कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
हेरत पारस आये तहवौ । बैठि सरोवर कामिनि जहवौ ॥
कामिनि धरम भये एक ठाँऊ । अंक मिलाय कीन्ह बहु भाऊ ॥
शील रंग रस कीन्ह मिलापा । धर्म राय सो कीन्ह विलापा ॥
करै विलाप कला बहु भारी । मुख चतुराई हिरदय विकारी ॥
कामिनिसो कीन्हो व्यवहारा । उपजा रंग रूप रसधारा ॥
धरम कहै कामिनिसों वाता । गहै अंग जमकाहै गाता ॥
कामिनि देह कामकी खानी । बोले मधुर बिरहकी वानी ॥
उपजा मोह महा मद भारी । कामिनि कामकला अनुसारि ॥
देखि कला अनुसार भुलाना । व्याकुल भये रंग अभिमाना ॥
कामिनि देखि धरम अकुलाना । उपजा रंग रोष अभिमाना ॥
धर्मराय वचन ।
धर्म कहै कामिनि सों वानी । तोरे है पारस सहिदानी ॥
सो पारस अब तुमरे पास । जाते पूजे मनकी आसा ॥
सो पारस देहु मोर हाथा । तुमहूँ रहो हमारे साथा ॥
सा०—तैं तो पारस पायऊ, अब चलो हमारे देस ॥
कहा मोर जो मानहू, मानहु मोर उपदेश ॥
धर्मराय जब कही कुवानी । तब कामिनि चित संका आनी ॥
अद्यावचन ।
कामिनी कहै धर्मसों वानी । काहे धर्म होहु अज्ञानी ॥
हम तुम एक पुरुषकर कीन्हौ । तुमकहूँदीन्ह सो हमहुँकोदीन्हौ ॥
हम लहुरे तुम जेठे भाई । हमसो कहा करहु अधिकई ॥
यहि कहि कन्या अठलानी । एके नाल कुमारग वानी ॥
वहनिहि भाइहि हुई कुवानी । आगे चली यही सहिदानी ॥
जबही कामिनि कही अस बानी । धरमराय चित दुबिधि आनी ॥
धर्मराय वचन ।
कामिनि चलहु हमारे देसा । कहा करहु मानहु उपदेसा ॥
छल बल करि अपने पुर बाला । तहाँ आनिकै रारि बढावा ॥
धरमराय कामिनिसों बोला । शोभा सुरति अमीरस डोला ॥
निरखि नैन कामिनिसों बोलै । शक्ति आधीन बैन बहु खोलै ॥
सोरह शक्ति कला शशि पूरी । तीनों शक्ति लिये कर छूरी ॥
नैन निरखि मूरति हो झोंके । तत्व निःतत्व आप तन ताके ॥
विधिलौं लाइ बधिक विधि बोले । निरखत अंग २ तनु डोले ॥
अंतरगति विधि विधिहि मनायों । कुमति हाथपर साजनि आयो ॥
विधि दीन्ह बुन्द इक आई । चित सकाई एक रचो उपाई ॥
यहि पुर एक अंचभो ठयऊ । पारसको परताप जनयऊ ॥
इच्छा रूप हरष चित जागी । रचत सरोवर बार न लागी ॥
भूल्यो धरम चित अकुलाना । ऐसो सरवर मैं नहि जाना ॥
अछय अजूनि विधि पारस आना । कहा अचम्भो आनि तुलाना ॥
देखो तेहि पारसको चीन्हौं । जेहिंते मानसरोवर कीन्हौं ॥
सूर मलीन उदय शशि जोना । वाती बरन अंग तु अलोना ॥
धर्मराय वचन
जादिन पुरुष रचा तुव देहा । ता दिन मुहिं तुहिं जुरा सनेहा ॥
मोहिं कारन तोहि पुरुष बनावा । तू कस मोते अंग छिपावा ॥
मोहिं कारन तोहि रचना कीन्हा । रचिके खानि तोहि चितदीन्हा ॥
देह नात हमरे घर नाहीं । हम तुम रहे एक घर माहीं ॥
उत्पति पारस तुमरे पास । जाते पूजै मनकी आसा ॥
देह सबै हम रची बनाई । पारस दै तुम लेहु जगाई ॥
हम तुम खानि रचै बहु बानी । जाते होय न एकौ हानी ॥
हम तुम मिलि होयैं यकसारा । जाते होय स्निस्टि विस्तारा ॥
जैसी रचना पुरुष प्रगासा । तैसी रचो लोक रहिवासा ॥
जीव सीव रचि खानि बनाओ । जागे जोति ज्ञान फैलाओ ॥
जीव रची सब खानि बनाई । जागे जोति ज्ञान फैलाई ॥
लाज सकुचि आ रचों सगाई । वरण विचारि छूत बिगराई ॥
ठांव ठांव रचि राखों आपा । माता पिता सोग संतापा ॥
ससुर भैसुर औ भमित भाई । सिव सकति रची पूठ लगाई ॥
जाता पांत बहुते बिलगाओ । हंसन लाज भाव बन धाओ ॥
रचि अचार कपट विस्तारों । तीरथ वरत परतिमा धारों ॥
बहु बिधि करौं पखंड पसारा । तीरथ बरत औ नेम अचारा ॥
बद कितेब धरि फँद सँवारों । रची देओं दोग्य पर्वत भारों ॥
दो दीन दुइ राह चलाओ । झगरा कराइ सदा अरुझाओ ॥
एक एकते रारि बढावे । मुक्तिपंथते रहे भुलावे ॥
दोऊ दीन बाँधी मरजादा । रचों बाद ममता औ स्वादा ॥
एहि विधि रचों सकल दुनियाई । लोभ मोह लालच बरियाई ॥
रचिकै खानि करों रजधानी । राज पाट सिंहासन ठानी ॥
साखी—रचना रचों सब लोककी, नख सिख रहों समाय ।
पुरुष नाम जाने बिना, सत्यलोक नहि जाय ॥
तुम अद्या अरु हम अविनासी । बारह खंड छै लोकके वासी ॥
पाप पुत्र दोए रचों अवारा । जाकहैं सेव यह संसारा ॥
पाप पुत्र दिठ फँदा होई । जा महँ अरुझि है सब कोई ॥
जोग जज्ञ व्रत संयम पूजा । सोल हमहीं और नहि दूजा ॥
रचों छुधा मायादि विकारा । पुरुष लोकको मूंदें द्वारा ॥
रचों क्रोध माया विकरारा । पुरुष लोकको रोको द्वारा ॥
पुरुष लोक हहई रचि लीजै । इकछत राज हमहि तुम कीजै ॥
तुमरे संग है पारस सूर। जाते होय सकल विधि पूरा ॥
जहि ते लोक पुरुष परगासा । सो पारस है तुमरे पास ॥
सो पारस अब हमको देह । रंग हमारा सबै तुम लेह ॥
अद्या वचन ।
कामिनी कहे वचन बुद्धि धीरा । उपजेहु कालरूप बलवीरा ॥
जो जो वचन कहेउ तुम भाई । सो हमरे चित्त एकु न आई ॥
पुरुष लोक कस मूंदहु द्वारा । लेउ थाप अपने सिरभारा ॥
जो छल हमते कीन्ह भाई । तैसा छल तुम्ह भुगतहु जाई ॥
पारस कामिनि धरा दुराई । हाथ मलै सिर धुनि पछताई ॥
हाथ मीजि छिनछिन पछितावे । कहि कामिनि धर्महि समुझावे ॥
