भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 164

अद्याका ब्रह्माको शाप देना ।

यह सुनि माता कीन्हें दापा । ब्रह्मा कंहैं तब दीन्हो सापा ॥
पूजा तोरि करै कोइ नाहीं । जो मिथ्या बोलेउ मम पाहीं ॥
इक मिथ्या अरु अकरम कीन्हा । नरक मोट अपने शिर लीन्हा ॥
आगे होइ जो साख तुम्हारी । मिथ्या पाप करहि बहु भारी ॥
प्रगट करहि बहु नेम अचारा । अन्तर मैल पाप विस्तारा ॥
विस्नु भक्तसों करहि हँकारा । ताते परिहैं नरक मँझारा ॥
कथा पुराण औरहि समुझैं हैं । चाल बिहून आपन दुखपैहैं ॥
उनसे और मुनै जो ज्ञाना । करि सो भगति कहां परमाना ॥
और देवको अंश लखैहैं । औरन निन्दि काल मुख जैहैं ॥
देवन पूजा बहु विधि लैहैं । दछिना कारण गला कटैहैं ॥
जा कह शिक्ख करै पुनि जायी । परमारथ तिहि नाहिं लखायी ॥
परमारथके निकट न जैहैं । स्वार अर्थ सबै समुझैहैं ॥
आप स्वार्थी ज्ञान मुनैहैं । आपनि पूजा जगत दिदैहैं ॥
आपन पूजा जगहि दिढायी । परमारथके निकट न जायी ॥
आप ऊँच औरहि कंहैं छोटा । ब्रह्मा तोर सखा होइ खोटा ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

जब माता अस कीन्ह प्रहारा । ब्रह्मा मूरछि मही कर धारा ॥

अद्याका गायत्रीको शाप देना ।

गायत्री साप्यो तिहि वारा । हुइहै तोर पंच भरतारा ॥
गायत्री तोर होइ वृषभ भतारा । सात पाँच और बहुत पसारा ॥
धर औतार अखज तुम खायी । बहुत झूठ तुम वचन सुनायी ॥
निज स्वार्थ तुम मिथ्या भाखी । कहा जानि यह दीन्ही साखी ॥
मानि साप गायत्री लीन्ही । सावित्रिहि तब चितबन कीन्ही ॥

अद्याका सावित्रीको शाप देना ।

पुहुपावति निज नाम धरायेहु । मिथ्या कह निज जन्म नसायेहु ॥
सुनहु पुष्पावति तुम्हरो विस्वासा । नहिं पुजिहैं तुमसे कछु आसा ॥
होय कुगंध ठौर तब बासा । भुगतहु नरक काम गहि आसा ॥
जो तोहिं सींच लगावे जानी । ताकर होय वंशकी हानी ॥
अब तुम जाय धरो औतारा । क्योडा केतकी नाम तुम्हारा ॥