कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 260, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसराईल नामक फरिश्तः बारह सहस्र फरिश्तों सहित द्वारकी रक्षा किया करता था। वह बोला कौन है ? तब जिबराईलने उत्तर दिया कि, मैं जिबराईल हूँ और मेरे साथ मुहम्मद साहब हैं तब उसने द्वार खोल दिया और सलाम किया।
फिर हजरत आदम मिले और कहा, धन्य है आइये बैठिये। आदमके दाहिने तथा बाएँ दो द्वार थे, एक नरकका तथा दूसरा बँकुण्ठका। एक ओर देखकर हजरत आदम रो थे और दूसरी ओर देखकर हँसते थे।
इसी प्रकारके वार्तालाप करते और प्रत्येक द्वारको खुलवाते मुहम्मद साहब ऊपर गये। जब सदर स्थानके आगे चले तब जिबराईलने कहा कि, अब आप आगेको चलिये। स्वयम् जिबराईल पीछेको हो लिये, आगे चलकर एक सुवर्ण खचित परदा मिला जब जिबराईल इस परदेके समीप पहुँचे तब भीतरसे आवाज आई कि, द्वार पर कौन है ! तब जिबराईलने उत्तर दिया कि, मैं जिबराईल हूँ और मेरे साथ मुहम्मद हैं। जिबराईलने हजरत मुहम्मदसे कहा कि, अब इससे आगे जानेकी मुझको आज्ञा नहीं है आप अकेले जाइये। तब सत्रह परदे मुहम्मद साहबने अकेले तँ किये। प्रत्येक परदेकी मोटाई पांच सौ वर्षकी राह थी अर्थात् प्रत्येक परदा एक दूसरेसे पांच सौ वर्षके मार्गके अन्तर पर था। आगे चल कर वह बुराक भी रह गया। तब वहाँ पर एक पक्षी जिसको रफ़रफ़ कहते हैं, मुहम्मद साहबकी सवारीके निमित्त आया। इस रफ़रफ़पर सवार होकर रसूल-अल्लाः खुदाके सिंहासनके समीप पहुँचे। रसूलअल्लाः और अल्लाःमें बहुत वार्तालाप हुई। मुहम्मद साहबके आने-जानेमें अनेक घटनायें हुईं जिसके लिखनेका स्थान इस स्थानपर नहीं है। पांचों रोजे, निमाज और समस्त आज्ञाएँ वहाँसे मिलीं यह सब बातें एक पलभरमें हुई। प्रातः काल उठकर मुहम्मद साहबने यह सब बातें दरबार आममें कही उस और अबूबकने सुनतेही इस बातका विश्वास करलिया। पर अबूजहलने यह बात सुनकर लोगोंमें बड़ा उपहास किया। जिसको सुनकर मुसलमानी धर्मसे कितनेही लोग विमुख हो गये। मुहम्मदी दीनके पंडितोंमें इस बातका मतभेद है, किसीका कथन है कि, मुहम्मद साहबने स्वप्न मात्र देखा था और कोई रूह तथा कोई शरीरसे मेआराज कहते हैं और किसीका कथन है कि, केवल बैतअक़सापर्यन्त मेआराज हुआ था। इस बातपर हदीसोंके भिन्न २ कथन हैं।
इस मेआराज मुहम्मदके विषयमें लोगोंके अनेक कथन तथा भांति-भांतिके ध्यान हैं। सूरतं नजम अर्थात् तिरपनबी सूरतमें वर्णन किया है कि, मुहम्मद साहब ने एक तेज स्वरूप व्यक्तिको देखा और फ़मुस्सरीन लिखते हैं कि, यह