कामिनि कहै कुबुध समझाई । हम तुम चलहु पुरुषमहँ जाई ॥
बकसै पुरुष दयाकरि तोही । सीस नवायके लीन्हे मोही ॥
बिन दीये बरियाई लैहो । पुरुष लोक पुनि जाय न पैही ॥
कामिनि कहा वचन परवाना । धरमरायके भयो अभिमाना ॥
धर्मराय वचन ।
कामिनि तोरि बुद्धि है थोरी । अब ना जाऊँ पुरुषकी खोरी ॥
पुरुषलोक इहई रचि राखों । रचौ बिचारी बुद्धि बलभाखों ॥
अब तौ पुरुषत्रास नहि मोही । गहौं बाहकों राखा तोही ॥
तैं कन्या का डहकसि मोही । रचा पुरुष भम कारण तोही ॥
तैं कामिनि कठोर निरमोही । रचा पुरुष हमहीं लग तोही ॥
गजल आजिज प्रथम अध्यायका परिशिष्ट अनुराग सागरसे सृष्टिकी उत्पत्तिके प्रकरणका प्रमाण
पहिल वचन बिहरते बोली । लानी कठिन कामकी गोली ॥
काम सतावै निश दिन मोही । दे पारसकी लीलहुँ तोही ॥
अद्यावचन ।
कामिनि कहै धरम सुनु बाता । चढी कालिमा तोहरे गाता ॥
हठ निग्रह कामिनि किहु ताही । धरमराय पकरी तब बाँही ॥
गही बाँह कामिनिकी जबहीं । काम बाण घट व्यापे तबहीं ॥
धरम राष कामिनिपर कीन्हा । गहि पग सीस लील तेहि लीन्हा ॥
लीलत कामिनि सब्द उचारा । पुरुष २ करि कीन्ह पुकारा ॥
कामिनि पुरुष नाम जब लीन्हौं । आज्ञा पुरुष अंसही दीन्हौं ॥
योगजीत आये तेहि वारा । सुर्त बान सो कालहि मारा ॥
पुरुष कोप ताऊपर कीन्हौं । कन्या उगल धरम तब दीन्हा ॥
उगली कन्या बाहेर आई । देखि काल अति रोष कराई ॥
हाहाकाल रोषकरि धावा । कामिनि पारस कहाँ चोरावा ॥
कामिनी कपट देख विषधारा । पारस मानसरोवर डारा ॥
मानसरोवर झलकै अंगा । गयऊ पताल जहाँ जलरंगा ॥
परीक्षा चार पारस परवाना । उपजी चारखान निरवाना ॥
एक परीक्षाते सरबर गयउ । पारसके सम पारस ठयऊ ॥
दूजो अंश भया निरवाना । शिला सिंधु परवत परमाना ॥
रतन शिला ताहिकी धारा । सो पाजी द्वारे संचारा ॥
तीसर अंश नार प्रगटयऊ । अंशहि अंश चतुरगुन भयऊ ॥
चौथा अंश कामिनि अनुमाना । जाते स्वर्ग नरक परवाना ॥
अंशहि अंश अंशते जानी । एक प्रती चौगुन उत्पानी ॥
चार २ गुन गुनहि समाना । अंशते अंश चतुर परमाना ॥
पारस मानसरोवर माहीं । पारस बुद्धि आपही आहीं ॥
पारस कामिन बहुत दुरावे । सुरेत सनेह तहाँ फिर आवे ॥
पारस अंत नहीं ठहराई । बासरूप कामिनि संग धाई ॥
कामिन काल पुरुष पद परसे । पारष नीर नेत्र मह दरसे ॥
नैन निरख मूरत अनुरागी । धरम अंश कामिनि तन लागी ॥
पारस अंश चितै नहि डोले । बहुरि २ कामिनिस्ों बोले ॥
पारस अंश घट रहा छपाई । निकसी कन्या बाहर आई ॥
जेहि कारण कामिनी हठ कीना । पारस संग छान सो लीना ॥
सृष्टिके आदिमें क्या था
उत्पत्ति पारस धरम तब पावा । कन्या रही ताहिके ठाँवा ॥
जब लगि कन्या भई सियानी । तबलगि धरम रची सब खानी ॥
खानि वानी रचि कीन पसारा । बेदवाद बहुमत विस्तारा ॥
कबीर बचन ।
साखी-रचना रची लोककी, सब घट रहा समय ।
पुरुष नाम जानै नहीं, ताते लोक न जाय ॥
रचा रची सब लोककी, दीन्हा सबहि भुलाय ।
पुरुष नाम जाने विना, सत्य लोक नहीं जाय ॥
चौपाई ।
पुरुष नाम ज्ञानी जो पावे । लोक दीप पलमाहिं ढहावे ॥
पुरुष नाम जानै नहीं भेदा । रचे खानि चौरासी खेदा ॥
रचे बानि औ चारों वेदा । चित चंचल औ अन्ध अभेदा ॥
दुख सुख सबै रची बहु भांती । जरा मरन पूजा औ पाती ॥
रचि सब खानि बैठ अभिमानी । तब लगि पुत्री भई सयानी ॥
उपजा जोबन रसको भावा । तब कन्या कहैं विरह सतावा ॥
अद्यावचन ।
कामिनी कहे धरमसों बानी । हमतो तुमरे हाथ बिकानी ॥
सूर्त डोलायके पारस लीन्हा । मदन भुअंगमके बसि कीन्हौ ॥
जोबन विरह महामद गाजे । विनु संयोग गर्भ नहीं छाजे ॥
मोह महा झर बरषे लागी । मन समाध कामिनि सों लागी ॥
गर्भ किए मा करदी राजा । कामिन सोह दुह दिसवाजा ॥
मनसा लहर उद मद मन भएउ । काम दहन घृत आहुत दयेउ ॥
उपजा मदन माह औगाहा । पुत्री पितासों भएउ विवाहा ॥
साखी-बहनीसे बेटी भई, बेटीसों भइ नार ।
नारीसों माता भई, मनसा लहर पसार ॥
चौपाई ।
बरबस धरमराय हर लीन्हा । बिन लेखा रजधानी कीन्हा ॥
विषया वेद व्याह जमनाता । चौदह काल संघ उतपाता ॥
चौदह पारस लोक निसानी । शब्द व्याह चौदह जमहानी ॥
मनसा व्याह देव रिषिगन्धी । हंसहि हंस भगति युगबंधी ॥
सुरत हंस घट रचो विदानी । धर्म समाध बसाए आनी ॥
सृष्टिकी उत्पत्ति सत्यपुरुषकी रचना सोलह सुतका प्रगट होना
उपजा मदन मोह औगाहा । कन्या पितहि तब भया विवाहा ॥
कन्या व्याकुल भई तेंहि माहा । अतिसय मनमें उपज्यो दाहा ॥
धरम रायको उपज्यो भावा । कामिनि हिये हाथ लगावा ॥
उपजी रंग रोषकी खानी । कामिनि चरन गही तब आनी ॥
मनसा लहरि ताही के दीन्हा । उपजे तीन लोककर चीन्हा ॥
ममता शील ताहिको दीन्हा । फैली तीन लोक सो चीन्हा ॥
तीनों देवोंकी प्राकट्य ।
कामिनि संग करे सुख भारी । उपजा तीनलोक अधिकारी ॥
तीनहि सकति पुरुष संम दीन्हा । तीनों सुत उपजावे लीन्हा ॥
पांच तत्त्व तीन गुन चीन्हा । जिनते सकल पसारा कीन्हा ॥
तीनहुँ सुत उपजे बहुरंगा । पारस रहा धरमके संगा ॥
