कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 250, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंज्ञानी वचन ।
धरमराय तें बहु छल कीन्हा । छल तोहार सकलो हम चीन्हा ॥
पुरुष वचन दूसर नहिं होई । ताते तुम जीवन कहैं खोई ॥
पुरुष मोहिं जो आज्ञा देहीं । तो सब जिव होय नाम सनेही ॥
ताते सहजहिं जीव चैताऊँ । अंकुरी जीत सकल मुकताऊँ ॥
कोटी फंद जो तुम रचि राखा । वेद शास्त्र निज महिमा भाखा ॥
प्रगट कला जो धरी जग जाऊँ । तो सब जीवनको मुकताऊँ ॥
जो अस करौं वचन तब डोलै । वचन अखंड अडोल अमोलै ॥
जो जियरा सुभ अंकुरी होई । सब्द हमार मानी है सोई ॥
अंकुरी जीव सकल मकताओं । फंदा काटि लोक ले जाओं ॥
काटि भरम जा दैहों ताही । भरम तुम्हारा मानि हैं नाहीं ॥
छन्द-सत्य शब्द दिडाम सबहीं, भ्रम तोरि सब डारिहैं ।
छल तोर सब चिन्हाइ तबहीं, नाम बल जिय तारिहैं ॥
मन वचन सत्य जो मोहि चीन्हि, एक तत्त्व लौ लाइहैं ।
तब सीस तुम्हरे पांव देइहैं, अमल लोक सिधाइहैं ॥
सोरठा-मर्दहिं तोरा मान, सूरा हंस सुजान कोइ ।
सत्य शब्द सहिदान, चीन्हहि हंस हरष अती ॥
धर्मराय वचन ।
कहै धर्म जीवन सुखदाई । वात एक मुहिं कहो बुझाई ॥
जो जिव रहै तुम्हरो लौ लाई । ताके निकट काल नहिं जाई ॥
दूत हमार ताहि नहिं पावे । मुरछित दूत मोहिं पहैं आवे ॥
यह नहिं बूझ परी मोहिं भाई । तौन भेद मोहिं कहो बुझाई ॥
ज्ञानी वचन ।
सुनहु धरम जो पूछहुँ मोही । सो सब हाल कहौं मैं तोही ॥
सुनहु धरम तुम सत सहिदानी । सो तो सत्य शब्द आहि निरबानी ॥
पुरुष नाम है गुप्त परमाना । प्रगट नाम सत हंस बखाना ॥
नाम हमार हंस जो गहई । भवसागरसे सो निरबहई ॥
दूत तुम्हार होय बल थोरा । जब मम हंस नाम ले मोरा ॥
धर्मराय वचन ।
कहै धरम सुनु अन्तरजामी । कृपा करहु अब मोपर स्वामी ॥
यहि युग कौन नाम तुव होई । सो जनि मोपर राखहु गोई ॥