कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 184, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंहेरत पारस आये तहवौ । बैठि सरोवर कामिनि जहवौ ॥
कामिनि धरम भये एक ठाँऊ । अंक मिलाय कीन्ह बहु भाऊ ॥
शील रंग रस कीन्ह मिलापा । धर्म राय सो कीन्ह विलापा ॥
करै विलाप कला बहु भारी । मुख चतुराई हिरदय विकारी ॥
कामिनिसो कीन्हो व्यवहारा । उपजा रंग रूप रसधारा ॥
धरम कहै कामिनिसों वाता । गहै अंग जमकाहै गाता ॥
कामिनि देह कामकी खानी । बोले मधुर बिरहकी वानी ॥
उपजा मोह महा मद भारी । कामिनि कामकला अनुसारि ॥
देखि कला अनुसार भुलाना । व्याकुल भये रंग अभिमाना ॥
कामिनि देखि धरम अकुलाना । उपजा रंग रोष अभिमाना ॥
धर्मराय वचन ।
धर्म कहै कामिनि सों वानी । तोरे है पारस सहिदानी ॥
सो पारस अब तुमरे पास । जाते पूजे मनकी आसा ॥
सो पारस देहु मोर हाथा । तुमहूँ रहो हमारे साथा ॥
सा०—तैं तो पारस पायऊ, अब चलो हमारे देस ॥
कहा मोर जो मानहू, मानहु मोर उपदेश ॥
धर्मराय जब कही कुवानी । तब कामिनि चित संका आनी ॥
अद्यावचन ।
कामिनी कहै धर्मसों वानी । काहे धर्म होहु अज्ञानी ॥
हम तुम एक पुरुषकर कीन्हौ । तुमकहूँदीन्ह सो हमहुँकोदीन्हौ ॥
हम लहुरे तुम जेठे भाई । हमसो कहा करहु अधिकई ॥
यहि कहि कन्या अठलानी । एके नाल कुमारग वानी ॥
वहनिहि भाइहि हुई कुवानी । आगे चली यही सहिदानी ॥
जबही कामिनि कही अस बानी । धरमराय चित दुबिधि आनी ॥
धर्मराय वचन ।
कामिनि चलहु हमारे देसा । कहा करहु मानहु उपदेसा ॥
छल बल करि अपने पुर बाला । तहाँ आनिकै रारि बढावा ॥
धरमराय कामिनिसों बोला । शोभा सुरति अमीरस डोला ॥
निरखि नैन कामिनिसों बोलै । शक्ति आधीन बैन बहु खोलै ॥
सोरह शक्ति कला शशि पूरी । तीनों शक्ति लिये कर छूरी ॥
नैन निरखि मूरति हो झोंके । तत्व निःतत्व आप तन ताके ॥