पारस रहा ताहिके संगा । ताते तीनों भये अपंगा ॥
तीनउ सुत उपजे अधिकारा । धर्मराय तब भया निरारा ॥
तीनों सुत कहँ दीन्ही भारा । धर्मराय उठि भये निनारा ॥
राजपाट कामिनि कहँ दीन्हा । आपन बास शून्य महँ लीन्हा ॥
कामिनि दरस सदा लौ लावै । राज पाट सब कीति बनावै ॥
कामिनि आपन कला फैलावे । तीनों सुतको राज सिखावे ॥
राज नीति सुत चितहि धरहीं । मनसा ध्यान पिताको करहीं ॥
खोजत खोजत बहु युग गयऊ । पिता पुत्रसों भेट न भयऊ ॥
ध्यान धरत बहुते युग गयऊ । हारि थके अंत नहि पयऊ ॥
कामिनि पुरुष एकसंग रहई । सुतकी बात पुरुष सों कहई ॥
वहांकी बात न सुतसों भाखे । करे दुलार सदा संग राखे ॥
इहिबिधिवहुतदिवस चलि गयऊ । सुत न खोज पिताकर कियऊ ॥
धरत ध्यान बहुते युग गयऊ । पिताको खोज पिता करकियऊ ॥
मातासों पूछे सुत बाता । पिता हमार कहाँ गये माता ॥
माता कहँ सुतन्हसों बानी । पिता तुम्हार हमहुँ नहि जानी ॥
रचना सकल हमहीते होई । हमसों दूसर और न कोई ॥
रचना सब मोहीते होई । दूसरा जान परो नहि कोई ॥
हमहीं पिता हमहीं हैं माता । हमहीं तीन लोककी दाता ॥
हमहीं छोंडि कोइ दूसर नाही । तुम जो पूछहुँ सो कहँ काहीं ॥
तीन लोकमहँ असर नाही । माता कपट करें मन माहीं ॥
निरंजनकी तपस्या और मान सरोवर तथा सुन्नकी प्राप्ति
तब सुत सोच कीन्ह मनमाहीं । पिताका भेद बतावत नाहीं ॥
आपु आपु कह सुत सब रुठे । माता वचन कहै सब झूठे ॥
तब माता कहै वचन रिसाई । पिताको दरश करहु तुम जाई ॥
माता कहै फूल लै धावहु । पिताको शीश परसिके आवहु ॥
पुहुप समाधि वासले धाओ । पिताके शीश परसिके आओ ॥
चले पुत्र पिताकी आसा । पिता रहे पुत्रनके पास ॥
खोजत बहुतदिवस चलि गयऊ । पिताको दरस कतहुँ नहि भयऊ ॥
तीनों सुत सो दरशन भयऊ । पिता निकट सुत दूर सिधयऊ ॥
पिता निकट सुत दूर सिधाये । खोजत कतहुँ अन्त नहि पाये ॥
खोजि थाक माता पहुँ आये । कोहु साँच कोहु झूठ सुनाये ॥
ब्रह्महि भाषा झूठ संदेसा । सकुचि वचन नहि कहो महेसा ॥
भाषा विस्नु सत्यकी रेखा । खोजी थाकि पिता नहि देखा ॥
माता बिहँसि कही तब बानी । ब्रह्मा झूँठ झूँठ तौ खानी ॥
शिव लजाय शिर नीचे राखा । सांच झूँठ एको नहि भाखा ॥
ताते करहु योग तप जाई । जटा बढ़ाय विभूति रमाई ॥
तुम सुत करो योग तप जाई । शीस जटा तन भसम चढाई ॥
लेहुआ मंडल भेषसो कीन्हौ । शिवको थापि भवानी दीन्हौ ॥
साखी—जप तप योग समै दूढ, आगे ध्यान पसार ।
माता कह्यो क्रोध करि, चतुर मुख अन्ध अहार ॥
मातहिँ कीन्ह विस्नु पर दाय । मुखहिँचूमिके कंठ लगाया ॥
सत्य वचन सुत बोलेउ बानी । तीनहुँ लोक करहु रजधानी ॥
शिव ब्रह्मा करिहँ तोर सेवा । गण गंधर्व रिषि मुनिदेवा ॥
ब्रह्मा मोसों झूँठ लगावा । तेहि कारण बिधि झूँठ कहावा ॥
ब्रह्मा वेद पढे बहु भांती । कुकरम करदिवस औ राती ॥
झूठी बात वेद निरमाई । चार वरनमें बडी बढाई ॥
पहिले चारों वरन पुजावै । दछिणा कारण गरा कटावै ॥
गरा कटाए करावै पूजा । गाय भँसमें ब्रह्म न दूजा ॥
लिये मूँड पडिवो रमाई । ब्राह्मण भये सो काल कसाई ॥
खाये अखज चले अरडाई । जस मड वाको श्वान अघाई ॥
ब्राह्मणहूको झूठी आसा । हरि नहि भजे न हरिके दासा ॥
कह कवीर ब्रह्मा कहँ रोए । उत्तम जन्म पाए जड खोए ॥
निरंजनको सृष्टि रचनाका साज मिलना
झूठी बात वेद निरमाई । चार बरन आश्रमहिं दिढाई ॥
रिषि अठासी सहस्र बखानी । ते ब्रह्माके सुत उत्पानी ॥
जेते रिषि तेते मतधारी । अस्तुति करिहैं सब तुम्हारी ॥
ब्रह्मादिय मुनि देव गण भारी । अस्तुति करिहैं विस्नु तुम्हारी ॥
निसिदिन ध्यान पिताको धरिहो । किंचित ध्यान जोत अनुसरिहो ॥
साखी-विचलि गयउ निजनामको, गहे कुमारग जानि ।
तीनलोक गुन विस्तरेऊ, निरंजन आदि भवानि ॥
कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । दोऊ मिलि यह यहमत परकासा ॥
यह सब खेल कामिनी कीन्हा । निरंजन बास शून्यभौ लीन्हा ॥
जोति निरंजन ध्यान लखाई । शिव ब्रह्माको भेद सुनाई ॥
सेवहु विस्नु निरंजन ध्याना । हेसुत वचन निश्चय मम जाना ॥
जाते ज्ञान अगम फैलैहो । जाते तामस सिद्ध कहैहो ॥
सिद्धनका मत होइहै भारी । ज्ञान अगमगुण होहि भिखारी ॥
अंश दहन तन तामस भारी । असुर भाव पशु अवतारी ॥
मत पाखंड ठगोरी टोना । षट् दरशन पाखंड सिखलोना ॥
यंत्र मंत्र विषया अधिकारी । अन्तरध्यान भगत तुव धारी ॥
तब गुण सहस्र नाम ऊचरिहैं । एक अंश चौसठ योगिन होइहैं ॥
कर खपर लें मंगल गैहैं । यहि उपदेश महादेव दैहैं ॥
शंकर चिह्न इहै सौ पैहैं । सिवको भगत तेहि लोके जैहैं ॥
रज रुचि सतगुन दया समानी । असुर हतन भक्तन रजधानी ॥
आगम कहो संघ सुनि लीन्हैउ । जहाँ जसभाव तहाँ तस कीन्हैउ ॥
चारि खानि ब्रह्मै निरमाई । चार वेद मत चार चलाई ॥
शिवको वरन भेद नहिं होई । क्रोधरूप धरि भेष विगोई ॥
माता विस्नुपर दया कीन्हौ । पिता दिखाय निकटहि दीन्हौ ॥
अनुभव दया विस्नु जब पावा । पिता दास भया सुखपावा ॥
