कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 174, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौपाई ।
धरमदास चित्त चेतहु जानी । कहों बुझाय अगरकी खानी ॥
पुरुष अजावन रहे विदेहा । तत्त्व बिहीन सुरति सनेहा ॥
चारि करी सिंहासन जोरा । पांचऐँ आप मध्य अंजोरा ॥
चारि करी चारिउ परवाना । स्वाती युक्त भीतर अकुलाना ॥
समय-करी करी महा परिमल, वास सुवासकी खानि ।
तेज करीन परगट भई, चिता आनि समानि ॥
चौपाई ।
पुरुष आंचित चिता जब कीन्हा । उपज्योशब्द सुरतिको चीन्हा ॥
रहे गुप्त परगट भई काया । स्वासा सार शब्द निरमाया ॥
शब्दहिते है पुरुष अस्थूला । शब्दहिते है सबको मूला ॥
शब्दहिते बहु शब्द उचारा । शब्दै शब्द भया उजियारा ॥
शब्दहिं पारस शब्द अधारा । शब्दहिते भौ सकल पसारा ॥
शब्दहिं रूप गुरु कर धारा । सोई शब्द जिवके रखवारा ॥
प्रथम शब्द भया अनुसार । निहतत्त्वी यक कमल सुधारा ॥
नीहतत्त्वीपर आसन कीन्हौ । रचना रची सकल तब लीन्हौ ॥
रच्यौ पुहुप रचना मनि भारी । सहस्र अठासी दीप सुधारी ॥
अच्छै वृक्ष एक रचा बनाई । अग्रवास तहैं रही समाई ॥
समय-पेड पात रस फूलमें, प्रगटी वास अनूप ।
पारस गिहतत्त्वहि पुरुष, सुरति हंसको रूप ॥
पेड पात फल फूलमें, प्रगटी वास अनूप ।
प्रसन्न होत निहतत्त्व पुरुष, सुरति हंसको रूप ॥
चौपाई
जब पारस सुरति भये स्थाना । अगर प्रताप निमिष उरआना ॥
पुहुप प्रसन्न होत उजियारा । स्वासा पारस बचन सुधारा ॥
पुरुष प्रसन्न नाम उच्चार । श्वासापर सब रचनि सुधारा ॥
स्वासा पार शब्द गुँजारा । पांच अमीको भयो बिस्तारा ॥
पांच अमीको जो विसतारा । ताहि अमी सब लोक सुधारा ॥
स्वासा पुहुप अगरकी खानी । सोलह सुतकी भई उत्पानी ॥
पांच अमी साहबके अंगा । पांचों तत्त्व ताहि परसंगा ॥
स्वासा नेह सबै उपजाया । बानी बानी बरन बनाया ॥