कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 614, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंधर्मदास वचन ।
चौ० – धर्म दास पूछै 'अर्थार्ई । साहब मोहिं कहो समुझाई ॥
वीरसिंह राय कीन्ह तुम' सेवा । दयाकरी' कहिये गुखदेवा ।
वीरसिंह देव बड ज्ञानी' । कैसे साहब सेवा ठानी ॥
सो वृत्तान्त कहो मोहि स्वामी । दया करी कहिये सुखधामी' ॥
सद्गुरुवचन ।
धर्मदास भल वृक्षेउ वात्प । तुमसे वरणि कहो विख्याता ॥
तनमन धनको मोह न लावै' । सो' जिव हमरे संग सिध्दावै ॥
प्रथमहि चलै भक्त पहुँजाई' । सकल सन्त जहँ भक्ति कराई ॥
नामदेव भक्तिहि' मन लावा । सैन' औ धना जाट तहँ आवा ॥
रंका' बंका' सदन कसाई । पद्मावति' दीपक तहँ लाई ॥
छूटे' तान चंदेवा दीन्हा । ठाढ़े भगत तहँ गावन लीन्हा ॥
नामदेव लोटन कर' भाई । हात ताल रविदास' बजाई ॥
धना मृदङ्ग पद्म' उँजियारा । जुड़े सन्त सब भगत अपारा ॥
धर्मदास तहँवों हम गयऊ । राम राम सबही मिलि कहेऊ ।
तब हम एक वचन कहि लीना । सकल भगतकाको मन दीना ॥
नामदेव केहि पूर्णहि ध्यावो । भक्ति करो काको मन लावो ॥
नामदेव वचन ।
नामदेव कह सन्त भुलाये । दूजा पुरुष कहाँ ठहराये ॥
हरिहर ब्रह्मा है बड़ देवा । करे सकल जग तिनकी सेवा ॥
यह प्रभु आदि मध्य औ अन्ता । शीश मुड़ाय जीव कहे सन्ता ।
सद्गुरु वचन ।
हरि ब्रह्मा शिव शक्ति जपाई । इनकी उत्तपति कहों बुझाई ।
बिना भेद भूले सब ज्ञानी । ताते काल बाँधि जिव तानी ॥
अजर अमर है देश दुहेला । सो वहि कहिये पर्मे सुहेला ॥
ताका मर्म सिद्ध नहीं जाना । कृत्रिम करता ते मन माना ॥
साखी – कृत्रिम रङ्ग सब भेदिया, वह पुरुष नीनार ॥
तीनलोक पर अलख है, पुरुष ताहिके पार ॥
१ चितलाई, २ किमिकीनी, ३ करिके दया, ४ बडा अभिमानी, ५ बहुनामी, ६ अरु, ७ जो, ८ गयऊ, ९ करन, १० सेना, ११ राका, १२ बाका, १३ पद्मावती, १४ ले, १५ चौहटे १६ सब । यह पाठ भेद हैं । १७ करे, १८ रैदास, १९ पद, ऐसा अनेक जगह पाठ भेद तथा उलटा पलटा है पाठक समन्वयके साथ पढ़ें ।