पिताको दरस विस्नु जब पावा । तब माता कह शीश नवावा ॥
माता पिता एक ह्वै गयऊ । विस्नु देखि चित हर्षित भयऊ ॥
जोतिहि जोत एक होय गयऊ । आप भान विस्नु भुलयऊ ॥
माता पिता सुत एक भयऊ । विस्नु समाज जोतिमहँ गयऊ ॥
तेहि पाछे जग सिरजे लऊ । ताको वरन सविस्तर कहऊ ॥
प्रथमें चारि खानि निरमाई । लछ चौरासी जोनि बनाई ॥
सहजका धर्मरायके पास जाकर पुरुषकी आज्ञा सुनाना
चारि खानिकी चारिउ बानी । उपजी तीन लोक सहिदानी ॥
चारि खानि रचि कियो पसारा । चारि वरन पाषण्ड सँवारा ॥
चौदह भुवन करयो विस्तारा । चौदह जमको राज पसारा ॥
लछ चौरासी जोनी कीन्हा । चारि खानि महाँ एकहि चीन्हा ॥
लछ चौरासी बचन बखाना । चारि खानि जिव एकैसाना ॥
रचना रची स्त्रिस्ट बहु रंगा । सुर नर मुनि गये कामतरंगा ॥
कामदेवकी कला अनंगा । पशु पंछी सुर नर मुनि सँगा ॥
कामकला सबही भरमावै । शिव सकती रंग काम लगावै ॥
उत्पति प्रलय रची अविनाशी । कामिनि काम कालकी फाँसी ॥
कनक कामिनि फन्द बतावा । तेहि फंदे सबही अरुझावा ॥
कनक कामिनी फन्दा कीन्हा । चार खानिमें एकै चीन्हा ॥
नर वानर कीट पतंगा । सबके की रखवारी कर संगा ॥
नर नारि जत खान सँवारी । सब घट काम करै रखवारी ॥
पशु पंछी जत कीट पतंगा । रच्छक भच्छक सबके सँगा ॥
स्वासा सार होय गुँजारी । पांचों तत्त्व सँग विस्तारी ॥
पांचों तत्त्व तुरै बल जोरा । तापर चढे साहु औ चोरा ॥
चारिउ खानि हाय गुंजारा । स्वासा चलै अखंडित धारा ॥
देहदसा जस पुरुष सँवारा । तँसी देह रची करतारा ॥
पांच तत्त्व तीनों गुण साजा । आठ काठ पिंजरा उपराजा ॥
अष्टंगी तहाँ आप विराजे । अष्ट धातु मिलि रूप विराजे ॥
पिंजरामें सुगना एक रहई । बाकी गति मंजारी लहई ॥
सुवा सुख पिंजरा महाँ माने । तके मंजरी सो नहि जाने ॥
सुगना पढै दिवस औ राती । रछक पिंजरा ऊपर सँघाती ॥
रछक भच्छक संग रहावै । सदा पढावै घात लगावै ॥
बैठे दोऊ अपने दावा । एक घातक यक सुआ पढावा ॥
जस सुआ पिंजरा महाँ गहई । ऐसो देह प्राण दुख सहई ॥
नख शिख रचा काल फूलवारी । फूली बास कुबास सवारी ॥
कनक कामिनि काल बनाई । चारि खानि महाँ रहा समाई ॥
कामिनि काम सँवारे जानी । चारिउ खानि रहा विकशानी ॥
चारि खानि महाँ स्वास अमाना । काल कुटिल तेहि माहिँ समाना ॥
काल करमकी खानि बनाई । शिव शकती महाँ रहा समाई ॥
निरंजनका कूर्मके पास साज लेनेको जाना वहुरि पुरुषका सहजको निरंजनके निकट भेजना
दया छमाकी खान बनाई । नर नारि महँ रहा समाई ॥
सुर नर मुनि सबही कह डहकै । चारि खानि सबके घट महकै ॥
चारि खानिकी सब उत्पानी । जेतिक तीन लोक सहिदानी ॥
तीन लोक स्वासा विस्तारा । स्वासाते भा सकल पसारा ॥
स्वासा संग काल अवतारा । बिष अमृत दोनों संचारा ॥
स्वासा संगम काल औ काली । स्वासा संग भये वनमाली ॥
प्रकृत पचीस संग जंगाली । पंच पांच दश माल तमाली ॥
चन्द्र सूर स्वासा संग पूरा । इंगला पिंगला सुषमनि जोरा ॥
साखी-स्वासा सँग स्वासा, तेहिंते उपजा बरियार ।
चन्द्र सूर्य हैं स्वासामध्ये, सकल विधि विस्तार ॥
सिवसकती सुखधाम है, जो चित ज्ञानसमाय ।
सुखसागर अभिराम है, काल दगा मिट जाय ॥
इति प्रमाण श्वासगुंसजारका ।
प्रमाण अम्बूसागरका ।
देखो प्रकरण ४६ पृष्ठ. ६१
धर्मदास बचन—चौपाई ।
धर्मदास टेके गुरु चरण । अगम कथा भाषेउ प्रभु वरणा ॥
बहुतक ग्रन्थ सुनायउ काना । अम्बूसागर ग्रन्थ बखाना ॥
मुनि हितबचन मोहिं प्रियलागा । चातक स्वाति पायजिमि पागा ॥
जुग अनुमान कहो मोहिं भाषी । और शब्द कहँ चित अभिलाषी ॥
सतगुरु बचन—चौपाई ।
धरदास मैं भाषि सुनाऊँ । आदि अरु अंत प्रसंग बताऊँ ॥
जा दिन पुरुष बोल अनुसार । एक सबद ते कीन्ह पसारा ॥
वानीते माया उत्पानी । तीन पुत्र तिन कीन्ह ठानी ॥
ब्रह्मा विस्तु महेशर कीन्हा । तीन लोक तिहु पुत्रन्ह दीन्हा ॥
ब्रह्मा हाथ चार दिय वेदा । तीन लोक महँ करत निखेदा ॥
नेम धरम अरु सकल पुराना । यह ब्रह्मा सब कीन्ह बखाना ॥
विस्तु देव मृत्यु लोकहि आये । तुलसी माला पंथ चलाये ॥
माला गले संखिनी डारा । तीन लोक महँ है बड भारा ॥
राजा प्रजा सेव सब करई । बिस्तु इष्ट सुमिरण मन धरई ॥
सेवत आये भये अनुरागी । करत सँहार कहत हम त्यागी ॥
सहजका निरंजनके निकट पहुँचना
जार वारि तन कष्ट कराई । जोग पन्थ यहि भौति चलाई ॥
जोगी जती तपी संन्यासी । आपन मुख कह हम अविनासी ॥
सिव महिमा भाषत संसारा । दछिन दिसि महिमा अधिकारा ॥
तीन पुत्र तिहुँ लोक सपूता । माता सों इन कीन्ही धूता ॥
माया कहँ माने नहि कोई । आपहि आप कहावे सोई ॥
अर्घा लीला ।
तब अद्या मन कीन्ह विचारा । तीन पुत्र ये सिरजनहारा ॥
माया मन झंखे बहु वारा । तीनों पुत्र भये बरियारा ॥
नाम हमार दीन्ह छियाई । तीन लोकमहँ अदल चलाई ॥
तब अद्याघट सुमिरन लायी । आपन माहि आप निरमायी ॥
देवी आपनो मथ्यो सरीरू । शकती तीन उपजी बल वीरू ॥
तिनका नाम कहँ समझाई । रम्भा सुचिल रेणुका आई ॥
इन हिलिल मिलि गन गंध्रव मोहा । राग रागिनी बहुविधि सोहा ॥
