कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 188, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति पारस धरम तब पावा । कन्या रही ताहिके ठाँवा ॥
जब लगि कन्या भई सियानी । तबलगि धरम रची सब खानी ॥
खानि वानी रचि कीन पसारा । बेदवाद बहुमत विस्तारा ॥
कबीर बचन ।
साखी-रचना रची लोककी, सब घट रहा समय ।
पुरुष नाम जानै नहीं, ताते लोक न जाय ॥
रचा रची सब लोककी, दीन्हा सबहि भुलाय ।
पुरुष नाम जाने विना, सत्य लोक नहीं जाय ॥
चौपाई ।
पुरुष नाम ज्ञानी जो पावे । लोक दीप पलमाहिं ढहावे ॥
पुरुष नाम जानै नहीं भेदा । रचे खानि चौरासी खेदा ॥
रचे बानि औ चारों वेदा । चित चंचल औ अन्ध अभेदा ॥
दुख सुख सबै रची बहु भांती । जरा मरन पूजा औ पाती ॥
रचि सब खानि बैठ अभिमानी । तब लगि पुत्री भई सयानी ॥
उपजा जोबन रसको भावा । तब कन्या कहैं विरह सतावा ॥
अद्यावचन ।
कामिनी कहे धरमसों बानी । हमतो तुमरे हाथ बिकानी ॥
सूर्त डोलायके पारस लीन्हा । मदन भुअंगमके बसि कीन्हौ ॥
जोबन विरह महामद गाजे । विनु संयोग गर्भ नहीं छाजे ॥
मोह महा झर बरषे लागी । मन समाध कामिनि सों लागी ॥
गर्भ किए मा करदी राजा । कामिन सोह दुह दिसवाजा ॥
मनसा लहर उद मद मन भएउ । काम दहन घृत आहुत दयेउ ॥
उपजा मदन माह औगाहा । पुत्री पितासों भएउ विवाहा ॥
साखी-बहनीसे बेटी भई, बेटीसों भइ नार ।
नारीसों माता भई, मनसा लहर पसार ॥
चौपाई ।
बरबस धरमराय हर लीन्हा । बिन लेखा रजधानी कीन्हा ॥
विषया वेद व्याह जमनाता । चौदह काल संघ उतपाता ॥
चौदह पारस लोक निसानी । शब्द व्याह चौदह जमहानी ॥
मनसा व्याह देव रिषिगन्धी । हंसहि हंस भगति युगबंधी ॥
सुरत हंस घट रचो विदानी । धर्म समाध बसाए आनी ॥