कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 163, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मावचन ।
कह ब्रह्मा दोऊ हैं साखी । परस्यो सीस देख इन आँखी ॥
अद्यावचन गायत्री प्रति ।
तब माता बूझे अनुसारि । कहु गायत्री वचन विचारी ॥
तुम देखा इन दरसन पावा । कहो सत्य दरसन परभावा ॥
गायत्रीवचन ।
तब गायत्री वचन सुनावा । ब्रह्मा दरस सीस पितु पावा ॥
मैं देखा इन परसेउ सीसा । ब्रह्महि मिले देव जगदीसा ॥
छन्द-लेइ पुहुप परसेउ सीस पितु इन द्विष्टि मैं देखत रही ।
जल ढार पुहुप चढाय दीन्ह हे जननि यह है सही ॥
पुहुपते पुहुपावती भयी प्रगट ताही ठामते ॥
इनहु दरसन लह्यो पितुको पूछहू इहि वामते ॥ २६ ॥
हो जननी यह है सही तुम पूछि लो पुहुपावती ।
सबही साँच मैं तोसो कहूँ नहि झूठ है एको रती ॥
अद्यावचन पुहुपावती प्रति ।
माता कह पुहुपावतीसो कहो सत्यहि मो सना ।
जो चढे सीसहि पिताके तुम वचन बोलहु ततखना ॥ २७ ॥
सोरठा-कहु पुहुपावति मोहि, दरश कथा निरवारके ॥
यह मैं पूछों तोहि, किमि ब्रह्मा दरसन किये ॥ १७ ॥
सावित्रीवचन ।
पुहुपावती बेचन तब बोली । माता सत्य वचन नहि डोली ॥
दरसन सीस लह्यो चतुरानन । चढेसीस यह धर निश्चय मन ॥
साख सुनत अद्या अकुलानी । भाअचरज यह मरम न जानी ॥
अद्याकी चिन्ता
अलख निरंजन अस प्रण भाखी । मोकहैं कोउ न देखै आँखी ॥
ये तीनहुँ कस कहहि लबारी । अलख निरंजन कहहु सम्हारी ॥
ध्यान कीन्ह अष्टंगी तेहि छन । ध्यान माहिँ अस कह्यो निरंजन ।
निरञ्जनवचन ।
ब्रह्मा मोर दरश नहि पाया । झूठि साखि इन आय दिवाया ॥
तीनो मिथ्या कहे बनाई । जनि मानहु यह है लबराई ॥