कर आभूषण गंध्रव लीन्हे । सकल साज तिन हाथन दीन्हे ॥
तिनका नाम कहँ समझाई । वीन रखाव तमूरा लाई ॥
सितार कमायच अरु मुहचंगा । ताल मृदंग नफीरी संगा ॥
जलतरंग मुरली किकिन । मौहर उपंग मंडल स्वर तितिन ॥
बाजे और छतीसों कहिया । गन्ध्रव हाथ साथ सब लहिया ॥
मास महीना फागुन सोई । ऋतु बसन्त गावें नर लोई ॥
टेसू वनस्पती सब फूले । अम्बा मौर डार सब झूले ॥
चात्रिक धारहि बचन सुहावन । हंस कोकिला कोयल पावन ॥
पिउ पिउ चात्रिक प्रिय कहहीं । विरहिनि लाग मदन दुख जरहीं ॥
अंग अबीर गुलाल चढ़ाये । नाना भांतिन अतर लगाये ॥
कामिनि हेतु काम लव लाये । अंग अनंग बहुत विधि छाये ॥
या चरित्र माया उपराजा । तीनहुँ लोक राग बल गाजा ॥
जो सुन राग विषय मन धरहीं । बार बारते जम घर परहीं ॥
अविगत मोह राग रे भाई । राग सुनत जिव गै डहकाई ॥
माया धुनि रागनको बांधा । जासे तीन लोक घर सांधा ॥
प्रथमहि राग षष्ठ विधि गावा । तिन रागन का नाम सुनावा ॥
रागोंके नाम ।
भैरों और हिंडोल अति, माल कोस पुनि जान ।
दीपक मेघ मलार भल, कीन्ह देव पहिचान ॥
आद्याकी उत्पत्ति सत्यपुरुषका आद्याको मूल बीज देना पुनि पुरुषका निरंजनके ढिग जाना
चौपाई ।
कीन्ह उचार राग तेहि वारा । ऋषिमुनि मोह देव सब झारा ॥
माया डारी सब पर फांसी । योगी जती तपी संन्यासी ॥
ततछन देवि रची धमारा । इकसठ रागिनी तहां उचारा ॥
तेहि रागिनिके नाम सुनाऊँ । भिन्न भिन्न कर प्रगट बताऊँ ॥
इकसठ रागिनियोंके नाम ।
१ धनाश्री २ जंतश्री ३ मालश्री ४ श्री ५ गुजरी ६ विरावरी ७ आशावरी
८ जंतसारी ९ गन्धारी १० वरारी ११ सिन्धूरी १२ पञ्चश्री १३ गौरी १४
जौनपुरी १५ विहागरा १६ कान्हरा १७ केदारा १८ मारू १९ मलार २०
धूरिया मलार २१ गोडमलार २२ गडमलार २३ भूपाली २४ सुरकली २५
श्रीमाल २६ धूरकली २७ रासकली २८ रूपकली २९ गुनकली ३० सुहेली
३१ मोरबी ३२ पूर्वी ३३ कैंरबी ३४ भैंरबी ३५ कान्हरा ३६ तिल्लाना ३७
कल्यान ३८ यमन ३९ कल्यानी ४० सजीवनी ४१ सैधू ४२ मधुगन्ध ४३ सावन्त
४४ ललित ४५ सोरठ ४६ मरहठी ४७ टोडी ४८ नट ४९ गोड ५० विभास
५१ सुदेस ५२ सूहा ५३ परज ५४ काफी ५५ चन्द ५६ सुधराय जैजैवन्ती ५७
चर नायका ५७ सारंग ५९ बंगला ६० नायका ६१ खम्माच ॥
चौपाई ।
मोहे ब्रह्मा विस्तु महेशा । नारद सारद और गनेसा ॥
संकर जग महँ बड अवधूता । काम जाति होय रहे सपूता ॥
कहैवा भूल गये अनुरागी । काम विरह तन उठ उठजागी ॥
मदन अनुप राग है भाई । सत पुरुष सों विछुरन लाई ॥
सुरपति सनकादिक मुनि जेते । काम कला सब नाचे तेते ॥
देखत छबि मोहे सब झारी । सुर समान माया गहि मारी ॥
सकल देव जब गे अकुलाई । काहू कर मन थिर न रहाई ॥
बूझो पंडित सुर मुनि ज्ञानी । जा महिमा तुम करत बखानी ॥
वेद पुरान भागवत गीता । पढ़ि गुनि कहैं काल हम जीता ॥
तीनों गुन ईश्वर ठहरायी । माया फन्दा ताहि बनायी ॥
कैसे ताहि होय निस्तारा । जिन नहि माना सबद हमारा ॥
राघवानन्द नाम युग केरा । माया चरित कीन्ह तेहि बेरा ॥
तेहि दिन राग कीन्ह उचारा । सकल जीव इमि मार पछारा ॥
अब हंसन का भाषू लेखा । धरमदास चित करो विवेखा ॥
निरंजनका मानसरोवरमें आद्याको पाकर मोहवश हो उसे निगलजाना और सत्यपुरुषका शाप पाना पुरुषका शाप निरंजन प्रति
छन्द—ताहि जुग हम आय जीवन दीन्ह अग्नित पान हो ।
सहस सात उबारि जीवन जाय लोक समान हो ॥
पुरुष दर्शन कीन्ह ततछन रूप अविचल पाइआ ।
पुहुप सज्या वास कराइ फल अमृत ताहि चखाइआ ॥
सोरठा—तुम बूझहु धर्मदास, जुग जुग लेखा भाषेऊँ ॥
चीन्हे कोइ इक दास, जेहि सत गुरु दाया करें ॥
इति प्रमाण श्रीअम्बुसागरका ।
इति श्रीकबीर मन्शूर के प्रथमभागके प्रथम अध्यायका परिशिष्ट समाप्त ।
कबीर मन्शूर प्रथमभाग ।
द्वितीय अध्याय प्रारम्भः ।
प्रथम प्रकरण ।
कबीर साहबके प्राकट्यका उपक्रम ।
जैसा पूर्व प्रथम अध्यायमें वर्णन हो चुका है । निरञ्जन, अद्या, ब्रह्मा, विष्णु, शिव पाँचोंने मिलकर ख्रिस्टिका निर्मान कर लिया । फिर अपना राज्य स्थायी बनानेके लिये निरञ्जन भगवान्की इच्छानुसार जो सहस्रों धर्म पृथ्वीपर प्रचलित हुए, होते जाते हैं और भविष्यत्में होवेंगे सो सब अलख निरञ्जनकी ओरसे उन समस्त धर्मोंके निर्माणकर्ता तथा रचयिता विष्णु महाराज हैं, विष्णु, ब्रह्मा और शिव, सनकादिकर्तृषि मुनि मिलकर उनका प्रचार करते हैं, कितनेही थोडे और कितने बहुत कालतक प्रचलित रहते हैं फिर छिप जाते हैं, मनुष्य उसका अनुसरण करते हैं किन्तु उनको कुछ प्राप्त नहीं होता, उनसे हार्दिक कामना कदापि पूर्ण नहीं होती, सब बिफल मनोरथही रह जाते हैं । कालपुरुषने सब जीवोंको अपने जालमें फँसा लिया है, कोई जीव उसके चंगुलसे बाहर जाने नहीं पाता है । असंख्य युग इसी अंधकारमें बीत गये । कालपुरुषने सत्य पुरुषका नाम बिलकुल छुपा दिया । मनुष्योंको तनिकभी सुध नहीं रही कि, कालपुरुष कौन है और सत्य पुरुष कौन है ? इस बातसे वे पूर्णतया अनभिज्ञ
