कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 210, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो पुनि गहो हंसकी बांही । बांध रसातल पठाऊँ तांही ॥
निरंजनवचन ।
जब तुम रूप दिखावा मोही । तब हम पुरुष न चीन्हा तोही ॥
परथम ज्ञानी हम नहि जाना । बन्धु जान कीन्हा अभिमाना ॥
ज्ञानी वचन ।
धरमदास तब सों हम आये । गढ रैदास मो धारा पाये ॥
परथमहि सतयुग लागा भाई । नृप हरचन्द भये तहां राई ॥
तहाँ जाय शब्द गूहराई । जो चीन्हा सो लोक पठाई ॥
सतयुग सत्तनाम मोर नाऊँ । देही धर हम मनुष्य कहाऊँ ॥
धरमदास वचन ।
धरमदास सुनि टेके पाई । तुम प्रताप सकल सुधि आई ॥
काल चरित्र सकल हंम जाना । पुरुष लीला सबही पहिचाना ॥
जब आपुन आये भौ माहीं । हंस काज जो भयो अब भाई ॥
श्री कबीर साहिब और निरंजनकी गोष्ठी समाप्त ।
प्रमाण अनुरागसागरका ।
धर्मदास वचन ।
हे प्रभु मोहि कृतारथ कीन्हा । पूरणभाग्य दरश मुहि दीन्हा ॥
तुव गुण मोसन वरणि न जाई । मो अचेत कहैं लीन्ह जगाई ॥
सुधा वचन तुव मोहि प्रियलागे । सुनतहि वचन मोहमद भागे ॥
अब वह कथा कहो समझायी । जिहि बिधि जगमें प्रथमें आई ॥
कबीरसाहबका सत्यरुषकी आज्ञा पाकर जीवोंको चितानेके
लिये चलना निरञ्जनसे भेंट होना और उससे
बात चीत करके आगे बढ़ना ।
कबीर वचन ।
धरमदास जो पूछयो मोही । जुग जुग कथा कहों मैं तोही ॥
जबहीं पुरुष आज्ञा कीन्हा । जीवन काज पृथ्वी पग दीन्हा ॥
करि परनाम तबहीं पगु धारा । पहुँचे आय धरम दरबारा ॥
परथम चलेउ जीवके काजा । पुरुष प्रताप सीसपर छाजा ॥
तेहि जुग नाम अचिन्त कहाये । आज्ञा पुरुष जीव पहुँ आये ॥
आवत मिल्यो धरम अन्याई । तिन पुनि हमसो रार बढ़ाई ॥