कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 909, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंलेता है कि, इसका आखेट कहाँ है ? जहाँ कहीं प्रगट हो वहाँ तो आँखसे देख लेता है । जहाँ कहीं शिकार छिपी हो वहाँ गँधसे पहचान लेता है । उसके कानका बलभी इतना तीक्ष्ण है कि, मरनेके समीप पहुँचे हुये चिल्लाते पशुओंकी आवाज तुरन्तही सुन लेता है, तुरन्तही वहाँ पहुँच जाता है ।
मिश्रीकयरू—गिद्धकी जातियोंमें एक प्रकारका मिश्र देशी कयरू होता है । यह बहुत सुन्दर होता है । यह सारे देशमें पाया जाता है । अङ्गरेजी पुस्तकोंमें पूर्णरूपसे इसका हाल लिखा है, उसे मैं यहाँ संक्षेपसे लिखता हूँ । इसको फिर उनकी सन्तान कहते हैं । मिश्रके प्राचीन निवासी उसको पवित्र जानकर प्रतिष्ठा किया करते थे, अपने कबरोंपर स्मारक चिह्न के भाँति उसकी तसबीर खोदते थे । यह शांतिके साथ शीघ्र गतिते चलता है । हबशी लोग उसकी पूजा करते हैं । अनेक प्रकारके दूसरे रङ्गके गिद्ध भी हैं, पर सबकी बादशाह फिरउनकी संतानही हैं, यह बहुत सुन्दर होती है । उसका शिर तथा उसकी ग्रीवा बहुत चमकदार होती है । नारंगीके रंगके पर शरीर होते हैं ।
गिद्धोंका बादशाह—एक अथवा अधिक आखेटपर बड़ी आनवानसे आपहुँचता है । उस समय समस्त गिद्ध नम्रता तथा प्रतिष्ठा सहित वहाँसे पृथक हो जाते हैं उसके चारों ओर घेरा बाँधकर खड़े रहते हैं । बादशाह भलीप्रकार खाकर सन्तुष्ट हो जाता है, दूर जाकर वृक्ष अथवा पर्वतपर बैठता है तो दूसरे गिद्ध आखेटके पास जाते हैं नहीं तो सब बादशाहके सन्मुख दूर खड़े रहते हैं । जबतक बादशाह भलीप्रकार खाकर परितृप्त न हो जावे तबतक किसी गिद्धकी शक्ति नहीं है कि, आखेटके निकट जायें । सब भी प्रतिष्ठापूर्वक दूर खड़े रहते हैं । यहाँ तक कि, जबतक राजाके घरानेका कोई भी खाता रहेगा समस्त गिद्ध नम्रता पूर्वक दूर खड़े रहेंगे । बादशाहसे कोई असभ्यता नहीं कर सकता । अङ्गरेजी पुस्तकोंमें इनकी बुद्धि तथा समझकी अनेक बातें लिखी हैं । पर मैं विस्तारके भयसे लिखना नहीं चाहता ।
जटायु तथा सम्पाती—दो भाई बड़ी जातिके गिद्ध थे । ये मनुष्यों तथा पशुओंको पकड़के खा जाते थे । उनकी कहानी रामायणमें लिखी है कि, वे दोनों युवा वस्थाके घमण्डमें आये । उनकी इच्छा हुई कि, अब हम चलकर सूर्यको देखें । आकाशको उड़े, सूर्यकी गरमी बढ़ी । जटायु तो पृथिवीपर लौट आया पर सम्पाती अपने घमण्डवश ऊपर चढ़ता गया, सूर्यके अत्यन्त निकट पहुँचा तो उसके पर भस्म हो गये जिससे भूमिपर गिर पड़ा । पीछे एक पर्वतकी कन्दरामें पड़ा रहा, विश्वम्भर उसको वहाँ ही भोजन पहुँचाने लगा ।