१ परिशिष्ट-इस ग्रन्थके अनुवाद कबीराश्रमाचार्य स्वामी श्रीयुगलानन्द बिहारीने ग्रन्थोसे संग्रहकर यहाँ आयोजित किया है ।
रहे । अद्या निरञ्जन तथा तीनों देवताओंने सबको अंधा कर दिया और काल निरञ्जन सदैव सबको भून भूनकर खाने लगे, कोई पथ तथा कोई युक्ति मनुष्यको भागनेकी नहीं मिलती, मनुष्योंका यह कष्ट और दुःख देखकर और उनकी रोलार्डि सुनकर सत्यपुरुष दयालु हुए और ज्ञानीजीको बुलाकर कहा कि, ज्ञानीजी । मृत्युलोक जाओ, क्यों कि, कालपुरुष समस्त जीवों को नितान्त ही कष्ट पहुँचा रहा है कोई मनुष्य मेरे लोकको आने नहीं पाता है, कालपुरुषने सबको फँसा लिया है । तुम जाकर मनुष्योंको उनकी नींदसे जगाओ और सत्य भक्तिमें लगाकर मेरे लोकमें ले आओ । जो कोई आपकी आज्ञाको स्वीकार करे उसको कालपुरुषके पंजेसे छुड़ाओ । सत्यपुरुषने जब ऐसी आज्ञा दी तब ज्ञानीजी सत्यपुरुषको प्रणाम करके सत्यलोकसे बिदा हुए और मृत्युलोककी ओर जीवोंकी रक्षाके लिये रवाना हुए ।
दूसरा प्रकरण
कबीर साहबका झाँझरी द्वीपमें आनेका वृत्तान्त ।
अद्या और निरञ्जन सत्यपुरुषका नाम छिपाकर तीनों लोकोंका राज्य करने लगे, सत्यपुरुषका पता अपने तीनों पुत्रोंको भी नहीं दिया, निरञ्जनने अपनी राजधानी झाँझरी द्वीपमें स्थिर की, जो सत्यलोकको चलनेपर भवसागरका पहला नाका है । ज्ञानीजी झाँझरी द्वीपमें आये और सत्यनामकी हँक लगायी, तब धर्मराय घमंडके साथ बोला कि, तुम कौन हो और कहाँसे आये और किस कारण आये हो, यहाँ तुम्हारा क्या काम है ? यह बात सुनकर ज्ञानीजीने उत्तर दिया कि, मेरा नाम ज्ञानी है, मैं सत्यपुरुषका अंश योगजीत हूँ और सत्यपुरुषकी आज्ञासे पृथ्वीपर जाकर मनुष्योंको मुबत कराऊँगा, कारण यह कि तुमने समस्त जीवोंको दुःख पहुँचाया और सत्यपुरुषके नामको छिपा दिया है, और मुक्तिमार्गके समस्त द्वार रोककर मनुष्योंको धोखा देकर धूर्ततासे मार लिया है । कोई मनुष्य नहीं जानता कि, मुक्तिमार्ग कौन है ? और किस-प्रकार हमारा बचाव हो ?
तीसरा प्रकरण ।
निरञ्जन और ज्ञानीजीका वार्तालाप ।
इतना सुनकर धर्मराज अत्यंत क्रुद्ध होकर कहने लगे कि, हे ज्ञानीजी ! सत्यपुरुषने तो मुझको तीनों लोकोंका राज्य प्रदान कर दिया, इसमें तुम्हारे
सत्यपुरुषका योगजीतजीको निरंजनके पास उसे मान सरोबरसे निकाल देनेकी आज्ञा देकर भेजना भवसागरकी रचना
हस्तक्षेप करनेकी क्या आवश्यकता है ? मैंने उसकी सेवा की और उसने मुझको राज्य प्रदान किया । तुम जीवोंको मुक्ति देने क्यों जाते हो ? तुमको क्या पड़ी है कि, मेरे राज्यमें बाधा उपस्थित करो । मैं तुमको मारूँगा, तुम बड़े समय पर आगये हो, देखूँगा अब तुम मुझसे किस प्रकार बचकर जा सकते हो ? यह कहकर धर्मराजने अपने अनन्त रूप बनाये और अत्यंत क्रुद्ध हो झुंझलाकर ज्ञानीजीके सामने आकर लड़नेके निमित्त प्रस्तुत हुआ ।
चौथा प्रकरण ।
ज्ञानी और निरंजनका युद्ध ।
(काल पुरुष और ज्ञानीजीके युद्धका वृत्तान्त)
काल निरञ्जन बड़े मस्त हाथीका स्वरूप धारण करके योगजीतके सामने आया और अपना दाँत मारा, तब आपने उसका सूँड पकड़कर उसपर एक ऐसा झटका दिया कि, वह दूर जाकर गिर पड़ा और अचेत हो गया, इस आघातसे उसे बहुत चोट लगी और उसका मस्तक नीला हो गया । जब अपने प्राणका भय देखकर धर्मराय पातालको भाग चला, तब योगजीतजीने उसका पीछा किया, उधर निरञ्जन भागकर कूर्मजीके पास गया और कहा कि, हे कूर्मजी ! मुझको तो योगजीतजीने मारकर भगा दिया, आप मुझको अपनी शरणमें रखो, मुझको सत्यपुरुषने तीनों लोकों का राज्य प्रदान किया था, सो योगजीतजीने मुझको मारकर निकाल दिया और मनुष्यकी मुक्ति करके सत्य-लोकको लेजाना चाहते हैं ।
नञ्जम ( उर्दू कविता ) ।
जब वह पीलमस्तानः आया वज्रज्ञ । वह खरतूम फटकारता वेदरञ्ज्ज् ॥
जगदीश आली न पहुँचान है । कि बाहरवयां शौकतो शान है ॥
कि आदममलिक जिसकी गातेहै गीत । सोई आप साहबं सोई योगजीत ॥
कयासो गुमां ब्रह्म है पाय लुंग । पड़े गार लाइलम तारीको तंग ॥
सकें कौन पहुँचान बह पाकजात । बयां वेद बानीसे बाहर सिफ़ात ॥
जिसे महकुर कुदशनासी बता । उसीकी करमसे सो पावे पता ॥
चला सामने उसके वह दू बहू । जहाँमें कोई न जिसका अदू ॥
हुवा कैल आमादः पैकारको । न माना न जरना जहाँदार को ॥
लगाया तमाचा पकड़ सुण्डको । परीशां किया पीलके झुण्डको ॥
सिन्धु मंथन और चौदह रत्न उत्पत्ति
पड़ा दूर तब काल बेताब हो । कि जोंनीलफर खुशक बेआब हो ॥
रही ताबो ताकत न कत्तालको । चला भाग तब काल पत्तालको ॥
जवामर्दगें जब न ताकत रही । दिया छोड तब तख्त शाहंशही ॥
रही बाकी जब और कोई न राह । लिया जाके तब कूर्मजीकी पनाह ॥
