कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 178, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंआगेकी उत्पत्ति ।
प्रथम श्वासकी निकसी खानी । उपजे सुक्रित सीतल बानी ॥
निमिष नेह प्रसन्न सुर धारे । नाम मूल टकसार उचारे ॥
भो बिस्तार निमष गड़ छूटी । दुह चित मूल अवस्था लूटी ॥
मूल गुप्त मस्तक नहिं देखा । आदि नाम अमर घर लेखा ॥
पेड़के गहे मूल धुन जागा । सोई मूल फूल फल लागा ॥
पेड़हिं गहे मूल और साखा । मूल मिले तर्वाहिं रस नाखा ॥
गुप्त मूलते प्रगटी साखा । पल्लव मूल पेड़ गहिं राखा ॥
पेड़ देखि पल्लव फँलावै । पल्लव फँल अंत नहिं पावै ॥
पल्लव चढे पेड़ चित राखा । मिले मूल तब फल रस चाखा ॥
आदि अन्त दुइ पेड़ समाना । आपहिं राख आप पहिचाना ॥
जागी सुरति पुनि पेड़ निहारा । फल रस चाख बीज गहिं डारा ॥
बीजहिं ते सो फल होई । फल रस लेइ मूल तजि छोई ॥
जागि सुरति सपन मिटि गयऊ । दुई चित मेटि एकचित भयऊ ॥
दूजे स्वासा प्रभुकी देहा । उपजे सहज समाधि सनेहा ॥
तिसरे स्वासा फूल सनेही । जाते भई हमारी देही ॥
स्वास सार संग गुप्त सनेही । देही माँही रहे विदेही ॥
काया अविहर अविहर वासा । सोई परगट गुप्त निवासा ॥
कायामे काया रहिवासा । तब चौथे स्वासा परकासा ॥
चौथे स्वासा निकरे चाहा । तब चिता उपजी मनमाहा ॥
चिता प्रकट भई दिल जबहीं । आपते आप भूलाने तबहीं ॥
आपु शरीर आपु तब झाँका । विमल प्रकाश उदित तनताका ॥
कायारूप भई उजियारी । निरमल देह विमल तन भारी ॥
विमल प्रकाश किरन जब देखा । बरतन बनै न तनको लेखा ॥
विमल प्रकाश किरन जब फँला । का बरने कोई ताकर सैला ॥
कला अनंत अंत नहिं पावा । बरतन जिह्वा लच्छ न आवा ॥
देखत रूप लीला अधिकारी । आप अपन पौ कीन्ह बिचारी ॥
कमल करी महँ भा उजियारा । देखा आदि अंत विस्तारा ॥
आपु बरन सब देखा जबहीं । दुबिधा रूप झाँइ भइ तबहीं ॥
कमल झांक प्रभु देखा जबहीं । हमर रूप को दोसर अबहीं ॥
इतना कहत बार नहिं लाये । निकसि कमलते बाहर आये ॥
छाड़ि कमल प्रभु भये निनारा । तबहीं कमल भया अंधियारा ॥