कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 637, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंडचोढ़ी, परदा दूरकर, लीना कण्ठ लगाय ।
गरीबदास गुजरी बहुत, बदनन बदन मिलाय ॥
मनकी पूजा तुम लखी, मुकुट माल पर वेश ।
गरीबदास किनको लखे, कौन वरन क्या भेष ॥
यह तो तुम शिक्षा दयी मान लिये मत मोर ।
गरीबदास कोमल पुरुष, हमरो बदन कठोर ॥
हे स्वामी तुम स्वर्गकी, छाड़ो आशा रीत ।
गरीबदास तुम कारणे, उतरे शब्द अतीत ॥
सुन बच्चा मैं स्वर्गकी, कैसे छाड़ूँ रीत ।
गरीबदास गुदड़ी लगी, जन्म जात है बीत ॥
चार मुक्ति वैकुण्ठमें, जिनकी मोरे चाह ।
गरीबदास घर अगमके, कैसे पाऊ बाह ॥
हेम रूप जहाँ धरणि है, रत्न जड़े बहु सोभ ।
गरीबदास वैकुण्ठको, तन मन हमरो लोभ ॥
शंख चक्र गदा पद्म है, मोहन मदन मुरारि ।
गरीबदास मुरली बजै, स्वर्ग लोक दरबार ॥
दूधोंकी नदियाँ बगें, श्वेत वृक्ष शोभान ।
गरीबदास मन्दिर मुकुट, स्वर्गपुरी अस्थान ॥
रत्नन जड़ाऊ मनुष सब, गण गँधर्व सब सेब ।
गरीबदास उस धामकी, कैसे छाड़ूँ सेव ॥
चार वेद गावें उसे, सुर नर मुनी मिलाप ।
गरीबदास ध्रुव पुर यश, मिट गये तीनों ताप ॥
नारद, ब्रह्मा यश रटें, गावें शेष गणेश ।
गरीबदास वैकुण्ठसे, और परेको देश ॥
सुनुस्वामी निज मूल गति, कहि समझाऊँ तोहि ।
गरीबदास भगवानको, राखा जगत समोय ॥
तीन लोकके जीव सब, विषय बासना भाय ।
गरीबदास हमको जपैं, तिसको धाम दिखाय ॥
कृष्ण विष्णु भगवान्के, जहाँ गये हैं जीव ।
गरीबदास त्रिलोकमें, काल कर्म सर शीव ॥
सुनु स्वामी तोसों कहूँ, अगम द्रौपकी सैल ।