भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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सबही बराती सज चले हैं व्याह करन उस पीवका ।
पहिरे गुलाबी सेहरा संशय पडा उस जीवका ।
होली तमाशे हो रहे सब देखनेको जायँगे ।
पीयसे रँगौली हो रहो रङ्ग देखिके ललचार्यँगे ।
जल जलकी रोवें माछली बन बनके रोवे बोरवा ।
महलोंकी रोवें वीबियाँ अल्ला इलाही क्या किया ।
कायाके अन्दर खोजले छज्जेमें तेरा जीव है ।
कहते कबीर गुरु ज्ञानसे तुझही में तेरा पीव है ।

जब शेख मन्शूरको सूलीपर चढ़ाया, उस समय आकाश पाताल तथा पृथिवी पर शोक छा गया पर उन्होंने तो अपना मारा जाना सहर्ष स्वीकार कर लिया । शेख मन्शूरका हाल संसारमें प्रसिद्ध है । तजकिरे मन्शूर नामक किताबमें भी विस्तारके साथ लिखा हुआ ।

गज्जल ।

चढ़ादार पर जब शेख मन्शूर । हुये उस वक्त सूरज चन्द बेनूर ॥
जमीं कौपी व कौपा आसमाँ भी । हुआ तब सारा आलम गमसे मामूर ॥
जमीं रोती व रोता आसमाँथा । बनी आदम मलायक गिरियः मेहूर ॥
उठा हजरत गजन्द आसेब सारा । दिया देह दुनिया पर उडा धूर ॥
यही खूबी है सदगुरु हंस आजिज । रजा रब्बानी तन मन धन हुआ दूर ॥

पश्चिम देशमें कबीर साहबके बहुतेरे शिष्य हैं । और उन देशोंमें कबीर साहब, सैयद अहमद कबीर शेख कबीरके नामसे प्रख्यात हैं। तथा बहुत स्थानोंपर कबीर साहबकी समाधि भी बनी हैं ।

तत्त्वा और जीवा ।

कबीर कसोटीमें लिखा है कि, तत्त्वा और जीवा नामक दो भाई जातिके ब्राह्मण दक्षिणदेश गुजरातमें नर्मदा नदीके किनारेपर रहकर साधुओंकी सेवा करते थे । उन्होंने बटकी एक सूखी लकड़ी ले अपने मकानके आँगनमें गाड़कर यह प्रण किया था कि, जिस साधुके चरणामृतसे इस बटकी सूखी लकड़ी हरी हो जावेगी हम उसीके शिष्य होंगे । चालीस वर्षतक सहस्रों साधुओंके चरण धो धोकर इस बटके सूखे ठूँठपर डालते रहे पर वह हरा नहीं हुआ । इससे उस देशमें साधुओंकी निन्दा तथा अप्रतिष्ठा होने लगी साधुसेवा बन्द हो चली । यह देख साधुओंने विचार किया कि, अब तो कबीर साहबके शरण चलना

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