जब काल पुरुषने भागकर कूर्मजीकी शरण ली, तब कबीरसाहब उसका पीछा करते हुए पाताल लोकको गये आपको देखकर कूर्मजी खड़े हो गये और निवेदन करने लगे कि, आप कौन हो और कहाँसे आये हो ? तब कबीरसाहबने कहा कि, मेरा नाम ज्ञानी है, और मैं सत्यपुरुषकी आज्ञासे मनुष्योंकी मुक्तिके लिये भवसागरमें जाता हूँ । यह बात सुनकर धर्मराजजी बोले कि, 'ज्ञानीजी महाराज ! मेरी बात सुनो और अपने मनमें विचार करो कि, मैंने सत्तर युग-तक एक चरणसे खड़ेहोकर बन्दना की, तब सत्यपुरुषने दयालु होकर मुझको तीन लोकका राज्य प्रदान किया और अब उसके विरुद्ध अज्ञा कब्रों दिया ? सत्यपुरुषकी समस्त सन्तान अपने अपने राज्यमें अधिकार भोग रही है । मेरेही ऊपर आप क्यों रुष्ट हुए ? आपकी जैसी आज्ञा हो मैं उसको करूँ ।
इस बातपर कुर्मजीभी हाथ बांधकर कहने लगे कि, हे ज्ञानीजी महाराज ! मैं आपसे निवेदन करता हूँ यदि आप स्वीकार करें और हे निरञ्जन महाराज ! जो आप भी स्वीकार करें तो मैं कहूँ । तब दोनोंने अपनी स्वीकृति प्रकट की तब कूर्मजीने कहा कि, "जो कोई ज्ञानिजीका, पान पावे और उनका आज्ञाकारी हो उसको निरञ्जन किसी प्रकारका बाधा न देवे, इसके अतिरिक्त जितने जीव हैं वे सब कालपुरुषके फंदमें पड़ेंगे" इस बातपर ज्ञानी तथा कैल दोनों सहमत हुए, फिर निरञ्जनजी अपनी राजधानी झांझरी द्वीपको गये और कबीर साहब भी उनके साथ आये ।
पाँचवाँ प्रकरण ।
ज्ञानीजी (कबीर साहब) और धर्मराजका वार्तालाप ।
धर्मराजने कबीर साहबसे निवेदन किया कि, सत्यपुरुषने तो मुझको तीनों लोकोंका राज्य प्रदान किया है आपभी कृपाकर मुझको यह प्रदान करोगे तो बड़ी दया होगी और मेरा कार्य पूर्ण होगा, तब कबीर साहबने कहा कि, ऐ धर्मराज ! मैं सत्यपुरुषकी आज्ञासे आया हूँ और मनुष्योंकी मुक्ति करूँगा, यदि तुम इस बेर मेरी आज्ञा न मानोगे तो मैं तुमको मारकर निकाल दूँगा । तब निरञ्जनजी अत्यंत नम्रतापूर्वक निवेदन करने लगे कि, मैं आपका सेवक हूँ
द्वितीय तृतीय बार सिन्धुमंथन
आप किसी अन्य ध्यानको मनमें आने न दीजिये और ऐसा न कीजिये कि, जिसमें मेरा काम बिगड़े; आप यह भी सुन लीजिये कि, यदि आप पृथ्वीपर जावेंगे तो कोई मनुष्य आपका कहना न मानेंगे, बरन् आपको तुच्छ बनानेका उद्योग करेंगे और मेरी ओर होकर आपसे वादविवाद तथा बँर करेंगे।
छठी प्रकरण ।
निरञ्जनके जालका वर्णन ।
मैंने समस्त मनुष्योंकी बुद्धि पर परदा डाल दिया है और सबको अचेत कर, दिया है, मैंने सब मनुष्योंके फँसानेके लिये ऐसे ऐसे जाल रच रखे हैं कि, 'इन्होंने' समस्त मनुष्य फँसे हुए हैं। वेद, शास्त्र, तीर्थ, व्रत मूर्तिपूजा, यंत्र, मंत्र हवन यज्ञ, आचार, बलिदान, मांसभक्षण, मदिरापान, परस्त्रीगमन आदि सहस्रों प्रकारके फँदे मैंने बनाये हैं, इनसे बचकर कोई मनुष्य निकल नहीं सकता है। और मेरे तीनों पुत्र भी बड़े शूरवीर हैं, वे तीनों लोकोंके सरदार हैं। यदि आप पृथ्वीपर जाओगे तो आपकी बातको कोई नहीं मानेगा, मैंने समस्त मनुष्य की बुद्धिको अंधेरे कुएँमें डालदी है, प्रत्येकके हृदयमें मेरा स्थान है, सदाकाल सब स्थानोंमें मैं उपस्थित रहता हूँ, किसीकी सामर्थ्य नहीं है कि मेरी सेवासे बाहर जासके, जब जैसा मैं चाहता हूँ तब तैसा मनुष्यकी बुद्धिको फेर देता हूँ, समस्त जीवोंकी बुद्धि मेरे अधीन है।
निरञ्जनकी बात सुनकर कबीर साहबने उत्तर दिया कि, हे काल बटमार। जिस जीवको मैं अपना शब्द सुनाऊँगा उसके ऊपर तुम्हारा कुछ बश नहीं चलेगा, मैं तुम्हारे समस्त फंदोंसे उसको स्वतंत्र कर दूँगा तुम्हारा बल तथा मंत्र उसपर व्यर्थ हो जायगा। फिर निरञ्जनने कहा कि, पृथ्वीपर आप एक पंथ प्रचलित करोगे तो मैं अनेक पंथ चलाऊँगा और वह समस्त धर्म आपके धर्मकी नकल करेंगे, कितने धर्म ऐसे होंगे कि, जो प्रत्यक्षमें तो आपके धर्म कहलावेंगे और यथार्थमें उस धर्मके माननेवाले सब मेरे दास होंगे।
यह बात सुनकर ज्ञानीजीने कहा कि, जो कोई मेरा नाम लेगा और मेरी भक्ति करेगा मैं उसको अपने निजके हँसोंके साथ अपने लोक को पहुँचाऊँगा, तेरी तदबीर और तेरी धूर्तता काम न देगी ॥
आद्याका तीनों पुत्रोंको सृष्टि रचनेकी आज्ञा और पांच खानकी उत्पत्ति
सातवाँ प्रकरण ।
निरञ्जनका कबीर साहबसे वरदान माँगना ।
जब काल निरञ्जन जान लिया कि, ज्ञानीजीसे पार पाना टेढ़ी खीर है, तब वह बड़ी दीनतासे विनय करने लगा कि, एकवचन आप मुझको दीजिये, । तब ज्ञानीजीने कहा कि, माँगो ? तब निरंजनने कहा कि, तीन युग अर्थात् सत्य-युग, त्रेता और द्वापरमें थोड़े जीव मुक्ति पावें, पर कलियुगमें विशेष जीव मुक्ति पावें । यह वचन आप मुझको दीजिये, तब पृथ्वीपर पधारिये । यह बात सुनकर कबीर साहबने कहा कि ऐ काल ठग ! तू मुझको ठगा चाहता है कि, तीनों युगोंमें थोड़े जीव मुक्ति पावें, अस्तु ! जो कुछ तूने माँगा मैंने तुझको प्रदान कर दिया, पर जब चौथा कलियुग आवेगा, तब पृथ्वीपर मैं अपने अंगोंको भेजूंगा कि, वे बड़ी धूम धामसे मेरा पंथ प्रचलित करेंगे और इस तरह अरबों खरबों जीवोंको अपने लोकको पहुँचाऊँगा वे सब तेरे कपटजालसे छुटकारा पावेंगे । फिर निरंजनने निवेदन किया कि, जब कलियुगमें मेरा अवतार होगा और मेरा नाम जगन्नाथ होगा, उस समय समुद्र मेरा मन्दिर तोड़ दिया करेगा, तब आप कृपा करके मेरे मन्दिरकी स्थापना करा देवें और समुद्रको स्थिर कर देवें । ज्ञानीजीने यह बात भी उसकी मानली । फिर निरंजनने निवेदन किया, आप अपना शरीर भी मुझको प्रदान कीजिये, फिर ज्ञानीजीने धर्मराजको शिरवाली देह भी दिया । इसी कारण यह कालपुरुष जब चाहे तब शिरवाली और जब इच्छा हो बेशिरकी देह प्रगट कर सकता है नहीं तो यथार्थ में कालपुरुषका शरीर बिना मस्तकका है और कबीरसाहबका शरीर शिर सहित है ।
