कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 245, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीर मन्शूर प्रथमभाग ।
तृतीय अध्याय ।
चौथे युग कलियुका वृत्तान्त ।
कलियुगमें ज्ञानीजीका पृथ्वीपर प्रगट होना और सत्य कबीर सैयद
अहमद कबीर व शेख कबीर जिन्दा पुरुष आदि नामोंसे होकर
मनुष्योंके उद्धार करने का वृत्तान्त ।
पहिला प्रकरण ।
उत्थानिका ।
द्वापरयुग जब समाप्त हो चुका और कलियुग आरंभ हुआ तब इस कलियुगमें ज्ञानीजी सत्य कबीर और कबीर साहबके नामसे प्रसिद्ध हुए मुसलमान लोग आपको सैयद अहमद कबीर और शेख कबीर कहते हैं । हिन्दू मुसलमान तथा संसार के सब कौमोंसे आप गुरु तथा पूजनीय हैं । चारों युगोंमें आपके चार नाम हैं—अर्थात् सत्यसुकृत सत्ययुगमें, मुनीन्द्र त्रेतामें, करुणामय स्वामी द्वापरमें और कबीर साहब कलियुगमें । इन चारों नामोंसे चारों युगोंमें आप सर्व मनुष्योंको शिक्षा दिया करते हैं । प्रत्येक समय प्रत्येक काल और प्रत्येक स्थानपर कबीर साहब सदैव पृथ्वीपर उपस्थित रहते हैं । इस कलियुगमें अनन्त बार आप पृथ्वीपर प्रगट होते हैं और फिर अन्तर्धान हो जाते हैं । परन्तु कुछ बेरकी सुध जो मुझको है उसका वृत्तान्त मैं थोडा लिखता हूँ ।
दूसरा प्रकरण ।
श्वपच सुदरशनको चेताना ।
जब कलियुगके आरंभ और द्वापरके अन्तमें पहले कबीर साहब पृथ्वीपर प्रकट हुए तब काशी नगरीमें दिखलाई दिये । वह समय कृष्ण तथा पाण्डवोंका था । उस समय मनुष्योंको उपदेश करने और अपने धर्मकी शिक्षा देने लगे । सुदर्शन नामक एक डोम था उसने आकर सत्यगुरुको दंडवत् करके निवेदन किया कि, हे महाराज ! मुझको अपनी शिक्षा दीजिये । तब सत्यगुरु उसपर दयालु हुए और उसको सत्यनामका उपदेश किया । वह सत्यगुरुकी शिक्षा पाकर बड़े प्रेमके साथ साधुसेवा और भक्ति करने लगा । इसी श्वपच सुदर्शनको वाल्मीकि भक्तभी कहते हैं । पाण्डवोंने जब महाभारतके उपरान्त यज्ञ किया और करोड़ों