भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 636

दस गरीब अदालतंग, हम राजा संसार ॥
हम पानी हम पवन हैं, हमहीं धरणि अकाश ।
दास गरीब तत्त्वपञ्चमैं, हमहीं शब्द निवास ॥
सुनु स्वामी सत भाखहूँ, झूठ न हमरो रञ्च ।
दास गरीब हम रूप विन, और सकल परपञ्च ॥
हम रोवत हैं सृष्टिको, वो रोवति है मोंहि ।
दास गरीब वियोगको, और न वृक्ष कोइ ॥
मैं बूझू मैंही कहूँ, मैंही किया वियोग ।
गरीब दास गलतान हम, शब्द हमारा योग ॥
चारो जुगनमें हम फिरेँ, नहिं आवेँ न जाउँ ।
गरीब दास गुरु भेदसे, लखे हमारा ठाउँ ॥
रजगुण सतगुण तमगुण, रजबीरज हम कीन्ह ।
गरीबदास हम सकलमें, हम दुनियाँ हम दीन ॥
लगी महम गनीम पर, काल कटक कटकन्त ।
गरीबदास निर्भय करूँ, जो कोइ नाम जपन्त ॥
मैं बालक मैं वृद्ध हूँ, मैं ही जवाँ जमान ।
गरीबदास निज ब्रह्म हूँ, हमहीं चारों खान ॥
गगन सुन्य गुप्ता रहूँ, हम परगट परवाह ।
गरीबदास घट घट बसूँ, विकट हमारी राह ॥
आवत जात न दीसहूँ, रहता सकल समीप ।
गरीबदास जलतरङ्ग ज्यों, हमहीं सायर सीप ॥
गोता लाऊँ स्वर्गमें, फिर पैठूँ पाताल ।
गरीबदास दृढ़त फिरूँ, हीरे माणिक लाल ॥
इस दरिया कङ्कर बहुत, लाल कहीं कहिं ठाऊँ ।
गरीबदास माणिक चुगूँ, हम मरजीवा नाउँ ॥
बोले रामानन्दजी, हम घर बड़ा सुकाल ।
गरीबदास पूजा करें, मुकुट फई जद माल ॥
सेवा करो सम्हालके, सुन स्वामी सुरज्ञान ।
गरीबदास सिरधर मुकुट, माला अटकी जान ॥
स्वामी घुण्डी खोलके, फिर माला गले डार ।
गरीबदास इस भजनको, जानत है करतार ॥