कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 166, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब तुम होहु कृस्न अवतारा । लैहो ओयलसों कहों विचारा ॥
नाथहु नाग कलिंद्री जाई । अब तुम जाहु विलम्ब न लाई ॥
ऊँच होइके नीच सतावे । ताकर ओयल मोहि सो पावे ॥
जो जिव देह पीर पुनि काहू । हम पुनि ओयल दिबावै ताहू ॥
पहुँचे हम तब तुव पास । कीन्हेट सत्य वचन परगासा ॥
भेटेउ नाहि मोहि पद ताता । विष ज्वाला साँवल भोगाता ॥
व्याकुल भयो तवै फिर आयो । पितु पद दरसन मैं नहि पायो ॥
अद्याका विष्णुको ज्योतिका दर्शन कराना ।
इतना सुनि हरषित भई माई । लीन्ह विस्नु कहैं गोद उठाई ॥
पुनि अस कहेउ आदि भवानी । अब सुनहु पुत्र प्रिय मम बानी ॥
देख पुत्र तोहि पिता भिटावों । तोरे मन कर धोख मिटावों ॥
प्रथमहि ज्ञान द्रिष्टिसो देखो । मोर वचन निज हिये परेखो ॥
मन सरूप करता कहैं जानों । मनते दूजा और न मानो ॥
सरग पताल दौर मन केरा । मन इस्थिर मन अहै अनेरा ॥
छनमहैं कला अनंत दिखावे । मन कहैं देख कोइ नहि पावे ॥
निराकार मनहीको कहिये । मनकी आस दिवस निसि रहिये ॥
देखहु पलटि सून्यमहैं जोती । जहूँ झिलमिल झालर होती ॥
फेरहु स्वास गगन कहैं धाओ । मार्ग अकासहि ध्यान लगाओ ॥
जैसे माता कहि समुझावा । तैसे विस्नु ध्यान मन लावा ॥
छंद-पैठि गुफा ध्यान कीन्हो स्वास संयम लायके ॥
पवन धूँका दियो जबते गगन गरज्यो आयके ॥
बाजा सुनत तब मगन भा पुनि कीन्ह मन कस ख्याल हो ॥
सून्य स्वेत पीत सज्ज लाल दिखाय रंग जंगल हो ॥ ३० ॥
सोरठा-तेहि पीछे धर्मदास, मन पुनि आपे दिखायऊ ॥
कीन्ह ज्योति परकास, देखि विस्नु हरषित भये ॥ ३० ॥
मातहि नायो सीस, बहु अधीन पुनि विस्नु भा ॥
मैं देखा जगदीस, हे जननी परसाद तुव ॥ ३१ ॥
धर्मदास वचन ।
धरमदास गहि टेके पाया । हे साहिब इक संशय आया ॥
कन्या मनको ध्यान बतावा । सो यह सकल जीव भरमावा ॥