भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 209

मारेउ शब्द पांव कर पेली । तोर सूँढ समुद्र गहि मेली ॥
पुरुषरूप तबहीं पुन धारा । जौन सरूप काल औतारा ॥

निरंजन बचन ।

भया अधीन दोई कर जोरी । तुम सतपुरुष सरन हम तोरी ॥
तुमसों बाल बुद्धि हम धारा । अब तुम करहु मोर उद्धार ॥
बालक कोट भाँति गरियावत । मात पिता मन एक नहि आवत ॥
तुमहीं पुरुष दीन्ह मोहि राजू । औ पुन दीन्ह सकल मोहि साजू ॥
तिहि पर हमने गाऊँ बसावा । लीन्ह सुन्न ठिकान बनावा ॥
तहँ हम साहब जाय रहाई । बिन आज्ञा कछु नाहि कराई ॥
अबलग साहेब मैं नहि चीन्हा । सत्तपुरुष तुम दरसन दीन्हा ॥
दोइ कर जोरि चरण चित लावा । धन्य भाग हम दरसन पावा ॥
अब मोहि साहेब भेद बतावो । पाओं चिन्ह हंस पहुँचाओं ॥

ज्ञानी बचन ।

सुन रे काल निरंजन राई । पुरुष नाम है बीरा भाई ॥
जो हंसा चित भगति समोई । ताको खूंट गहै मत कोई ॥
साखी—जो निज बीरा पाइ हँ, आवै लोग हमार ।
ताको खूंट गहो मत, सुनो काल बटमार ॥

निरंजन बचन ।

सुनो गुसाई बिनती मोरी । बीरा पाय करै कछु औरी ॥
ज्ञान कथै अनत चित वासा । आवागवन की राखों आसा ॥

ज्ञानी बचन ।

सुनो निरंजन बचन हमारा । नहीं सत्त वह जीव तुम्हारा ॥
साखी—जा घरते जिव आइया, ताह सुधि गइ खोय ।
पुकारि कहों मैं जीवसों, शब्द पारखी होय ॥

निरंजन बचन ।

कही बात तुम भली विचारी । संत देख हम काँध उतारी ॥
उन निकट दूत नहि आई । साहब हंस देहुँ पहुँचाई ॥
सा०—साहिब सबको एक है, साहिबका कोइ एक ।
लाखन मध्ये को गिने, कोटिन मध्ये देख ॥

ज्ञानी बचन ।

सा०—जाहु काल घर आपने, शब्द कहैं चितलाहु ।
जो फिर सीस उठायहो, बांध रसातल जाहु ॥