भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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भव बूडत तुमही गहि राखा । सब्द सुधारस मोसन भाखा ॥
अब वह कथा कहो समुझाई । स्नाप अन्त किय कौन उपाई ॥
कबीर बचन धर्मदास प्रति गायत्री के अद्या को शाप देनेका वृत्तान्त
धर्मनि तुम सन कहों बखानी । भाषा ज्ञान अगमकी बानी ॥
मातु स्नाप गायत्री लीन्हा । उलटि साप पुनि मातहि दीन्हा ॥
हम जो पाँच पुरुषकी जोई । पाँचोकी तुम माता होई ॥
बिना पुरुष तू जनि है वारा । सो तो जनि है सकल सनसारा ॥
दुहुन साप फल पायो भाई । उगरह मयो देह धरि आई ॥

इति सृष्टि उत्पत्ति विषयक प्रमाण-अनुराग सागर ।

अथ आदिमंगल

बोहा—

प्रथमै समरथ आप रहे, दूजा रहा न कोइ ।
दूजा केहि बिधि ऊपजा, पूछत हों गुरु सोइ ॥ १ ॥
तब सतगुरु मुख बोलिया, सुकृत सुनो सुजान ।
आदि अन्तकी पारचै, तोसों कहैं बखान ॥ २ ॥
प्रथम सुरति समरथ कियो, घटमें सहज उचार ।
ताते जामन दीनिया, सात करी बिस्तार ॥ ३ ॥
दूजे घट इच्छा भई, चित मनसा तो कीन्ह ।
सातरूप निरमाइया, अविगत काहु न चीन्ह ॥ ४ ॥
तब समरथके स्त्रवणते, मूल सुरति भै सार ।
सब्द कला ताते भई, पाँच ब्रह्म अनुहार ॥ ५ ॥
पाँचौ पाँचे अंड धरि, एक एकमा कीन्ह ।
दुइ इच्छा तहैं गुप्त है, सो सुकृत चित चीन्ह ॥ ६ ॥
योगमया यकु कारने, ऊजे अक्षर कीन्ह ।
या अविगति समरथ करि, ताहि गुप्त करि दीन ॥ ७ ॥
स्वासा सोहं ऊपजे, कीन्ह अमी बंधान ।
आठ अंश निरमाइया, चीन्हौ संत सुजान ॥ ८ ॥
तेज अंड अचिंत्यका, दीन्हो सकल पसार ।
अंड शिक्षापर बैठकै, अधर दीप निरधार ॥ ९ ॥