भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

छन्द-भये साप बस तीनों बिकल मतिहीन छीन कुकर्मते ।
यह काल कला प्रचंड कामिनि डस्यो सब कहैं चर्मते ॥
ब्रह्मादि सिव सनकादि नारद कोउं न बचि भागि हो ॥
सुनु धरमनि विरल बाचे सब्द सत सो लागि हो ॥ २८ ॥

सोरठा-सत्य सब्द परताप, कालकला व्यापे नहीं ।
निकट न आवै पाप, मन वच करम जो पर गहे ॥ २८ ॥

साप दे देनेपर अद्याका निरञ्जनके डरसे डरकर पछ्ताना ।
साप तीनौको दैलियो मन माहिं तब पछ्तावई ।
कस करहि मोहि निरंजना पल छमा मोहि न आवई ॥

निरञ्जनका अद्याको शाप देना ।

अकास बानी तब भयी यहु कहा कीन भवानिया ।
उत्पत्ति कारन तोहि पठायी कहा चरित यह ठानिया ॥
सोरठा-नीचहि ऊँच सिताय, बदल मोहि सो पावई ।

द्रापर युग जब आय, तुमहूँ पंच भतारि हो ॥ २९ ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति । अद्याका निडर होना ।

साप ओयल जब सुनेउ भवानी । मन सन गुने कहा नहिं बानी ॥
ओयल प्रभाव साप हम पाया । अब कहा करब निरंजनराया ॥
तोरे वस परी हम आई । जस चाहो तस करो उपाई ॥

विष्णुका गौरसे श्याम होनेका कारण ।

अद्यावचन विष्णु प्रति ।

पुनि माता विष्णु दुलारा । सुनहु पुत्र इक वचन हमारा ॥
सत्य सत्य तुम कहो बुझाई । पितु पद परसन जब गै भाई ॥
प्रथमहु तो तुव गौर सरीरा । कारण कौन स्याम भए धीरा ॥

विष्णुवचन अद्या प्रति ।

आज्ञा पाय हम तत्काला । पितु, पद परसन चले पताला ॥
अक्षत पुहुप लीन्ह करमाहों । चले पताल पंथ मग जाहों ॥
पहुँचि संसनाग पहुँ गयऊ । विषक तेज हम अलसयऊ ॥
भयो स्याम विष तेज समावा । भइ अवाज अस वचन सुनावा ॥
अहो विस्तु माता पहुँ जाई । बचन सत्य कहियो समझाई ॥
सतजुग त्रेता जैहै जबहीं । द्रापर ह्वै चौथा पद तबहीं ॥