भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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रक्षा किया करती थी। बतखोंको आदत है कि, सौझके समय कीड़ोंके आखेटके लिये फिरा करते हैं यह बात गिनी फाउलके विरुद्ध है पर इन बच्चोंके लिये उनकी धर्मकी माता उनके साथ फिरा करती थी। बच्चोंके साथ फिरते फिरते थक जाती तो कुछ कालके लिये किसी वृक्षपर बैठ जाती। अपनी दृष्टि प्रत्येक समय बच्चोंपर रखती थी। तनिकसी आपत्तिकी आशङ्का होनेपर चिल्लाती हुई उनके पास आ पहुँचती थी। रात अथवा दिन हो उन बच्चोंसे कदापि अचेत न रहती। ऐसे कितनेही पशु होते हैं जो दूसरेकी सन्तानको अपनी जानकर प्रेम पूर्वक पालते हैं।

बतख ।

नमरुद बादशाहकी बतख—मैंने इबराहीम गुलजार अथवा किसी दूसरी मुसलमानी पुस्तकमें पढ़ा था, नमरुद बादशाहके पास एक बतख थी। वह उसके सारे नगरमें फिरा करती थी, उसको भविष्यका हाल मालूम था। नगरमें जहाँ कहीं चोर देखती पहचानकर तुरन्त ही चिल्लाने लगती। लोग दौड़कर तुरन्त उसको पकड़ लेते। उसकी चोरी अवश्यही प्रमाणित हो जाती। यदि वह चोर, चोर होनेकी बातको अस्वीकार करता तो उसको एक हौजमें डाल देते। उसमें यह गुण था कि, जो चोर उसमें डाला जाता वह शीघ्र ही अपनी चोरी स्वीकार कर लेता।

कौंज ।

दोनोंकी प्रेमाधिक्यसे मृत्यु—पञ्जाब देशके फुल्लोर गाँवके पासके एक गाँवमें कौंजोंका झुण्ड उड़ा जाता था। आखेट करनेवालेने बन्दूक दागी, एक कौंजके परमें छर्रा लगा वह चक्कर खाकर पृथिवीपर गिरपड़ी पर वह चिड़िया शिकारीके बहुत दूँढ़नेपर भी नहीं मिली। वह साधुकी झोपड़ीपर उसके सामने आ गिरी। साधुने चिड़ियाको उठा लिया, अपनी छातीसे लगाकर बहुत रोया और दया की। वह फकीर उसके जख्मी परकी औषध करने लगा, उसकी बहुत सेवा की पर ठीक हो गया अन्तमें वह पक्षी आरोग्य हो गया। आगे वह चिड़िया साधुसे ऐसी हिल गई और प्रेम करने लगी कि, निश्चिदिन उस साधुके साथ ही फिरा करती थी, दूसरे वर्ष कौंजोंका झुण्ड उसी ऋतुमें उस स्थानसे होकर चला। समस्त कौंजोंने शब्द किया। उनका शब्द सुनकर यह भी नीचेसे बोली। ऊपरसे एक कौंज उत्तरा उसके निकट आकर उसके गलेसे अपना गला मिलाकर बहुत चिल्लाने लगा। दोनोंके प्रेमकी अधिकताके कारण दोनोंके प्राण निकल गये। इनके मरने पर साधु बहुत रोया दुःखी हुआ फिर उनको गाड़ दिया।

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