आठवाँ प्रकरण ।
छाया (विराट्) पुरुषका वृत्तांत ।
इस विषयको साध लोग भली भाँति जानते हैं, जो विराट् पुरुषकी साधना किया करते हैं, वे स्पष्ट रूपसे विराट् पुरुषको आकाशमें देखते हैं । जो सदैव इस बातपर दृष्टि रखते हैं, उन्हें सदैव वह विराट् पुरुष आकाशमें दिखलाई देता है, जब छः मास उनकी मृत्युके रह जाते हैं उस समय विराट् पुरुष उनको बिना मस्तकके दिखाई देता है । तब साधु जान लेते हैं कि, उनकी मृत्युमें छः मास शेष बचे हैं । कारण यह कि, कालपुरुषने अपनी प्राकृतिक शरीरको अब दिखलाया है । उस समयसे साधु चैतन्य और चौकस हो जाते हैं और जब मृत्युका दिवस तथा समय ठीक आन पहुँचता है, तब प्राणायाम करके समाधि
लगा जाते हैं और अपने प्राणको खींचकर वशवें द्वार पर पहुँचा देते हैं, वहाँ पर कालकी पहुँच नहीं होती। वे जाने रहते हैं कि, कितने समय पर्यन्त मृत्युका आक्रमण है, उतनी देरतक प्राणको नीचे नहीं उतारते और जब मृत्युका समय जाता रहता है और काल निराश होकर पलट जाता है, तब फिर अपने प्राणको नीचे उतारते और फिर प्रसन्नतापूर्वक निर्भय होकर जीवन व्यतीत करते हैं। इसी प्रकार साधु लोग मृत्युसे बचते हैं और काया कल्प करके बुढ़ापे तथा निर्वलताको दूर करते हैं।
नवों प्रकरण ।
निरञ्जनका ज्ञानीजीकी अधीनता स्वीकार करना ।
इसी प्रकार निरञ्जनने बहुत कुछ माँगा और कबीरसाहबने उसको दिया तब धर्मराजने उठकर कबीरसाहबको दंडवत् प्रणाम करके कहा कि, जो जो मनुष्य आपका आज्ञाकारी होगा और आपकी भक्ति और स्तुति करेगा तथा आपका पान पावेगा उसके समीप मैं कदापि नहीं जाऊँगा, शेष लोक तथा वेदके सब जीव मेरे अधीन रहेंगे, इसके अतिरिक्त कितनी बातें हुईं सो यहाँ थोड़ासा लिखा है। धर्मराजने अपने लोकमें रहे और कबीर साहब पृथ्वीको चले, जब आप पहले पृथ्वीपर आये उस समय सत्ययुगका समय था।
यहाँ पाठकोंकी आसानीके लिये निरञ्जनगोष्ठी दे दिया जाता है—
निरंजन गोष्ठी ।
अर्थात् सत्य लोकसे जीवोंको बचानेके लिये ज्ञानीजी (कबीर साहब) का पृथ्वीपर आते समय निरंजनसे बातलाप ।
ज्ञानी वचन ।
काल निरंजन निरगुनराई । तीन लोक जिहि फिरी दुहार्ई ॥
सात दीप पृथ्वी नौ खण्डा । सप्त पताल इक्कीस ब्रह्मण्डा ॥
सहज सुन्नमें कीन्ह ठिकाना । काल निरंजन सबहीने माना ॥
ब्रह्मा विस्तु और सिव देवा । सब मिल करें कालकी सेवा ॥
चित्रगुप्त धरम बरियारा । लिखनी लिखें सकल संसारा ॥
चौरासी लाख अरु चारों खानी । लिखनी लिखे सकल सब जानी ॥
पसु पंछी जल थल विस्तारा । वन परवत जल जीव विचारा ॥
काल निरंजन सबपर छाया । पुरुष नामको चिह्न मिटाया ॥
सत्तर युग ऐसेही चल गयेऊ । पुरुष शब्द एक चितमें ठयेऊ ॥
ब्रह्माका पिताकी खोजको जाना
पुरुष वचन ।
तबहीं पुरुष ज्ञानीसों कहेऊ । धर्मराय अतिप्रबल जो भयेऊ ॥
यह तो अंश भया बरियांरा । तीनलोक जिव कीन्ह अहारा ॥
ताहि मारकै देव उठाई । जग जीवनको लेव छुड़ाई ॥
ज्ञानी वचन ।
साखी—करि परनाम ज्ञानी चले, करन हंसके काज ।
जोपै काल न मानि है, तुम्ही पुरुषका लाज ॥
मान सरोवर ज्ञानी आये । काल कठिन तब छेका धाये ॥
काल कठिन गरजे बहु बारा । मस्तक साठ सँड बरियांरा ॥
सत्तर योजन गजके दंता । परलय कीन्हो काट अनंता ॥
काग एक आँखे चौरासी । औसुख आठ हाथ लिये फांसी ॥
छत्तीस नाम ताहि पुनि जानी । बोले वचन बहुत इतरानी ॥
तीन दंत पाछेको फेरी । यहि विधि तीनलोक किये जेरी ॥
एक दंत पाताल चलावा । तहां जाय वासुकको खावा ॥
दूजो दंत पृथ्वी चलि आये । देव रिषि जग दैत्यन खाये ॥
तीजो दन्त गयो आकासा । चंद्र सूर खायो कैलासा ॥
ब्रह्मा वेद पढत तहां आये । शंकर ध्यान करत तब खाये ॥
लीन्हें खाय विस्तुको धाई । सकल खाय पुनि धूर उड़ाई ॥
गरजे दन्त अग्नि सम भाई । तीन लोक खाई दुनियाई ॥
ज्ञानीवचन ।
ज्ञानी देखे द्विस्टि पसारा । यातें नाहिं बचे संसारा ॥
ज्ञानी बोले शब्द बरियाई । तूँही काल खाइ दुनियाई ॥
निरञ्जनवचन ।
सा०—जाहु ज्ञानी घर आपने, मानों वचन हमार ।
तीन लीक पुरुषहिं दिये, स्वर्ग पताल संसार ॥
ज्ञानीवचन ।
मुहि जो पठयो पुरुषको, करन हंसके काज ।
कालहि मार संहारि हों, दीन्ह सकल मोहे साज ॥
बोले ज्ञानी सब्द अपारा । मोकहैं दीन्ह पुरुष टकनसारा ॥
मारों काल शब्दका झारा । टूटे दन्त न करै पसारा ॥