भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 206

जोई ज्ञानी होय हमारा । काम क्रोध तें होय निनारा ॥
तूस्ना लोभहि देइ बहाई । विषै जन्म सब दूर पराई ॥
उनको ध्वान शब्द अधिकारी । काम क्रोध सब होय नियारी ॥
नाम ध्यान हंसा घर जाई । कहा देत अस करों बडाई ॥
उनपे जम का परै न छाहीं । तास हंसा लोकहि जाई ॥

निरञ्जन वचन ।

कहैं निरंजन सुन हो ज्ञानी । कथि हा जान तुम्हारी बानी ॥
जुरत महात्म सबै बताऊँ । नाम तुम्हारे पन्थ चलाऊँ ॥
तुम तौ एक पन्थ परकासा । हम बारह पन्थ काल जग फांसा ॥
जग के जीव सबै भरमाऊँ । ज्ञानवंत को करम दिढाऊँ ॥
मार जीव को करे अहारा । कथै ज्ञान तुम्हरी टकसारा ॥
करे काम बिस सब भाई । चार वरन ले एक मिलाई ॥
कुलको त्याग होय सो न्यारा । चार वरनको एक विचारा ॥
ज्ञान हमार रहै तन छाई । ते सब जीव काल ले खाई ॥
वे तो तुमरी करिहैं हांसी । ते जीवनपर हमारी फांसी ॥
फिर फिर आवै जमकी खानी । वे सब सरन हमारी ज्ञानी ॥
कैसे पहुँचै पुरुषकी सरनी । ज्ञान संधि हमहू दे बरनी ॥

ज्ञानी वचन

कहे ज्ञानी सुन कैल विचारा । हंस हमार होय नहिं न्यारा ॥
निसवासर रहै लौ लीना । शब्द विचार होय नहिं भीना ॥
हंस हमार सब्द अधिकारा । पुरुष परताप को करे सम्हारा ॥
नाम जपै अरु सुर्त लगाई । मिले कर्म लागे नहिं काई ॥
शब्द मानि होय सब्द सख्या । निश्चे हंसा होय अनूपा ॥
उनको नाम भक्ति की आसा । ताते निरख चलैं विस्वासा ॥

निरञ्जन वचन ।

ज्ञानी मोर अपरबल ज्ञाना । वेद किताब भरम हम माना ॥
इनको माने सब संसारा । कलि में गंगा मुकती द्वारा ॥
देहीं दान जो उतरे पारा । ऐसे सुमृति कहैं विचारा ॥
यहि विधि जग जीव भुलाहीं । जरा मरन सब बंध बंधाहीं ।
सूतक पातक वेद विचारा । पूछ वेदसे करहि सँहारा ॥
एकादशी मुक्तिकी भाई । जोग जग्य करवे अधिकाई ॥