भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 324

परमपुर्ष पीरो शनासिन्दगां । उसी लोक जावेंगे सो बन्दगां ॥
यह कलियुगमें सतयुग तगी हैलड़ी । सह्र सिम्त है आसे हैं वों वाझड़ी ॥
हैं गुरु मुख कोई उनके गोशिन्दगां । जो सतगुरु मोहब्बतमें जो शिन्दगां ॥
जो उस गुरुके मिलनेकी कोशिश करे । अजर ओ अमर जामः पोशिश करे ॥
जो पहचान सोई हैं शाहंशहाँ । न जानें जिन्हे आदमी इवलहाँ ॥
बयालीसका जबसे ठीका हुवा । न इनसानका बाल बीका हुवा ॥
यह माहूद ठीका जो पूरा हुवा । तो यमजालका फिर सहूरा हुवा ॥
जो इस अहूदमें हो कोई बख्त मंद । जेढ़ बाम बाला बनामें कमंद ॥

गजल ।

बयालीस वंश सतगुरुकी निशानी । हैं बखशिन्वः हयाते जान हानी ॥
उसी हम शकलमें सब ना खुदा यह । रहे दुनियाँमें जबतक यह कहानी ॥
सना ख्वानी हैं करते हंस जिनकी । कहे सौबार सतगुरु खुद जबानी ॥
तमीजो अकलसे खुदे पर्ख लीजे । मक्कामें हंस आए लामकानी ॥
दरोगोरास्त अब पहचान होगा । जो सुतफ़र्रिक करेंगे दूध पानी ॥
कदम उनके पकड़ परवाज कर अब । गुजर बग चालसे अपने दुरानी ॥
हवासो अकल ओ हम लङ्गपा हैं । वहाँ पहुँचे नकुरओं वेदबानी ॥
समझ ओ बूझ कर लीजे खमोशी । अवज शिरके मिलेगी राजदानी ॥
करे क्या यह बनी आदम बेचारा । मदद पावे न जबतक आसमानी ॥
पेयाला इश्क पीकर मस्त होजा । जो चाहे चेहरए खुद अरगवानी ॥
पड़े खाते हैं गोता भेष पाखंड । बरहमनभाटओ मुल्ला कुरानी ॥
मेहर हौं गाय बकरी मुरगियोंपर । खुदाबन्द मोहाफ़िज पासवानी ॥
उत्तर चल पार इस दरियाके आजिज । हुई तुझपर जो मुरशिद मेह्लवानी ॥

यह चार गुरु तथा बयालीस वंश जो मुख्य कबीरपंथी कहलाते हैं उनका विवरण हो चुका । इस समय धर्मदास साहबके वंश उपस्थित हैं उन्हींके पथ दिखाने से समस्त मनुष्य सत्यलोकको जाते हैं । दश स्थानोंका चिह्न जो मैंने दिया है उन सब स्थानका पथ इन्हींकी दयाके द्वारा प्राप्त होता है । नौ स्थानोंको पार करके दशवें स्थानको पहुँचता है । इन समस्त स्थानोंके बीचमें शून्यकी डोरी लगी हुई है । वे शून्य (खला) की डोरियाँ हैं । उन डोरियोंके भिन्न १ नाम कबीर साहबने कहे हैं । उन डोरियोंपर सत्यगुरुके पथ दिखानेसे हंस चढ़कर पार हो जाते हैं । जबलों पारख गुरु नहीं मिलता तबलों उन डोरियोंकी तनिक भी सुध नहीं मिलती । ये गुरुलोग भवसागरके पार उतारनेवाले हैं । उनकी प्रशंसा अनेक बार स्वयम् कबीर साहबने की है ।