भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 176, कुल 1367 में से

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पृष्ठ 176

सत्यसार स्वासा अनुमाना । सुकृत अंस भये अगुआना ॥
दुसरी स्वासा बाहर आई । उपजे सहज सून्य तिनह पाई ॥
तिसरी स्वासा पुहुप सनेही । तेहिंते भई हमारी देही ॥
चौथी स्वासा तेज सनेहा । तेहिंते भई धरमकी देहा ॥
पांचें स्वासा नाम खुमारी । उपजी कन्या आदि कुमारी ॥
शील नाम स्वासा निरमयऊ । छठयें अंसं सुजन जन भयऊ ॥
सतमें स्वासा नाम अनंगा । उपजे अंश भृंगीमुनि संगा ॥
अठवें स्वासा नाम सुहेली । उपजे कूर्म सीस उर मेली ॥
नवमें स्वासा नाम सोहंगी । जाते उपजे सुत सरवंगी ॥
दसएँ स्वासा नाम रसीला । जाते उपजे सरवन लीला ॥
ग्यारहें स्वासा नाम सुरंगा । सुत स्वभाव उपजे तेहि संगा ॥
बारहें स्वासा नाम सुमाहा । भाव नाम सुत उपजे ताहां ॥
तेरहें स्वासा अछय सुभाऊ । उपजे सुत विवेक तेहि नाऊँ ॥
चौदह स्वासा अमर बंधाना । उपजे सुत संतोष सुजाना ॥
पंद्रहे स्वासा प्रेम सनेहा । उपजी कदल ब्रह्मकी देहा ॥
षोडशे स्वासा नाम जलरङ्गी । उपजे दयापालना सङ्गी ॥
षोडश स्वासा षोडश बानी । उपजे जोगसंतायन ज्ञानी ॥
सोलह स्वासा नाम बखाना । उपजे सोलह सुत निरवाना ॥
सोरह सुत कर एकै मूला । भिन्न भिन्न प्रगटी अस्थूला ॥
एके प्रीति एकै व्यवहारा । सबही रहैं पुरुष दरबारा ॥
एक पाँवते सेवा करहीं । पुरुष वचन शीशपर धरहीं ॥
सेवा करें रहैं लौलीना । पुरुषलोकते होहि न भीना ॥
सेवा करें समाधि लगावैं । पुरुष लोक तजि अनतन जावैं ॥
कहैं कबीर सुनो धर्म दासा । यहि विधि सोलह सुत परगासा ॥
समय-सोरह सुतकी एक मति, एकत एक अधीन ।
कर जोरें सेवा करें, प्रेम प्रगति लौलीन ॥


१ पाठभेद=तेरहें स्वासा अछय सुधारा । ताते सुत विवेक औतारा ॥

२ भाव यह है कि-सोलहों मिलकर जोग संतायन हुए । कहीं कहीं “सतरहें स्वासा अदल सुवानी । उपजे योग संतायन ज्ञानी ॥” लिखा है-किन्तु जब पूर्वापर सब जगह “सोलह सुत” बराबर लिखते जाते हैं तब सत्रवाँ लिखना असंगत है । इसके अतिरिक्त जब स्पष्ट लिखा है “षोडस स्वासा षोडश बानी । उपजे जोगसंतायन ज्ञानी” तब तो सत्रहवें सुतकी कल्पनाकी जड़ मिटकर स्पष्ट सिद्ध होता है कि, सोलहोंके समूहका नाम है “योगसंतायन” और है भी ऐसाही-योगसंतायनमें सबकेही लक्षण पाये जाते हैं । स्पष्टीकरण कबीर धर्मदर्शनमें होगा ।

३ किसी किसी प्रतिमें “वचन” के बदले “चरन” लिखा है, यद्यपि उससेभी आज्ञाकारिता का भाव निकलता है किन्तु “वचन” से विशेष गूढार्थ प्रकट होता है ॥ - श्री युगलानन्द विहारी ॥

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