदय शशि जोना । वाती बरन अंग तु अलोना ॥
धर्मराय वचन
जादिन पुरुष रचा तुव देहा । ता दिन मुहिं तुहिं जुरा सनेहा ॥
मोहिं कारन तोहि पुरुष बनावा । तू कस मोते अंग छिपावा ॥
मोहिं कारन तोहि रचना कीन्हा । रचिके खानि तोहि चितदीन्हा ॥
देह नात हमरे घर नाहीं । हम तुम रहे एक घर माहीं ॥
उत्पति पारस तुमरे पास । जाते पूजै मनकी आसा ॥
देह सबै हम रची बनाई । पारस दै तुम लेहु जगाई ॥
हम तुम खानि रचै बहु बानी । जाते होय न एकौ हानी ॥
हम तुम मिलि होयैं यकसारा । जाते होय स्निस्टि विस्तारा ॥
जैसी रचना पुरुष प्रगासा । तैसी रचो लोक रहिवासा ॥
जीव सीव रचि खानि बनाओ । जागे जोति ज्ञान फैलाओ ॥
जीव रची सब खानि बनाई । जागे जोति ज्ञान फैलाई ॥
लाज सकुचि आ रचों सगाई । वरण विचारि छूत बिगराई ॥
ठांव ठांव रचि राखों आपा । माता पिता सोग संतापा ॥
ससुर भैसुर औ भमित भाई । सिव सकति रची पूठ लगाई ॥
जाता पांत बहुते बिलगाओ । हंसन लाज भाव बन धाओ ॥
रचि अचार कपट विस्तारों । तीरथ वरत परतिमा धारों ॥
बहु बिधि करौं पखंड पसारा । तीरथ बरत औ नेम अचारा ॥
बद कितेब धरि फँद सँवारों । रची देओं दोग्य पर्वत भारों ॥
दो दीन दुइ राह चलाओ । झगरा कराइ सदा अरुझाओ ॥
एक एकते रारि बढावे । मुक्तिपंथते रहे भुलावे ॥
दोऊ दीन बाँधी मरजादा । रचों बाद ममता औ स्वादा ॥