भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 327

मस्तकमें एक अर्ध गोलाकार प्रसादभृङ्गके समान एक स्थान है, उसी स्थानमें समस्त रचना सूक्ष्मरूपमें प्रविष्ट होजायगी । क्योंकि, समस्त रचनाको वह अपने मस्तकके उसी विशेषस्थानमें रख लेता है । तथा अपने शिरके बीचके गुम्बदमें लिए हुए सत्तर युगपर्यन्त बराबर शून्यमें फिरा करता है । सत्तरयुगके उपरान्त उसका चित्त व्याकुल हो जाता है । एकान्त होनेके कारण उसके मनमें अत्यंत घबराहट होती है, उससे कुछ हो नहीं सकता है, वह अपने चित्तमें यह सोचता है कि, मैं स्वयम् सत्यपुरुष हूँ । वह बल अपनेमें नहीं पाता दुःखी होता है कि, अब क्या करूँ ? तब वह सत्यलोककी छाया अर्थात् आस पास जाकर निवेदन करता है । तब समर्थकी आज्ञा होती है कि, ऐ ज्ञानी ! शून्यमें निरञ्जनके पास जाओ और कहो कि, वह जाकर अब कूर्मजीकी पीठ के ऊपर तीन लोककी रचनाका प्रस्तार करे । उस समय ज्ञानीजी सत्य पुरुषका समाचार लेकर निरञ्जनके पास जाते और समर्थकी आज्ञा सुनाते हैं जब पुरुषकी आज्ञा सुनते हैं, उसी समय निरञ्जन दौडकर कूर्मजीकी पीठके ऊपर तीनों लोककी रचनाका सामान करते हैं । तब निरञ्जन अपने मुँहसे आद्याको उगल देता है । आद्या तथा निरञ्जन मिलकर तीन देवताओंको उत्पन्न करते । फिर पांचों मिलकर सब सृष्टिकी उत्पत्ति करते हैं पहले सत्यस्वरूप सृष्टि उत्पन्न होती है । सब लोक नितान्तही धर्मात्मा होते हैं जैसा—कि कुछ मने पूर्वमें लिखा है उसी प्रकार समस्त रचना प्रगट होती है । इस प्रकार उत्पत्ति स्थिति तथा बिनाश हुवा करता है और जब उत्पत्ति होती है तब इसी प्रकार कबीर साहब मनुष्योंकी शिक्षाके निमित्त पृथ्वीपर आया करते हैं मनुष्योंको मुक्तिप्रदान किया करते हैं ।

यह तो ब्रह्माण्डके महाप्रलयका विवरण हुवा । इसी प्रकार पिण्डकी प्रलयभी होती है । कारण यह कि, जो कुछ पिण्डमें है सोई ब्रह्माण्डमें है, तनिक भी भिन्नता नहीं है । परन्तु सबसे बड़ा महाप्रलय भी एक दिवस होगा । जब केवल एक सत्यपुरुष और सत्य लोकही रह जावेगा । और कहीं कुछ न रहेगा । अर्थात् दयाद्वीप नासूतसे लेकर सहजद्वीप अर्थात् आहूत स्थानपर्यन्त सब विलोपित हो जावेंगे । केवल सत्यलोकमें ही शान्ति रहेगी । सत्य लोकके हंस सब सुरक्षित और सत्य पुरुषकी रक्षामें सदैव समान रहेंगे ।

अन्तर्धान होनेकी कथा ।

जब काशीके मनुष्योंने कबीर साहबकी अनेक लीलाएँ देखलीं और जान लिया कि, ये तो स्वयम् परमेश्वर हैं न किसीके मारनेसे मरते हैं, न काटनेसे कटते हैं, न डुबानेसे डूबते हैं, न जलानेसे जलते हैं । न कोई हथियार आपके ऊपर